Weekly Column Of Political Corridors- राजनीति प्रसाद

महाराष्ट्र की ‘मणिकर्णिका’ तमिलनाडु में ‘थलाइवी’

हिंदी फ़िल्मों की चर्चित नायिका कंगना रनौत क्या तमिलनाडु में आठ महीने बाद आने वाले चुनाव के लिए भाजपा की जमीन तैयार कर रही हैं। यह चर्चा उनकी आने वाली फिल्म ‘थलाइवी’ को लेकर है। अन्नाद्रमुक की नेता व चार बार मुख्यमंत्री रहीं जयललिता पर यह फिल्म बनाई गई है। कंगना जयललिता की भूमिका कर रही हैं। तमिलनाडु में भाजपा अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ेगी। जयललिता के निधन के बाद अन्नाद्रमुक पार्टी कमजोर पड़ गई है जिसका फ़ायदा भाजपा लेना चाहती है। वे कभी राष्ट्रवाऋद तो कभी मोदी की प्रशंसक के तौर पर भाजपा की पसंद हैं। फिल्म ‘मणिकर्णिका’ में रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका का भी वे इसी टोन में हाल में जिक्र कर चुकी हैं। भाजपा चुनाव में ऐसे तरीक़ों का खूब इस्तेमाल करती है। मध्यप्रदेश में उपचुनावों के वक्त ही राजमाता विजयाराजे सिंधिया पर सिक्का जारी किया गया। उनके क्षेत्र में ही सोलह सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं। 

कांग्रेस को अब माधवराव भी ग़द्दार दिखने लगे

नेताओं की आदर्श और सिद्धांत की बातों पर भरोसा वैसे भी अब कोई नहीं करता लेकिन उनको इस क़दर पलटने के उदाहरण कम मिलते हैं। जिन माधवराव सिधिंया को कांग्रेसी अपना चमकता सितारा और प्रधानमंत्री पद तक का पात्र मानते रहे, उनके बेटे के भाजपा में आते ही उन्हें झुठलाने लगे। मप्र के वरिष्ठ कांग्रेस नेता व पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने माधवराव तक को ग़द्दार क़रार दे दिया। जिन माधवराव की कांग्रेस ने एक महीने पहले ही पुण्यतिथि मनाई थी, उन्हें कांग्रेस छोड़ने के लिए ग़द्दार बताया गया। ऐसे ही एक बयान पर पिछले दिनों भाजपा ने पूछा था कि कांग्रेस अर्जुन सिंह, प्रणब मुकर्जी, चिंदंबरम ने भी छोड़ी थी। उन्हें क्या कहेंगे? वर्मा ने रानी लक्ष्मीबाई से सिंधिया परिवार के धोखा देने का आरोप भी दोहराया। ठीक है। पर जब माधवराव शीर्ष कांग्रेस नेता थे, तब इतिहास के इन पन्नों ये आँखें मूँदकर बैठ गए थे। 

शिवराज सरकार घुटनों में

वैसे तो शिवराज सिंह की वह तस्वीर लोकतंत्र का प्रतिनिधि चित्र होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीँ होता। ऐसे दृश्य चुनाव में ही नज़र आते हैं। चुनाव का रंक पाँच साल राजा की तरह बर्ताव करता है। शिवराज सिंह मंदसोर जिले की एक चुनावी सभा में इस तरह मंच पर घुटनों में बैठकर झुक-झुककर जनता को प्रणाम करने लगे। तत्काल सुर्ख़ियाँ बनीं-शिवराज सरकार घुटनों में। शिवराज ने दतिया जिले की सभा में सफाई में कहा-राज्य हमारे लिए मंदिर और जनता देवता है। मैं तो सत्रह बार घुटनों में बैठूँगा। अब से हर सभा में मैं भाषण के पहले घुटनों पर बैठूँगा। पाठकों को याद होगा कि मंदसौर जिले में ही किसानों पर पिछले चुनाव के पहले शिवराज सरकार ने गोली चलवाईं थीं। अब वोट चाहिए तो उनके सामने यह प्रदर्शन करने के अलावा चारा नहीं। कमलनाथ ने कहा-आप सही काम करेंगे तो घुटनों के बल बैठने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

लालू यादव के कुनबे को राहत नहीं

लालू यादव को बिहार चुनाव के ऐन पहले चारा घोटाले में ज़मानत मिलते ही लोग यह सवाल पूछने लगे कि आख़िर नेताओं के साथ ही यह क्यों होता है? लालू के कुनबे ने इसका जश्न भी मना लिया। यह केवल जनता को भरमाना था। असल बात यह थी कि लालू को चारा घोटाले के चार में से एक मामले में ही ज़मानत मिली। दो में पहले मिल चुकी है। चौथे मामले ने क़िस्मत बिगाड़ दी। इसकी सुनवाई दस नवंबर को तब होनी है जब चुनाव का परिणाम आ रहा होगा। अदालत की इस तगड़ी अंटी ने खेल बिगाड़ दिया। 

कमलनाथ को अकेला छोड़ गए दिग्विजय सिंह

कांग्रेस हाईकमान का अजब खेल है। जब मध्यप्रदेश में उपचुनाव का महायज्ञ हो रहा है तब कमलनाथ की राज्य में नैया के एक खेवनहार दिग्विजय सिंह को बिहार में लगा दिया। अब कमलनाथ अकेले ही रण में जूझ रहे हैं। जिनका मिज़ाज और सेहत दोनों ही गवारा नहीं करते। एक जमाने में कांग्रेस के पास मध्यप्रदेश के हर अंचल में दमदार क्षत्रप होते थे। यानी प्रदेश स्तर पर चार-पाँच बराबर क़द के दिग्गज। हाईकमान ने यही पिछले लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य के साथ किया। लोकसभा चुनाव में उन्हें आधे उप्र का प्रभारी बना दिया और विधानसभा चुनाव के वक्त महाराष्ट्र में लगा दिया। 

दलबदलुओं का मौसम

बिहार की बात अभी छोड़िए। मध्यप्रदेश से गुजरात तक दलबदलू विधायकों की बहार है। दोनो ही राज्यों में भाजपा का नया मॉडल कम कर रहा है। कांग्रेस से इस्तीफ़ा दो, भाजपा ज्वाइन करो, भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ो और सत्ता सुख कायम रखो। मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस के बाईस विधायक भाजपा में आए और अब विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। गुजरात में भी ऐसे ही कांग्रेस के सात विधायक केसरिया बाना पहनकर चुनाव मैदान में हैं। इसे क्या कहा जाए? 

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