शिवकुमार विवेक

कांग्रेस को कंधे पर टांगकर भारतीय जनता पार्टी को खदेड़ने का मंसूबा रखना महँगा पड़ रहा है। कांग्रेस उनके ऊपर बोझ बनने लगी है। बिहार के नतीजे यही कहते हैं। परिणामों को मोटे तौर पर देखने वाले भी जान गए कि यदि कांग्रेस अपने खाते की सीटों को बुरी तरह न खोती तो महागठबंधन सत्ता में आ सकता था। आख़िर वह बहुमत के आँकड़े से बारह सीटें ही पीछे रहा। 

कांग्रेस पिछले कई चुनावों में काफी खराब प्रदर्शन करती आ रही है। लेकिन वह उसका अपना मामला था। पर बिहार में सिर्फ उसका भाग्य नहीं परखा जा रहा था, उसके सहयोग से सत्ता का दाँव खेल रहे महागठबंधन के लिए उसकी जरूरत थी। महागठबंधन का नेतृत्व कर रहे राष्ट्रीय जनता दल ने उसे 70 सीटें प्रदान कीं जिनमें से वह सिर्फ 19 ही जीत सकी। उसकी सफलता का प्रतिशत  (स्ट्राइक रेट) मात्र 27 रहा। जो सबसे कम है। यहाँ तक कि वामपंथी दलों से भी कम। बिहार में राजद ने कांग्रेस पर कुछ ज्यादा ही भरोसा किया। दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी अपनी जीर्ण-शीर्ण हालत को नज़रअंदाज़ करके ज्यादा सीटें माँगीं। जिन पर लड़ने के लिए उसे उम्मीदवार तक नहीं मिले।

अब कांग्रेस में पछतावा क्या होगा, राजद और महागठबंधन के दूसरे दल जरूर पछता रहे होंगे। इस संबंध में डॉ. भीमराव आंबेडकर के पोते और महाराष्ट्र के राजनेता प्रकाश आंबेडकर की प्रतिक्रिया गौरतलब है। उन्होंने कहा कि ‘अब कांग्रेस को छोड़कर, क्षेत्रीय पार्टियों को राष्ट्रीय स्तर पर मोदी लहर को रोकने के लिए मिलकर काम करना चाहिए। लोग कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व को अब पसंद नहीं करते।’ बिहार ही क्या, जिन राज्यों में उपचुनाव हुए, उनमें भी कांग्रेस ने बेहद निराशाजनक प्रदर्शन किया। उत्तरप्रदेश को देख लीजिए जहाँ प्रियंका गांधी वाड्रा को राज्य का बागडोर सौंपी गई। कांग्रेस ने पिछले महीने ही वहाँ हाथरस में जबर्दस्त प्रदर्शन कर योगी आदित्यनाथ सरकार को घेरा था। प्रियंका व राहुल दोनों ही वहाँ पहुँचे थे। तब लगा था कि कांग्रेस ने नए सिरे से खड़ा होने की कोशिश कर रही है। लेकिन हाल के उपचुनाव में उसे उप्र की सात में से एक भी सीट नहीं मिल सकी। और तो और, प्रदेश अध्यक्ष अजय सिंह लल्लू के गृह जिले देवरिया की सीट पर उसे केवल 300 वोट मिले। 

असल में कांग्रेस लथपथा रही है। राष्ट्रीय पार्टी और सवा सदी से अधिक पुरानी विरासत के कारण उसे ज्यादा आंक लिया जाता है। राहुल गांधी के तेवरों की तारीफ़ से लगने लगता है कि कोई नेता है जो प्रधानमंत्री को चुनौती दे रहा है। यह मीडिया और बुद्धिजीवियों को भाता है क्योंकि सभी एक मजबूत विपक्ष के पैरोकार हैं। लेकिन चुनावी नतीजों में यह सोच और उम्मीद पोची साबित होती है। 2018 में तीन राज्यों-मध्यप्रदेश, राजस्थान व गुजरात जिसके बाद छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव में सफलता का सेहरा सभी ने राहुल गांधी के सिर पर बाँधा लेकिन सच यह था कि वह न राहुल की सफलता थी, न कांग्रेस के प्रयासों की परिणाम। राजस्थान में वसुंधरा और मध्यप्रदेश में तत्कालीन शिवराज सरकार से जो नाराजगी थी, उसे जनता ने प्रकट किया। यही छत्तीसगढ़ में तत्कालीन सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के मामले में हुआ। इन राज्यों में दो दलीय चुनाव होते हैं। मतदाता के सामने तीसरा मजबूत विकल्प नहीं है जिससे कांग्रेस, जैसी भी हो, चुनना पड़ता है। यह कांग्रेस का पॉजीटिव वोट नहीं होता, भाजपा का निगेटिव वोट डलता है। कांग्रेस ने इसे अपनी ताकत समझने की भूल की। दिल्ली, बिहार, आँध्र, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, झारखंड आदि गिन लीजिए, जहाँ तीसरा मजबूत क्षेत्रीय दल मौजूद है, कांग्रेस खड़ी नहीं हो पाई।

कांग्रेस की दिक़्क़त यह है कि न तो उसके पास ढाँचा है और न सोच। सिद्धांतों की किताब लेकर उसकी नई पीढ़ी उनके हर्फ़ समझ नहीं पा रही। राहुल गांधी रोज ट्वीट करके भाजपा की केन्द्र सरकार पर निशाना साधते हैं जिससे सभी उनकी सक्रियता पर खुश होते हैं लेकिन राहुल संगठन को खड़ा करने के लिए क्या करते हैं? सच तो यह है कि संगठन या सांगठनिक नीतियों पर कोई गंभीर लोकतांत्रिक चर्चा ही नहीं होती। 

क्या आपको याद है कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद कोई गंभीर समीक्षा की गई हो। राज्यों में चुनाव या उपचुनाव के बाद ईमानदार मंथन किया किया हो। तेईस नेताओं ने पिछले दिनों चिट्ठी लिखकर संगठन और आलाकमान की रीति-नीति पर बहस करने की माँग की तो एक दिखावटी बैठक करके उस पर पानी डाल दिया गया। अब फिर बिहार में हार के बाद तारिक अनवर सरीखे कुछ नेताओं ने इसी तरह की बात की है तो उसे भी चतुराई से दरकिनार किया जाएगा। आलाकमान के आसपास मौजूद कुछ नेता हर आलोचना को कवच पर रोककर गांधी परिवार को सुरक्षित कर लेते हैं। ऐसे ही नेताओं में से एक वरिष्ठ दिग्विजय सिंह यह माँग करने की बजाय कि बिहार की हार पर गंभीर चर्चा की जाए, कहते हैं कि नीतीश कुमार तेजस्वी यादव के साथ आ जाएँ। यह मुद्दे से भटकाने की कोशिश है।

जब तक कांग्रेस दूसरों की विफलता से मिल रहे प्रतिसाद पर खुश होती रहेगी या अपने भीतर झाँकने का माद्दा पैदा नहीं करेगी तब तक उद्धार नहीं होगा। अब तो उसे राष्ट्रीय गठबंधनों में शामिल करने में भी नेता परहेज़ करेंगे। ऐसे में भी यदि उसके नेता गांधी परिवार की गणेश परिक्रमा से निकलकर गंभीर चिंतन नहीं करेंगे तो वह इतिहास की नियति को नहीं मिटा सकेगी। उन्हें यह समझना होगा कि गांधी परिवार उसके आंतरिक बिखराव को रोकने के लिए जरूरी हो सकता है, पार्टी के कायाकल्प और जनजुड़ाव के लिए अपरिहार्य नहीं है। 

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