उज्जैन.इंडिया डेटलाइन. उज्जैन में पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर शराब कांड ने ही सवालिया निशान नहीं लगाया है बल्कि लगातार हो रही आत्महत्याएँ भी उसके माथे पर बड़ा कलंक लगाती हैं। जिले में ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब किसी आत्महत्या की खबर नहीं आती। अक्टूबर के कैलेंडर के पन्ने ख़ून से रंगे हैं। ये घटनाएँ सामाजिक ताने-बाने का समस्या को कम, प्रशासन की नाकामियों की दास्ताँ ज्यादा कहती हैं। प्रदेश के इस शहर में ज्यादातर घटनाएँ सूदखोरों के उत्पीड़न की वजह से हो रही हैं।  

धर्म की नगरी में 14-15 अक्टूबर को अवैध रूप से बिकने वाली सस्ती शराब ने चौदह जानें ले लीं। इस घटनाक्रम के प्रकाश में आते ही राज्य सरकार ने त्वरित कार्रवाई की। चार पुलिसकर्मी निलंबित किए गए, दस लोग गिरफ्तार किए गए और विशेष कार्यबल बनाकर जांच कराने की घोषणा की गई। लेकिन यहाँ आए दिन ख़ुदकुशी की घटनाएँ अभी वरिष्ठ स्तर पर किसी को परेशान नहीं कर रही हैं। जिला प्रशासन इसी हफ्ते कुछ सक्रिय हुआ और लोगों को बुलाकर विचार विमर्श ही नहीं किया बल्कि कुछ उपाय लागू किए।

जिले में ख़ुदकुशी की खबरें पिछले दो महीने से आए दिन अखबारों की सुर्ख़ियाँ बन रही हैं। लेकिन इस तरफ लोगों का ध्यान खासतौर पर तब गया जब पिछले महीने एक फोटोग्राफर ने जान दी,  जिसके बाद दो सगे कारोबारी भाइयों ने शिप्रा में कूदकर जान दी। इन घटनाओं की प्रारंभिक पड़ताल में ही सूदखोरों द्वारा परेशान करने का मामला सामने आ गया। लेकिन इसके बाद लगातार इस तरह के मामले आ रहे हैं। 

फोटोग्राफर नीलेश शेल्के की आत्महत्या की स्याही तब शहर की कानून-व्यवस्था के दामन पर उछली जब पूरा देश-दुनिया 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या निरोधक दिवस मना रही थी। इसमें भाषण और प्रवचन दिए जा रहे थे पर उज्जैन में आत्महत्या की विकट परिस्थितियाँ पैदा हो चुकी थीं। नीलेश ने सूदखोरों से परेशान होकर आत्महत्या की। सूदखोरों में दो ऐसे लोग शामिल थे जो भाजपा नेता के रूप में रसूख़ का इस्तेमाल कर ब्याज का धंधा चलाते थे और प्रताड़ित करते थे। इन पर प्रशासन ने इनाम घोषित किया व धार से पाँच हजार के इनामी आरोपी को गिरफ़्तार किया। 

शहर के माथे पर गहरी खरोंच लगी दो युवा भाइयों की आत्महत्या से। मेडिकल स्टार्स के संचालक प्रवीण ने गत सप्ताह शिप्रा में कूदकर आत्महत्या की थी। जिसके बाद सोमवार को तीसरे दिन  उनके भाई पीयूष चौहान ने भी शिप्रा में कूदकर जान दी। मेडिकल स्टोर संचालक प्रवीण चौहान को ऑनलाइन लोन देने वाली कंपनी ने 5100 रुपए का लोन दिया था। समय पर चुकाने के बाद भी कंपनी कर्मचारी उसे परेशान कर रहे थे। यही नहीं, कंपनी एप ने उसके मोबाइल की कांटेक्ट लिस्ट चोरी कर ली। कंपनी के कर्मचारी अब रिश्तेदारों को फोन लगाकर कर्ज नहीं चुकाने पर कार्रवाई करने की धमकी दे रहे थे। इसी शर्म की वजह से प्रवीण ने खुदकुशी की। उसके उठावने के दिन भाई भी शिप्रा में कूद गया।

सूदखोरों से परेशान होकर जान देने के मामलों की अब तक लंबी फ़ेहरिस्त बन चुकी है। सूदखोरों से ही परेशान एक दिव्यांग चिकन शॉप संचालक ने जहर खाकर जान देने की कोशिश की। उसने पाँच साल पहले दो लोगों से 1 लाख रुपए ब्याज पर लिए थे। वह बदले में 5 लाख से अधिक रुपए लौटा चुका था। बावजूद उसे परेशान किया जा रहा था। सुसाइड नोट भी पुलिस ने जब्त किया।

इसी तरह, गणेशपुरा के व्यवसायी अरुण पिता मोहनलाल ने जहर खाकर गत शनिवार को खुदकुशी की। उसने अजय, रमाकांत और नरेश कैथवास से ब्याज पर रुपए लिए थे। सूदखोरों ने उसका मायापुरी स्थित प्लाट अपने नाम करा लिया। बावजूद उसे लगातार ब्याज के लिए तंग करते रहे। शनिवार को  दोपहर में अरुण ने जहर खा लिया। 

नागदा के पालिया रोड के किसान ने दो साल पहले बहन की शादी के लिए 1.32 लाख दो लोगों से लिए। दो साल में ढाई लाख से ज्यादा दे चुका। मूलधन ही खत्म नहीं हो रहा था। कीटनाशक पीकर मंगलवार को आत्महत्या कर ली। इस मामले में दो सूदखोर गिरफ़्तार किए गए। 

पंवासा पुलिस ने बुधवार को तीन सूदखोरों पर मुक़दमे दर्ज किए। केसरबाग के एक व्यक्ति ने अस्सी लाख रुपए लिए थे जिन्हें लौटा भी दिया लेकिन वे बारह लाख वापस करने के लिए दबाव बनाने लगे। इसी तरह शास्त्री नगर के हेमेन्द्र चंद्रावत ने फ़िरोज़ पठान के चालीस हजार रुपए के बदले खाली चैक लिए। महाश्वेता नगर के गोपाल चिंचानी ने पंवासा के मोहनलाल विश्वकर्मा पर डेढ़ लाख रुपए के बदले पचीस लाख रुपए चुकाने के बावजूद लगातार और रुपए माँग रहा था। 

सूदखोरों का जाल पूरे संभाग में 

सूदखोरों का जाल उज्जैन तक सीमित नहीं है बल्कि यह रतलाम, मंदसौर, नीमच व शाजापुर सहित बड़े इलाके में फैला है। रतलाम के एक 48 वर्षीय हलवाई बद्रीनाथ पुरोहित ने गुरुवार 15 अक्टूबर को नागदा में जो सुसाइड नोट छोड़ा, उसमें रतलाम, मंदसौर, व नागदा के नौ लोगों के नाम लिखे। 

अन्य कारण से भी आत्महत्याएँ 

गीता कॉलोनी में रहने वाले नगर निगम ठेकेदार 30 साल के शुभम खंडेलवाल की मौत नौ सितंबर को सड़क दुर्घटना में हुई लेकिन उसकी जेब से दो सुसाइड नोट निकले जिनमें नगर निगम के उपयंत्री नरेश जैन,संजय खुजनेरी व तन्मय चीनू द्वारा प्रताड़ित करने की बात कही गई। नगर निगम के ही सफ़ाईकर्मी राजेश गोसर ने जमादार व दरोग़ा पर प्रताड़ना के आरोप लगाकर आत्महत्या की। उसने लिखा कि काम करने के बावजूद उसकी गैरहाजिरी लगाई जा रही थी जिससे उसे महीने में बमुश्किल ढाई से तीन हजार रुपए ही पगार मिल पाती थी। सुदामानगर के शरद पिता ओमप्रकाश यादव ने ख़ुदकुशी की। ये तीनों मामले तीन दिन के भीतर दर्ज हुए। 

भैरवगढ़ थानाक्षेत्र में सिंगावदा गाँव के किसान सुनील राठौर (32) ने क़र्ज़ से परेशान होकर आत्महत्या की। उसकी सोयाबीन की फसल खराब हो चुकी थी। इसके अलावा देवास रोड पर बैंक मेनेजर की 21 वर्षीय बेटी ने आठ अक्टूबर को फाँसी लगा ली। इसके एक दिन पहले सात अक्टूबर को लखेरवाड़ी के व्यापारी सचिन जाधव की ज़हर खाने से मौत हो गई। कोरोनाकाल में कारोबार बंद होने से परेशान था। पाँच अक्टूबर को लगभग ऐसे ही कारण से ऑटो चालक ने आत्महत्या की।

प्रशासन कुछ जागा

शहर में हो रही आत्महत्याओं के बाद प्रशासन ने सुनवाई आयोजित की। इसमें 21 शिकायतें आईं जिनमें से दो वाजिब पाई गईं। दो में से एक में फरियादी गायब हो गया। पुलिस ने तीन दिन पहले प्रबुद्ध लोगों को बुलाकर कार्यशाला की। इसमें रोटरी क्लब ने बिना ब्याज आर्थिक मदद की पेशकश की। कार्यशाला में वरिष्ठ नागरिक पीपी वशिष्ठ का कहना था कि आर्थिक सामाजिक कारण देखे जाएँ। सीए अविनीश गुप्ता ने एक कोष बनाने की बात कही। डॉ अनूप निगम ने सिरे को पकड़ने पर जोर दिया। उनका कहना था विचार से यह सोच शुरू होता है, वहीं काम किया जाए। पुलिस ने हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं लेकिन नागदा के रमाकांत पंडित कहते हैं-’किसी को पता नहीं हैं।’

नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी भोपाल के डीन व समाजशास्त्रियों तपन मोहंती का कहना है कि लोग कोविड के कारण आर्थिक संकट, व्यक्तिगत परेशानी व सामाजिक तनाव झेल रहे हैं। जो इससे निपट नहीं पा रहे हैं, वे जीवन का अंत कर रहे हैं। ऐसे लोगों के मन में आत्महत्या का विचार भाँपते ही उनके निकट के लोगों को परामर्श व चिकित्सकीय सहायता की माँग करना चाहिए। 

हमारी टिप्पणी

मप्र आत्महत्या के मामले में देश में चौथे नंबर पर है। लेकिन हाल की घटनाएँ इस ग्राफ़ के बढ़ने का संकेत कर रही हैं। ऐसी स्थिति में प्रशासन को पुलिस के भरोसे नहीं रहना चाहिए बल्कि उज्जैन में बड़ा सामाजिक अभियान चलाना चाहिए जिसमें न केवल सूदखोरों के खिलाफ सख़्त व दवाबरहित मुहिम चलाई जाए बल्कि वरिष्ठ अधिकारियों की प्रताड़नाओं और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर भी ऐसी ही सख़्ती बरती जाए क्योंकि ऐसे मामले भी आत्महत्या का कारण बन रहे हैं। कोरोना काल में आर्थिक समस्या राष्ट्रीय संकट है। ऐसे मामलों से निपटने के लिए सहायता के हजार हाथ खड़े करने की कोशिश करनी चाहिए। रोटरी क्लब ने जैसी पेशकश की है, वैसे ही अन्य कई संस्थाएँ जोड़ी जा सकती हैं। 

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