पटना. इंडिया डेटलाइन. कमल हरि. किसी जमाने के समाजवादी व जेपी आंदोलन के नेताओं के बच्चे भी राजनीति में स्थापित हो चुके हैं लेकिन मध्यप्रदेश से आकर बिहार को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले शरद यादव की संतानें पैर जमाने की कोशिश ही कर रही हैं। बेटे को शरद ने उत्तराधिकारी के तौर पर तैयार करना चाहा लेकिन वे अपना सिक्का नहीं जमा पाए तो अब बेटी कांग्रेस से खुद को आज़माने उतर रही है। यानी शरद की लाइन से अलग। शरद की पार्टी अब एक विधायक तक जिताने की हालत में नहीं है। 

बेटी सुभाषिनी ने बुधवार को ही कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की और लगे हाथ बिहारीगंज से टिकट देना भी तय हो गया। असल बात यह है कि न कांग्रेस के पास उम्मीदवार है और न सुभाषिनी को कोई ठौर है। वे हरियाणा के पुराने नेता राव महावीर सिंह के परिवार में ब्याही हैं। लेकिन बिहार से राजनीति में क़दम रख रही हैं। शरद भी मप्र में जन्मे और जबलपुर से दो बार जीते लेकिन बाद में बिहार का मधेपुरा उनका घर हो गया। इस क्षेत्र से वे जदयू के टिकट पर तीन बार लोकसभा चुनाव जीते। यहाँ के यादवों ने उन्हें अपना नेता मान लिया। यादववाद ही सुभाषिनी को ताकत देता है। 

शरद यादव की लोकतांत्रिक जनता दल ने हालाँकि 52 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। लेकिन खुद शरद अस्पताल में भर्ती होने से चुनाव प्रचार में नहीं आ पा रहे हैं। ऐसे में पार्टी लगभग बिना धनी-धोरी है। शरद जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष रहे लेकिन नितीश कुमार से पटरी नहीं बैठने से पार्टी ने दलविरोधी गतिविधियों के आरोप में बाहर कर दिया जिसके बाद उन्होंने लोजद बनाई। सुभाषिनी इस दल की कमान संभाल सकती थीं लेकिन शायद उन्होंने कमजोरी पहचान ली। कांग्रेस भी यहाँ बहुत कमजोर है और उम्मीदवार घोषित करने में सबसे पीछे है। लेकिन सुभाषिनी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह देख रही हैं। अब शरद बाबू के लड़के का भविष्य कैसे बनता है, यह देखना है। 

जेपी आंदोलन में समाजवादी तबके के मुलायम ने बेटे अखिलेश को, लालू प्रसाद यादव ने तेजस्वी व तेजप्रताप को, देवीलाल ने ओमप्रकाश चौटाला, जिनके बाद दुष्यंत को कमान सौंप दी। शरद इस मामले में पीछे रह गए। यह पहला लोकसभा चुनाव होगा जब शरद यादव प्रचार से दूर रहेंगे। बिहारीगंज मधेपुरा लोकसभा सीट का ही हिस्सा है। सुभाषिनी का मुक़ाबला जदयू के निरंजन कुमार मेहता से होगा।

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