शिवकुमार विवेक

आज विश्व डाक दिवस है। एक ऐसे प्रतीक को यादों में कुरेदने का, जो जिंदगी से गहराई से जुड़ा था। सुख और दुख जिसकी एक दस्तक पर रहते थे। कभी वह आनंद का उत्स होता था तो कभी विषाद का स्रोत। ‘पोस्टमैन’….की प्रतीक्षा और पुकार वह उत्सुकता जगाती थी जो किसी लॉटरी के नतीजे आने के वक्त भी नहीं होती। अब वह टेर नहीं, उसके आने की टकटकी नहीं। नई पीढ़ी जिन चीज़ों को किताबों से जानेगी, उसमें से वह एक होगा। मेरा यह लेख भी शायद उन्हीं स्मृतियों का छोटा सा दस्तावेज हो जाएगा। 

समय के साथ प्रतिमाएं बदलती हैं, उसके प्रतिमान परिवर्तित होते हैं। प्रतिभाएँ और परिस्थितियाँ वक्त के पहिए को निरंतर आगे धकेलते रहते हैं। इसमें हम पीछे जमीन पर उभरे पहिए के निशान और पीछे छूटने वाली चीज़ों को निहारते रह जाते हैं। वही हमारी स्मृतियों और विरासत का हिस्सा होते हैं। ये हमारी जिंदगी के सफ़र और उसके अच्छे-बुरे पड़ावों की कहानी कहते हैं। मानव इतिहास ऐसे ही रचा जाता है। 

पोस्टमैन इतिहास का आदिम पहरुआ है। आदमी जब धरती पर एक से दो हुआ होगा, संदेश देने की आवश्यकता तभी से आई होगी। जब उसने दूरियाँ नापी होंगी तभी से संदेशवाहक की अहमियत महसूस हुई होगी। यह संदेशवाहक मौन और अमूर्त भी रहा होगा और जीवित भी। तुलसी के राम पूछते रहे-हे खग-मृग, हे मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृगनयनी? तो कालिदास मेघों के माध्यम से प्रिया को संदेश भिजवाते रहे। 

संदेशवाहक हरकारे की ईजाद इसी का व्यवस्थागत रूप है। पोस्टमैन इसी का लोकतांत्रिक अंग। बहुत कम पारिश्रमिक में काम करते हुए उसे क्या मिलता था-लोगों की भावनाओं की ठंडी-गर्म अनुभूति, रिश्तों की ऊष्मा और सेवा का मौखिक प्रतिदान! तब वह इसमें सुख नहीं तो संतोष जरूर खोज लेता था।

अब संतोष के ऊपर सुख है। ज़रूरतें बढ़ गईं तो चादर छोटी लगने लगी। इसलिए पोस्टमैन जैसे लोगों की भूमिका नहीं रह गई। पोस्टमैन शांत और सुकून वाले समाज की निशानी है। समाज की चाल और गति बदल गई है। दौड़ते समाज की जिंदगी पहले की तरह एक संदेश के इर्द-गिर्द नहीं ठहरती। फिर हमने पोस्टमैन नामक संस्था का पतन भी देखा। चिट्ठियों को फेंक देने, न पहुँचाने और जला देने की घटनाएँ भी सामने आने लगीं थीं। यह पोस्टमैन का वैसा ही दौर था जिसमें स्कूल में पैर फैलाकर और सिगरेट के कस फूँकते शिक्षक देखे जाने लगे थे अथवा सार्वजनिक वाहनों में पुर्ज़े बदलते चालक। इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है, यह अलग बहस का विषय है। 

हजारों-लाखों संदेशों से जीवन चलता है। इसलिए एक संदेश आता है तो दूसरा जाता है। बहुत क्षणभंगुर हो गए हैं संदेश भी। अब संदेश का संप्रेषण एक उपभोक्ता सेवा है। जिसमें पोस्टमैन वाले जुड़ाव अथवा आत्मीयता की जगह नहीं है। बेदिल और यंत्रचालित दिमाग वाली तकनीक संदेश लाती है या कुरिअर वाला लड़का यांत्रिक तरीके से डाक दे जाता है। वह इतनी जल्दी में रहता है कि आप रामलाल हैं या श्यामलाल हैं, इसकी परवाह नहीं करता। उसके लिए आप एक हस्ताक्षर हैं जो उसके प्राप्ति रजिस्टर पर दर्ज होंगे। वह सिर्फ डिलीवरी बॉय है। सुख की डिलीवरी हो रही है या दुख की-यह आप जानिए। सुख और दुख भी सापेक्ष होते हैं। समय के सापेक्ष भी। तो पोस्टमैन नाम की सेवा के होने व न होने का मानसिक सुख और दुख झेलते हुए इतिहास को पढ़ें। 

3 COMMENTS

  1. बहुत खूब । जब इंग्लिश सीखना शुरू हुआ तब Post man is a government servant रटा …। पोस्टमैन का दरवाजे पर दस्तक देना अनेक भावों को जन्म देने लगता था..कुछ प्रतीक्षित की आशा…जिज्ञासा और ना जाने क्या क्या ? समय कितनी तेजी से बदलता है । किसी एक शताब्दि की बात करें तो राइट बंधुओं के हवाई जहाज आविष्कार से राफेल और रॉकेट्स तक की लंबी यात्रा ।
    नई पीढ़ियाँ पोस्टमैन के किरदार को शायद ही अनुभव कर पायें ।

  2. विश्व डाक दिवस पर आपका यह आलेख,बीते दिनों की कितनी ही सुखद स्मृतियों की ओर ले गया।डाकिये की प्रतीक्षा,प्रिय के मिलन से कम नहीं होती थी
    जैसे जैसे नई तकनीक का विकास हुआ,जिस तरह नई मुद्रा पुरानी मुद्रा को चलन से गायब कर देती है।
    उसी तरह डाकिये,डाक सेवाएं न के बराबर रह गई हैं
    कितनी ही पुरानी चिट्ठियां आज भी सम्हालकर रखी है
    नई पीढ़ी शायद ही ,यह समझ सके,या अनुभव कर सके
    आज के दिन यह सुंदर आलेख, प्रस्तुत कर, हमारी स्मृतियों को तरो ताज़ा करनें के लिए
    आपको बधाई।

    • आप इस विषय पर लिखी अपनी ताज़ा कविता साझा कीजियेगा ।

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