सृजन/ राम का धनुष वो बहुत सम्हाल कर रखती थी। कमाल यह था कि अगर उसके में उसके हाथ से मेरे धनुष की डोर भी टूटती.. तो उसकी अम्मी अपनी सलवार से नाडे़ निकालकर धनुष में बांध देती और अपनी चुन्नी से मेरे आंसू पोंछ देती।

माया कौल 

उसके हाथ से मेरे धनुष की डोर भी टूटती तो उसकी अम्मी अपनी सलवार से नाडे़ निकालकर धनुष में बांध देतीं और अपनी चुन्नी से मेरे आंसू पोंछ देती थीं।

पहले ऐसा नहीं होता था..मुझे मेरे थोड़े से समझदार होने के पहले क्या था..कैसे रिवाज़ थे? क्या धर्म था? कितने धर्म थे? नहीं पता ..पर मेरे समझने के बाद मेरा धर्म खेलना हो गया। मन का धर्म,माता-पिता का धर्म मुझे काम सिखाना हो गया। मेरा धर्म अक्सर मां के पिता के धर्म से टकराता रहता था..कभी वो जीतते कभी मैं..।

तब सहेलियों का खेलना बहुत मजेदार था। अक्सर जुबैदा घर की बुजुर्ग बनती और मैं उसकी शिष्या। सारे फैसले कद काठी देखकर होते थे। उतनी ही डांट उसके माता-पिता उसे जमके पिलाते जब वो टाइम से नमाज नहीं पढ़ती। उतनी ही डांट मेरी मां मुझे जमके पिलाती जब मैं शाम की दिया बत्ती में देर कर देती।

अचानक हम बड़े हो गए। स्कूल में पहले नम्बर अच्छे लाने को नेताओं के भाषण सुनते। फिर बुद्धू बक्सा देखते+देखते आदत हो गई।

खेल बहुत पीछे रह गया। अब बहुत से चुनाव हमने और जुबैदा ने साथ-साथ देख लिए है। तब चोरी नमकीन की, मिठाई की, पूड़ियों की करते थे और डर के मारे बिना हाथ धोए ही उकड़ू बैठकर उदरपूर्ति कर लेते थे। राम का धनुष वो बहुत सम्हाल कर रखती थी। कमाल यह था कि अगर उसके घर में उसके हाथ से मेरे धनुष की डोर भी टूटती.. तो उसकी अम्मी अपनी सलवार से नाडे़ निकालकर धनुष में बांध देती और अपनी चुन्नी से मेरे आंसू पोंछ देती। डांट केवल इसलिए पड़ती कि लड़की होकर लड़कों के खेल खेलती हो?और डांट भी दोनों तरफ एक सी पड़ती।

तो दुख दोनों तरफ एक सा ही होता था..और हंसी भी।

आजकल मेरे और जुबैदा के दुख अलग अलग हो गए हैं।

बात करने में एक गर्म हवा सी बहती रहती है। इस प्रदूषण को कोई क्यों नही देखता?

हम बचपन जी चुके, .पर बचपन के किस्से जीना चाहते हैं..हम अपने बीच से गर्म हवा हटाना चाहते हैं..कोई  क्यों नहीं समझता?

मैं रंजिशों की गर्म हवा खत्म करना चाहती हूं..दूर कहीं बहुत नामी गिरामी लोगों ने अलाव जला रखा है। मेरी भरपूर कोशिश है कि गर्म हवा अलाव तक पहुंचने के पहले ही ठंडी बयार में बदल जाए और फिर अलाव का कोई मतलब ही न रह जाए। मुझे अलाव जलाने की व्यर्थता की खीज उन नामीगिरामी व्यक्तियों के चेहरे पर देखने की लालसा है। मैं मेरे और जुबैदा के दुख और सुख एक से करना चाहती हूं।

जुबैदा और क्रिस्टीना, परमजीत कौर और दुल्लो.. अरे आ जाओ सब सहेलियां..देखो अलाव बुझने वाला है हम गोल गोल रानी कित्ता श-कित्ता पानी खेलें।

(कौल तक्षशिला स्व सहायता समूह की संस्थापक हैं। प्रसिद्ध अभिनेता, लेखक, निर्देशक मानव कौल की मां हैं।)

(प्रदेश वार्ता )

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