राजमाता विजयाराजे सिंधिया की जन्म शताब्दी का आज समापन

भोपाल. 12 अक्टूबर. इंडिया डेटलाइन. सोमवार 12 अक्टूबर को राजमाता विजयाराजे सिंधिया की जन्म शताब्दी का समापन है। मध्यप्रदेश की राजनीति को निर्णायक व ऐतिहासिक मोड़ देने वाली ग्वालियर की यह महारानी अपने आदर्शों, लोक व्यवहार और जनसेवा के कारण भारत के लोकतांत्रिक समाज में ‘राजमाता’ के नाम से प्रतिष्ठित हुईं। 

राजमाता विजयाराजे सिंधिया की आत्मकथा को मनोहर मुलगांवकर ने ‘द लास्ट महारानी ऑफ ग्वालियर’ और मृदुला सिन्हा ने ‘रॉयल टू पब्लिक लाइफ़’ अथवा ‘राजपथ से लोकपथ’ (हिंदी) शीर्षक पुस्तकों में बख़ूबी वर्णित किया है। 

उन्होंने बताया है कि कैसे सागर के नेपाल के निर्वासित शासक राणा परिवार से बंडा के ठाकुर परिवार में ब्याही कन्या ने इस रत्न को जन्म दिया जो बाद में ग्वालियर के राजमहल की रानी बनी और तदनंतर लोकसेवा के लिए जनता के बीच काम करने लगी। 

विजयाराजे अपनी आत्मकथा में सागर से ग्वालियर यानी डिप्टी कलेक्टर पिता के घर से जीवाजीराव के महल तक की यात्रा को इस तरह बताती हैं-(कुछ अंश) 

“सागर, मेरी जन्मस्थली, विंध्याचल की पर्वत मालाओं से घिरा एक रमणीक नगर है। मानचित्र पर यह मध्य प्रांत का नाभि स्थल है। यहां की भव्य हवेली, जिसकी आज दयनीय हालत है, मेरे नानाजी की बनवाई हुई है। इसी में हमारा ननिहाल परिवार निवास करता था। पहाड़ी अंचल पर बने होने के कारण हवेली से नगर और सरोवर का सौंदर्य नयनों को तृप्त करता था। यहां की अद्भुत प्राकृतिक छटा बिल्कुल नेपाल जैसी थी। जनरल राणा खड़ग शमशेर जंग बहादुर, मेरे नाना, नेपाल के सरसेनापति थे। 

संभवत: विधाता ने उन्हें नेपाल के इतिहास में अहम भूमिका निभाने के लिए पृथ्वी पर भेजा था किंतु काल गति के कारण यह संभव न हो सका। आयु के 35 वें वर्ष में उन्हें राजपरिवार के खूनी संघर्ष में नेपाल छोड़ देना पड़ा। वह भारत आए और अंग्रेजी सरकार से आश्रय की याचना की। उन्हें आश्रय तो मिल गया किंतु नेपाल सरकार के दुराग्रह के कारण 2 शर्तें रखी गईं- एक यह कि वे नेपाल की सीमा से लगे किसी प्रांत में निवास नहीं करेंगे। दूसरे भारत में बसे तत्कालीन राणाओं के साथ कोई संपर्क नहीं रखेंगे।

इन्हीं शर्तों से विवश होकर नानाजी को अपने स्थायी निवास के लिए मध्य प्रांत का चयन करना पड़ा। उस समय सागर चारों ओर घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा था। यह भूखंड नानाजी को नेपाल जैसा लगा। परिवार की बोलचाल की भाषा नेपाली थी। मैं जब केवल 2 वर्ष की थी तब नानाजी की मृत्यु हो गई। नेपाल से आने के बाद नानाजी ने देहरादून में काफी जमीन-जायदाद खरीदी थी। नेपाल उनकी आंखों से ओझल होते हुए भी मानस से दूर नहीं हो पाता था। मन ही मन एक विश्वास पल रहा था कि उनके काठमांडू लौटने की घड़ी आएगी। 

सन 1902 के शीतकाल में खडग शमशेर को एक संदेश मिला। संदेश कोलकाता से आया था और अंग्रेजी हुकूमत के एक बड़े अधिकारी उसे लेकर आए थे। उसमें विनम्र किंतु दृढ़ता भरी भाषा में खड़ग शमशेर से मध्य प्रांत में जाकर बसने को कहा गया था। देहरादून छोड़ना अपरिहार्य होने के बाद भी नाना और नानी सागर आ गए। यहां वे काफी सुख चैन से दो दशक तक रहे। सागर में उनका नया जीवन आरंभ हुआ। यहीं उन्होंने अपने बच्चों को पाल-पोषकर बड़ा किया और नए मित्र जोड़े। नानी नेपाल से आते समय अपने साथ काफी सोना-चांदी और जवाहरात लाई थीं। उसके सहारे सागर में दोनों ने अंत तक अत्यंत सुखी जीवन बिताया।

राणा मूलतः राजपूत हैं। जंग बहादुर लगभग 200 साल पूर्व भारत से काठमांडू गए और वहां नेपाल नरेश के अंगरक्षक दल में भर्ती हो गए। बाद में वे सेना के उच्चाधिकारी बने। इन राजपूतों के अपने रीति-रिवाज और कर्मकांड हैं। मेरी नानी भी इन्हीं संस्कारों में पली थीं लेकिन अपनी स्वतंत्र प्रज्ञा और प्रवृत्ति के बल पर सागर जैसे सर्वथा अपरिचित वातावरण में आने के बाद नेपाल की कई पुरानी प्रथाओं को त्यागने का साहस भी उन्होंने दिखाया।

महिलाओं को पढ़ाने-लिखाने के घोर विरोधी राणा परिवार में जन्म लेकर भी मेरी माताजी थोड़ा पढ़ लिख गई थीं। इसका एकमेव कारण सागर की अंग्रेज महिलाएं थीं। अंग्रेज महिलाओं को मिली स्वतंत्रता से मेरे नाना नानी खासे प्रभावित हुए थे। मेरी माताजी स्वयं भी पढ़ने की ओर प्रवृत्त थीं।  नानाजी की लाड़ली बेटी होने के कारण वे ना नहीं कर सके। बेटी को बाहर भेजकर पढ़ाना नानाजी की शान के खिलाफ होता अतः घर में ही पढ़ाने के लिए उन्होंने शिक्षक नियुक्त किए। इस तरह मेरी माताजी मैट्रिक पास कर सकीं। उन दिनों नेपाली परिवारों में मैट्रिक तक शिक्षा पाने वाली मेरी माताजी पहली युवती थीं। यह सूचना पाकर नेपाल के तत्कालीन महाराजा चंद्र शमशेर ने अपनी भतीजी के मैट्रिक परीक्षा पास करने पर बहुत गर्व किया और माताजी को ₹1000 विशेष पुरस्कार के रुप में भेजे। मेट्रिक पास करने के बाद कॉलेज की शिक्षा ग्रहण करने की मेरी माताजी की आंतरिक इच्छा थी। वह अपने पिता की समान दृढ़ निश्चयी थीं। उन्हें लखनऊ के गर्ल्स कॉलेज में दाखिला मिला। 

1917 की बात है। प्रथम विश्वयुद्ध चौथे और निर्णायक वर्ष में पहुंच गया था। अब तक भारत के विभिन्न भागों में कम से कम 10-15 राणा परिवार बस चुके थे। उनमें से अधिकतर के पास काफी धन दौलत थी। राणा परिवारों को विवाह योग्य व्यक्तियों के लिए यहीं के क्षत्रिय समाज में रिश्ते ढूंढने पड़ते थे। राणा परिवार की प्रथा के अनुसार परिवार के पुरोहित ने नानाजी को उनकी बेटी के लिए लड़का सुझाया। लड़का नानाजी की अपेक्षाओं के अनुरूप ही था। नाम था-ठाकुर महेंद्र सिंह। रौबदार व्यक्ति थे। तंदुरुस्त, नजर लगने योग्य,शरीर स्वस्थ। शिक्षा में स्नातक और डिप्टी कलेक्टर के पद पर होने के कारण वेतन भी अच्छा।

बारात आने के बाद नानाजी को पता चला कि दामाद का एक ब्याह पहले हो चुका है। जानकारी मिलते ही नानाजी आपे से बाहर हो गए। किन्तु लाड़ली बेटी ने उन्हें साफ-साफ बता दिय- ‘मैंने महेंद्र सिंह को अपना पति मान लिया है।’ पिता ने लाड़ली बेटी को समझाने-बुझाने के प्रयास किए लेकिन व्यर्थ। अंतत: मेरी माताजी का विवाह डिप्टी कलेक्टर महेन्द्र सिंह से हुआ। 

सागर की छावनी क्षेत्र में नानाजी के कई बंगले थे। उनमें से एक बंगला नंबर 5 में माताजी को प्रसव के लिए रखा गया। वहीं 12 अक्टूबर 1919 को मेरा जन्म हुआ और उसके 9 दिन बाद ही माताजी का देहांत हो गया। मेरे पिता मुझे अपने साथ घर ले जाना चाहते थे किंतु वहां बड़ी मां द्वारा मुझे सताए जाने के भय से नानाजी पिता के घर भेजने के लिए तैयार नहीं थे। मामला अदालत में गया परंतु नानाजी की सार्थक दलीलों के आगे पिताजी की एक नहीं चली। नानाजी और पिताजी में हुए समझौते के अनुसार 7 वर्ष की आयु होने तक मुझे ननिहाल में रहना था उसके बाद पिता के घर।

एक प्रदर्शनी के सिलसिले में नानी ने नई दिल्ली जाने का कार्यक्रम बना लिया। नानीजी के पास उनकी पसंद की 7 सीटों वाली एक ब्यूक मोटर थी। पौ फटने के पहले हमने सागर छोड़ दिया। कुछ खाने-पीने और कुछ चहलकदमी के लिए हम लोग ग्वालियर के किंग जॉर्ज पार्क, जिसे अब महात्मा गांधी उद्यान कहा जाता है, में रुक गए। मेरी उम्र उस समय 10 वर्ष थी। उस समय एक सफेद और एक काले घोड़े पर किशोर-किशोरी आ रहे थे। हमें बताया गया कि वे जीवाजीराव और उनकी बहन कमला राजे थीं। नानीजी के मुंह से निकला-मेरी अच्छी जोड़ी बनेगी। 

सन 1937 में पहली बार मैंने पिता के घर में कदम रखा था। उन दिनों वे झांसी में रहते थे। झांसी के लिए रवाना होते समय मेरी नौकरानी मेरे साथ थी। इसके अलावा नानी ने दो और विश्वासपात्र नौकर मेरे साथ लगा दिए। मैं पिता का सहारा पाकर आश्वस्त हुई। पिताजी ने शायद मेरे शीघ्र विवाह का निश्चय कर लिया था। झांसी पहुंचने के आठ 10 दिनों बाद ही वह मुझे बंडा ले गए। बंडा के चौधरी साहब मेरे पिताजी के विद्यार्थी जीवन के दिनों से ही मित्र थे। चौधरीजी के घर का वातावरण उन्मुक्त था। मेरे मन में संकल्प जागा कि मुझे भी रूढ़ियों व पुरानी धारणाओं को तिलांजलि देकर परिवर्तन के नए युग के स्वागत के लिए तैयार रहना चाहिए। महिलाओं और पुरुषों को समान दर्जा और प्रतिष्ठा देने वाले चौधरी साहब के परिवार से मिलन का मेरा पहला ही अवसर था। चौधरी साहब लड़की और लड़कियों को पढ़ाने-लिखाने के समान रूप से पक्षधर थे अतः उन्होंने आग्रहपूर्वक सलाह दी कि मुझे कॉलेज में दाखिला लेकर उच्च शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए। पिताजी से वचन ले लिया कि मुझे एनी बेसेंट द्वारा बनारस में संचालित महिला कॉलेज में दाखिला दिलाएंगे। बंडा से झांसी लौटने पर मेरे जीवन का आधार तय हो गया। 

बनारस में छात्रावास का जीवन मेरे लिए नया था। वहां मुझे अपना काम खुद ही करना पड़ता था। मेरे मकान की अपेक्षा छात्रावास छोटा था। मेरी अधिकतर रेशमी साड़ियां थीं जबकि अन्य छात्राएं सूती साड़ियां पहनकर आती थीं। मेरी नाक की लोंग में हीरा जड़ा था। मैं आभूषण पहनकर कक्षा में गई तो सारी लड़कियां चौक गईं। एनी बेसेंट कॉलेज सादा जीवन उच्च विचार का प्रतीक था। धीरे-धीरे मैं भी उसी में ढलती गई। सादगी, स्वदेश प्रेम व शाकाहारी भोजन की नींव यहीं पड़ी। 

शादी का पहला प्रस्ताव आई सी एस अधिकारी बीबी सिंह का आया। मेरे पिता उन्हीं के मातहत पदस्थापित थे।  यह प्रस्ताव मेरे पिताजी के मानस पर अंकुरित होने से पूर्व ही खत्म हो गया। महाविद्यालय का प्रथम सत्र प्रारंभ होने के कुछ ही दिनों बाद पिताजी शादी का एक और प्रस्ताव लेकर आए। इस बार युवक का नाम लेफ्टिनेंट चौहान था। हमारे विवाह की तिथि भी पक्की हो गई- 8 मई 1940 । इस बीच दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ और लेफ्टिनेंट चौहान युद्ध के मोर्चे पर चले गए। उन्होंने पिताजी को पत्र लिखा- ‘अब यह शादी टूटी समझें।’ इसके बाद कुंजर मामा, उनकी पत्नी और मेरी नानी ने मुझे कोलकाता ले जाने की योजना बनाई। गाड़ी में कुंजर मामा ने कहा -त्रिपुरा महाराज के अनुज राजकुमार दुर्जय किशोर देव बर्मन के लिए शादी का प्रस्ताव लेकर हम लोग कोलकाता जा रहे हैं। मेरी शादी त्रिपुरा राजपरिवार में नहीं हो सकी लेकिन यह संयोग है कि बाद में मेरी बड़ी बेटी की शादी उसी राजघराने में हुई।

ग्वालियर महाराज के बारे में दुर्जय की बातें मामा ध्यान से सुन रहे थे। उनके मन में अपनी भांजी का रिश्ता ग्वालियर महाराज के साथ तय करने का विचार जाग उठा। जीवाजीराव के रहन-सहन, विचारधारा, इच्छा-अनिच्छा, पसंदगी-नापसंद आदि के बारे में सुन लेने के बाद मामाजी को लगा कि वही उनकी भांजी लेखा दिव्येश्वरी के लिए उपयुक्त रहेंगे। सागर लौटते समय मामा अपने सपने को साकार करने की योजना पर विचार करते रहे। हिज हाइनेस जीवाजीराव मेरे हमउम्र थे। अनुरूप भी थे। मराठा क्षत्रिय थे। उनमें एक साथ सब कुछ मिल गया था। तब देश में 500 से अधिक रियासतें थीं। इतने ही राजे-महाराजे किंतु इक्कीस तोपों की सलामी की हकदार केवल 5 रियासतें थीं। ग्वालियर उनमें से एक थी। मामाजी ने निश्चय कर लिया कि वे अपनी भांजी का विवाह महाराज ग्वालियर के साथ ही करेंगे। यहीं से मेरे जीवन की नई शुरुआत हुई। मैं विजयाराजे सिंधिया बनकर ग्वालियर की महारानी हो चुकी थीं। “

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