रामकथा  – विजय बुधोलिया

आज जब किसी युवती द्वारा अपने पसंद के युवक से विवाह कर लेने पर समाज में जब इतना हंगामा मचता है,तब यह सोच पाना भी कठिन है कि एक समय ऐसा भी था जब समाज के हर वर्ग में कन्या को अपना  वर चुनने की स्वतंत्रता हुआ करती थी। वैदिक काल में यह विवाह की मान्य पद्धति थी। धीरे-धीरे यह तरीका राजन्यवर्ग तक सिमट कर रह गया। इस हेतु तब स्वयंवरों का आयोजन होता था। राजकुमारी अपने हाथ में वर माला लिए हर राजा/राजकुमार के सामने गुजरती थी और वे स्वयं अपनी वीरता और वैभव का परिचय देते थे। उपस्थित राजकुमारों में से राजकुमारी जिसे सर्वाधिक योग्य पाती,उसे चुन लेती। बाद में स्वयंवर शर्तों के अधीन होने लगे। राजकुमारों के शक्ति और शौर्य की परीक्षा लेने के लिए राजा कोई शर्त रखने लगे। जो कोई उसमें उत्तीर्ण होता, राजकुमारी उसे वरमाला पहना देती और उससे उसका विवाह हो जाता। सीताजी और द्रौपदी का विवाह ऐसी ही शर्तों के अधीन हुआ था। सीता जी के स्वयंवर की शर्त थी  शिव-धनुष का संधान करना और दौपदी के स्वयंवर में ऊपर घूमती हुई मछली की आँख का भेदन करना। संभवत: ऐसी शर्तों को रखने के पीछे राजकन्या के पिता की सोच यह रहती होगी कि जो वर सबसे ज्यादा शूर-वीर,पराक्रमी, बलशाली होगा,वह भविष्य में उनकी पुत्रियों की ठीक से रक्षा कर पाएगा। पर हम देखते हैं कि कन्या के पिता की सारी सावधानी और मंगल-कामनाओं के बावजूद  कई बार जीवन में अनचाहे ही अनहोनी हो जाती है। देखिए न,श्रीराम जैसे पुरुषोत्तम के होते हुए भी सीताजी को रावण के हरण की पीड़ा,अग्निपरीक्षा और त्याग जैसी दु:खदायी और अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा। वहीं द्रौपदी को भी सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन और पांच पतियों के होते हुए भी भरी सभा में सबके सामने चीरहरण जैसी लज्जाजनक स्थिति का सामना करना पड़ा था।

पर यहाँ हम अपनी कथा को सीता स्वयंवर तक ही सीमित रखेंगे। वाल्मीकि रामायण के अनुसार विश्वामित्र जनक के यज्ञ के अवसर पर राम-लक्ष्मण को मिथिला ले जाते हैं और वहाँ पहुँचकर जनक से शिव धनुष दिखलाने की प्रार्थना करते हैं। इस पर जनक कहते हैं कि शिव ने मेरे पूर्वज देवरात को यह धनुष दिया था। सीता के भूमि से प्रकट होने के बाद मैंने प्रण किया था कि जो शिव धनुष को चढ़ा सके,उसी को सीता ब्याह दी जाएगी। बहुत से राजाओं ने प्रयास किया और असफल होने पर उन्होंने मिथिला पर आक्रमण किया। जनक ने देवताओं की सेना से उनको पराजित किया। उस घटना के बहुत काल बाद (सुदीर्घस्य तु कालस्य) राम ने  वह धनुष चढ़ाकर उसे तोड़ दिया, जिस पर दशरथ को बुलाया गया और राम के अलावा लक्ष्मण,भरत और शत्रुघ्न का विवाह भी क्रमश: उर्मिला,मांडवी और श्रुतिकीर्ति से हुआ। बाद की रामकथाओं में सीता-स्वयंवर और राजाओं का आक्रमण,दोनों घटनाओं का राम से संबंध स्थापित किया गया। सीता स्वयंवर में रावणदूत अथवा रावण  के ही आने का प्राय: उल्लेख मिलता है।

राम-विवाह के इस विवरण में धनुर्भंग को महत्वपूर्ण स्थान मिला है,जो कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार है। ‘अनर्घराघव’ में रावणदूत शौष्कल मिथिला में आकर रावण की ओर से सीता को मांगता है और धनुष परीक्षा को रावण के अयोग्य बताता है। ‘सत्योपाख्यान’ के अनुसार बहुत से राजा धनुष-परीक्षा में असफल होते हैं। इसमें प्रहस्त के आने का उल्लेख मिलता है,जो कहता है कि शिव के प्रति श्रद्धा रखने के कारण वह धनुष-परीक्षा में भाग नहीं ले पाएगा। ‘देवी भागवत पुराण’ में रावण सीता से कहता है-‘मैंने तुम्हें जनक से मांगा भी था, किन्तु उन्होंने धनुष-परीक्षा में सफलता ही विवाह की शर्त रखी थी। शिवचाप के भय से मैं तुम्हारे स्वयंवर में सम्मिलित नहीं हुआ। (रुद्रचाप भयान्नाहं सम्प्राप्तस्तु स्वयंवरे)।’ इन वृतान्तों और रघुवंश आदि प्राचीन रामकथाओं में वाल्मीकि के अनुसार धनुर्भंग के अवसर पर अन्य राजाओं की उपस्थिति का उल्लेख नहीं किया गया है। परवर्ती रामकथाओं में राम प्राय: अन्य राजाओं की उपस्थिति में धनुष चढ़ाते हैं। जैसे- नृसिंह पुराण,भागवत पुराण, आध्यात्म रामायण,कंब रामायण,द्विपद रामायण, रामचरितमानस-भूप सहस दस एकइ बारा/लगे उठावन टरइ न टारा।।’

वाल्मीकि रामायण में यद्यपि धनुर्भंग की शर्त जनक द्वारा स्वयमेव रखने का उल्लेख है किन्तु,आनंद रामायण,भावार्थ रामायण,बिर्होर रामकथा आदि के अनुसार खेल-खेल में  सीता के शिव धनुष उठा लेने के बाद ही जनक ने प्रण किया था कि जो उस धनुष को तोड़ेगा उसी से सीता का विवाह होगा। आनंद रामायण में कहा गया है कि सीता के धनुष उठा लेने से जनक ने सीता के लक्ष्मी-अवतार होने के रहस्य को जान लिया था। भावार्थ रामायण के अनुसार परशुराम ने जनक के महल में सीता को धनुष के साथ खेलते हुए देखा और जनक को यह सुझाव दिया कि जो धनुष भंग करने में समर्थ हो,उसी से सीता का विवाह किया जाए।

प्रसन्नराघव में रावण और बाणासुर दोनों आकर धनुष चढ़ाने का प्रयास करते हैं,इस पर रावण सीता हरण का संकल्प करके चला जाता है।पद्मपुराण,बलरामदास रामायण,रामचरितमानस,कवितावली,जानकीमंगल,रामचंद्रिका आदि रचनाएँ सीता-स्वयंवर में रावण और बाणासुर के आने का उल्लेख करती हैं-‘रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरसन गवँहिं सिधारे।।’

आनंद रामायण में इस प्रसंग को और रोचक बना दिया गया। उसके अनुसार रावण ने धनुष उठाने का प्रयत्न किया,पर धनुष उलट गया और रावण उसके नीचे दबकर छटपटाने लगा। जब कोई भी धनुष नहीं उठा सका तब विश्वामित्र ने राम को रावण के प्राण बचाने का आदेश दिया। तोरवे रामायण में भी इससे मिलता-जुलता वृतान्त दिया गया है।

कुछ रामकथाएँ ऐसी भी हैं जिनमें धनुर्भंग जैसी किसी घटना का उल्लेख नहीं है। महाभारत के रामोपाख्यान में न तो धनुर्भंग का प्रसंग और न राम को छोड़कर अन्य भाईयों के विवाह का निर्देश मिलता है। गुणभद्र की उत्तरपुराण में विश्वामित्र की जगह जनक ही दशरथ से राम और लक्ष्मण को अपने यज्ञ की रक्षा के लिए मांगते हैं और राम को पुरस्कार स्वरूप अपनी दत्तक पुत्री सीता प्रदान करते हैं। तिब्बती रामायण के अनुसार सीता कृषकों द्वारा पाली जाती है,इन्हीं कृषकों के अनुरोध से राम अपनी तपस्या को छोड़कर सीता के साथ विवाह करते हैं। खोतानी रामायण में वनवास के समय राम और लक्ष्मण,दोनों के विवाह का उल्लेख किया गया है। ‘दशरथ जातक’ में राम वनवास के बाद अपनी सहोदरी बहन से विवाह करते हैं। जबकि अन्य दो बौद्ध कथा ‘अनामक जातक और दशरथ कथानकम्’ में राम के विवाह का उल्लेख नहीं किया गया है।

सीता-स्वयंवर के समय के सीताजी की आयु कितनी रही होगी,इसका स्पष्ट उल्लेख आदि रामायण में कहीं नहीं मिलता। किन्तु,प्रचलित वाल्मीकि रामायण के बालकांड में सीता-अनुसूया-संवाद के अन्तर्गत विवाह के समय सीता की ‘पतिसंयोगसुलभ’ अवस्था का उल्लेख किया गया है,जिससे तब उनकी आयु १६-१७ वर्ष होने का अनुमान लगाया जा सकता है। यद्यपि इस संबंध में अन्य मत भी हैं।

आधुनिक समय में भी हम विवाह को लेकर बहुत कठोर हैं,जहाँ किसी को इच्छानुसार अपना जीवनसाथी चुनने की छूट नहीं दी जाती है। हमसे तो आदिवासी समाज  बहुत आधुनिक और उदार है,जिसने अपने युवक-युवतियों को अपना जीवन-साथी चुनने का अधिकार दे रखा है। अगर यकीन न हो तो  धार,झाबुआ, खरगोन, बडवानी आदि जिलों में होली के अवसर पर लगने वाले आदिवासी समाज के मेलों(भगोरिया हाट) में आकर देखा जा सकता है,जिसमें कितने उन्मुक्त होकर भील युवक-युवतियाँ अपना जीवन साथी चुनते हैं।

(बुधोलिया रामकथा के अध्येता हैं।)

हरीश मलिक की पेंटिंग

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