Literature सप्ताह का व्यंग्य /राकेश अचल

आपने कैसे मान लिया कि सरकार ने जो नए क़ानून बनाए हैं, वे सब के सब किसानों के हित में हैं?’ मनसुख ने हमें घूरा। मनसुख का घूरना भी अपने आप में एक सवाल होता है।

बचपन में जो पढ़ा वो सबसे प्रिय वाक्य था ‘सत्यमेव जयते।’ लेकिन लगता है जल्दी में गलत पढ़ लिया। जल्दी का काम वैसे भी शैतान का होता है। बचपन में शैतानी ही सबसे ख़ास पहचान होती है। बचपन की बातें पचपन के बाद बड़े काम आती हैं। अब देखिए न सत्यमवे जयते को लेकर जो धारणा बचपन में बनी थी, अब तर्क करने के काम आ रही है। हमारे काम भी आ रही है और हमारे मनसुख के काम भी आ रही है। 

मनसुख पिछले कुछ दिनों से आंदोलनकारी हो गए। सरकार ने उन्हें किसान से आंदोलनकारी बना दिया है। दरअसल बनाने और बिगाड़ने के काम पर सरकार का एकाधिकार होता है। हमारे भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में यही चलन है। सरकार जिसे चाहती है उसे बना देती है और जिसे चाहती है उसे बिगाड़ देती है। भू लोक में बनाने-बिगाड़ने का काम ब्रह्माजी के हाथ में नहीं है। 

छुट्टी के दिन मनसुख संवाद करने मेरे गरीबखाने पर न आएँ ऐसा पिछले तीस-चालीस साल में तो कभी हुआ नहीं। मनसुख कोई सरकार नहीं जो वादा करके भूल जाएँ ! मनसुख एक आम भारतीय किसान हैं लेकिन उनका किसी किसान यूनियन से कोई लेना-देना नहीं है। वे सभी को अपना मानते हैं। मनसुख ने भी बचपन में वसुधैव कुटुंबकम का पाठ पढ़ लिया था न। 

मेरे गरीबखाने पर हर आने-जाने वाले के लिए एक मटके में पानी और दूसरे छोटे मटके में जिसे घिल्ला भी कहते हैं, तम्बाखू भरी रखी रहती है। चूना एक चुकट्टे में होता ही है। यह परम्परा हमारे यहां आदिकाल से चली आ रही है। आवभगत का सबसे सस्ता और लोकप्रिय साधन यह ही है। इसे रखने पर कोई एनएसबी आपको नोटिस नहीं दे सकती,पूछताछ नहीं कर सकती,क्योंकि तम्बाखू वनस्पति है और चूना राष्ट्रीय अवलेह जो चाटा भी जाता है और लगाया भी जाता है। तम्बाखू के खिलाफ अब भले ही बड़े-बड़े विज्ञापन आने लगे हों लेकिन हमारे बचपने में ऐसा कुछ था नहीं।  फिर चूना तो शरीर में कैल्शियम की कमी को करने वाला होता ही है। 

मनसुख ने आते ही अपना मुड़ायछा सर से उतारकर एक तरफ रखा और अपनी हथेलियों को आपस में रगड़कर उसी से अपना चेहरा पोंछ लिया। ऐसा करना सहज योग की श्रेणी में आता है। इससे आँखों की थकान मिट जाती है और चेहरे का तनाव कम हो जाता है। यकीन न हो तो किसी भी समय करके देख लीजिए। मनसुख ने मटके से पानी निकला, पिया फिर सामान्य होकर बोले -‘कैसे हो पंडित जी ,आज कहीं गए नहीं !’

‘आज तो छुट्टी हैं दादा ‘मैंने मनसुख को चेताते हुए कहा। ‘छुट्टी और मीडिया वालों की ‘मनसुख ने हैरानी से अपनी आंखें चौड़ी की। वे बोले -‘भैया आजकल तो मीडिया वालों को सांस लेने की फुरसत नहीं है और आप हैं कि छुट्टी मना रहे हैं,ये तो घोर आश्चर्य हुआ ?’

अब चौंके और लजाने की बारी मेरी थी .मैंने सफाई देते हुए कहा-‘आज थोड़ा थकान हो रही थी दादा !” वही तो मै सोचूँ कि आप जैसा तपोनिष्ठ आदमी घर कैसे बैठ सकता है जबकि देश में आग लगी हुई है। किसान सड़कों पर है और अभिनेता-अभिनेत्रियां एनसीबी के दफ्तरों में। मनसुख ने अपना ज्ञान बघारा। ज्ञान बघारना एक पुरातन कला है। जैसे बिना बघार के दाल में स्वाद नहीं आता वैसे ही बातों में बघार दिए बिना ज्ञान का पता नहीं चलता। बघार और तड़के में मामूली से भेद है। तड़का का तड़के से कोई सीधा रिश्ता नहीं है ये भर जान लीजिए।

‘छोड़िए भी ,आप कहाँ से तशरीफ़ लेकर आ रहे हैं ?’ मैंने प्रतिप्रश्न किया। ‘किसानों के आंदोलन में शामिल होकर लौट रहा हूँ। किसान बेचारे खेत-खलिहान छोड़कर सड़कों और रेल पटरियों पर बैठे हैं लेकिन हमारी सरकार को किसानों की चिंता ही नहीं है’ मनसुख भड़के। ‘क्या बात करते हैं आप ! सरकार ने तो किसानों की एमएसपी बढ़ा दी है और आप कहते हैं कि सरकार को किसानों की चिंता ही नहीं है। ‘ मैंने मनसुख को लगभग हड़काते हुए कहा ..मेरी बात सुनकर मनसुख का जायका शायद बिगड़ गया। उन्होंने मुंह में रखी तम्बाखू थूकते हुए मेरी और वक्रदृष्टि से देखा। बोले-‘बकवास करते हो आप। आपने कैसे मान लिया कि सरकार ने जो नए क़ानून बनाए हैं, वे सब के सब किसानों के हित में हैं?’ मनसुख ने हमें घूरा। मनसुख का घूरना भी अपने आप में एक सवाल होता है। 

हमने अनुमान लगा लिया कि मनसुख आज क्रांतिकारी बनकर आए हैं। हमने बात सम्हालने की कोशिश की -‘दादा हमारी सरकार जनता की है, जनता के लिए है तो फिर किसानों के खिलाफ क़ानून क्यों बनाएगी भला ?’

‘क्यों नहीं बनाएगी ? आपसे किसने कह दिया कि सरकार जनता की और जनता के लिए है।अखबार तो कह रहे हैं कि सरकार आडवाणी और अम्बानी की है और उन्हीं के लिए है ?’ मनसुख हत्थे से उखड़ गए। मुझे उनमें महेंद्र सिंह टिकैत की आत्मा हिलोरें लेती दिखाई दीं।

‘नहीं..नहीं दादा ये आपकी गलतफहमी है। कुछ स्वार्थी लोग आपको और किसानों को बरगला रहे हैं। हकीकत तो यही है कि नए क़ानून आपको बिचौलियों से आजाद करा देंगे।’ हमने मनसुख का समाधान करते हुए कहा। लेकिन मनसुख कहाँ मानने वाले थे। वे तो घर से आज महेरी पीकर निकले थे। ऐसा लग रहा था कि जैसे किसानों के लिए बनाए गए तीनों नए क़ानून मनसुख ने आद्योपांत पढ़ लिए हों। बोले-‘ लगता है कि आप भी गोदी मीडिया हो गए हो ! कौन रोक सकता है आपको ऐसा करने से? ‘ मनसुख की बातों में तंज था। स्वाभाविक भी है। किसान अपने मौजूदा बिचौलिए को तो पहचानता भी है लेकिन अब नया क़ानून बनने के बाद जो बिचौलिए आने वाले हैं उन्हें तो मनसुख और उनकी बिरादरी जानती नहीं है न। मनसुख बोले-‘हमारे मन का सुख तभी है जब हमें ठगा न जाए, झांसा न दिया जाए। हमें लगता है कि चाय बेचने वाले लोग खेत-खलिहान के बारे में कुछ जानते ही नहीं हैं, वे तो इंजनों कठपुतली बने हुए हैं अडानी और अम्बानी के।” .

‘डोंट वरी दादा ! ‘ हमारे मुंह से हमारा शहरी तकिया कलाम अचानक निकला। मनसुख चौंके। वे कुछ बोलते इससे पहले हम ही बोल पड़े.-‘ चिंता नी करो महाराज ! सब ठीक हो जाएगा। सर्कार अपनी है और अपुन सरकार के। बैठकर आपस में बात कर लेंगे ।’ सरकार बात ही तो नहीं करती,लाठियां चलाती है,गोलियां बरसाती है। बात करना होती तो राज्यसभा में बात करती न ,क्यों ध्वनिमत से नए विधेयक पारित करा लिए ? हंगामे में हमें तो कुछ नी सुनाई दिया कि किसने विधेयक का समर्थन  किया और किसने नहीं  ?’ मनसुख उत्तजित होकर बोले।

मनसुख दरअसल देश के किसानों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। सरकार मनसुख के मन की बात ही समझ ले तो आंदोलन से बच सकती है,अन्यथा किसानों को अन्नदाता कहा जाता है।अन्नदाता अपना वजूद बचने के लिए किसी भी स्थिति तक जा सकता है,जैसे वोट पाने के लिए नेता किसी भी हद तक जाता है। बात आगे बढ़ती इससे पहले ही मेरे फोन की घंटी बज उठी.मुझे घर के अंदर जाना पड़ा। मुझे अंदर जाते देख मनसुख ने भी फिर तम्बाखू घिसी,मुंह में रखी और चलते बने रेल पटरी की ओर। आन्दोनकारी किसानों को अपना समर्थन देने। 

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