अतीत की बात

अर्थूणा (बांसवाड़ा) का स्तंभ

खोट्टिगदेव का एक विषबुझा तीर उस वीरवर का सिर उड़ा ले गया। वह सिर सीधा ही नर्मदा के जल में गिरा। खोट्टिग कंक का करिश्‍मा देखकर चकित था। उसने कंक की वीरता को प्रणाम किया, उसके गज की पीठ को थपथपाया। वर्षों तक कंकदेव के इस पराक्रम के चर्चे रहे। दो-दो शिलालेखों में उसका यह प्रसंग गेय रहा। कंक का करिश्‍मा मालवा से लेकर गुजरात और नर्मदा के प्रवाह क्षेत्र तक अविस्मरणीय रहा। लेकिन, वागड़ व मालवा के लोगों को अब याद ही नहीं! कालांतर में राजाश्रय में लिखे इतिहास में कौन उसका नाम लेता!

भोपाल.इंडिया डेटलाइन. खलघाट, इंदौर से महाराष्ट्र की तरफ जाने वाले आगरा-बांबे राजमार्ग पर नर्मदा पार करने के पहले उत्तर तट पर स्थित गाँव। वागड़ (वर्तमान बाँसवाड़ा जिसका केन्द्र है।) के वीर सामंत कंकदेव के बलिदान की कहानी कहता है। परमार राजाओं के इस वीर ने दक्षिण के खोट्टिगदेव से युद्ध करते हुए नर्मदा के इसी तट पर वीरगति प्राप्त की थी। खोट्टिगदेव की तलवार से उसका सिर नर्मदा में गिरा था।

भारतविद् डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू लिखते हैं-मालवा के परमार, भोज जिस वंश का प्रतापी राजा हुआ, अपने विशाल साम्राज्य के अलावा कला, संस्कृति और साहित्य के संरक्षक के रूप में विख्यात हैं। कंकदेव वागड़ का परमार सामंत था। मालवा के परमार राजा श्रीहर्ष (सीयक) का बहुत विश्‍वस्‍त। सैनिक भी, सेनापति भी। परमारों के राज्‍य में वागड़ भी शामिल था और यहां होने वाले प्रत्‍येक घटनाक्रम पर निगाह रखने के लिहाज से इस वंश की एक शाखा को यहां भी रखा गया था। यह वंश डंबरसिंह से चला था जो मालवा के राजा कृष्‍णराज या उपेंद्र के उत्‍तराधिकारी वैरिसिंह (प्रथम) का अनुज था। कंकदेव इसी का वंशज हुआ। बाँसवाड़ा और डूंगरपुर दोनों उसके अधिकार में थे। उसके पराक्रम की कहानी शायद ही किसी ने सुनी हो।

सीयक से उसका निकट संबंध इसलिए था कि वह उसका मुंहबोला भाई था। सीयक को हर कदम पर सहयोग करने का उसने प्रण कर रखा था। कई बार सीयक को वह इस बात का भरोसा दे चुका था कि यदि कभी मौका मिला तो वह अपना वचन निभाकर दिखाएगा। प्राण हार जाएगा मगर प्रण नहीं। (इसी सीयक की बेटी मेवाड़ ब्याही गई जिसका पुत्र जैत्त सिंह हुआ जिसने चौहान और चालुक्यों को धोखे में रखकर चित्तौड़ पर, 1236 ई. में कब्जा किया। वह अपने मामा को भी शिकस्त देने वाला रहा, यही कहानी बाद में बप्पा के चरित्र के रूप में विकसित की गई। )

 माही का पानी पीने वाला कंकदेव ठान चुका था कि अपना पानी रहने तक तलवार का पानी नहीं उतरने देगा। वह सीयक के राज्‍य विस्‍तार के लिए किए गए युद्धों में भी पराक्रम दिखाकर अपना दबदबा कायम कर चुका था। उसकी ताकत थे वागड़ के वनवासी। वे शत्रुओं के शिविर में आग लगाकर छावनी को तबाह करने में पीछे नहीं रहते। अर्थूणा के 1179 ई. के शिलालेख में कंकदेव के पराक्रम की गाथा को प्रशस्ति के रूप में लिखा गया है।

मौका आ गया जब कर्णाट के राठौड राजा खोट्टिंगदेव ने सीयक की सेनाओं को घेर लिया। राठौडों के सामने परमारों को अपना पराक्रम साबित करना था। सीयक को जवाब देना ही था। उसने इसकी जिम्‍मेदारी कंकदेव को सौंपी। कंकदेव ने अपने वनवासी शूरवीरों के साथ राठौडों के खिलाफ कूच किया। स्‍वयं हाथी पर सवार था जबकि अन्‍य सैनिक घोडों पर थे या पदाती ही थे। नर्मदा के किनारे पर उसने खोट्टिगदेव को ससैन्‍य ललकारा। यह घमासान खलिघट्ट या नामक जगह पर हुआ। 

यह ‘खलीघाटी’ नाम से जाना जाता था। कुछ दिन पहले जब मैं धार गया था तो वहां से खलीघट जाने वाला रास्ता देखा था। कंकदेव ने बहुत पराक्रम दिखाया। उसने गज पर चढकर युद्ध ऐसा किया कि नर्मदा के जल की उठती लहरों ने भी उसमें जोश को ज्‍वार भर दिया। उसने अपनी तलवार को बहुत करीने से चलाया, कुंत का अपूर्व प्रदर्शन किया और अपने बदन पर पहने हुए कवच तक को हथियार बन दिया था। शूंड में तलवारें लिए परमबली हाथी ने भी राठौड़ सेना का सफाया करने का ठान लिया था। नर्मदा का खलिघट्ट उस गज और गजवीर का पराक्रम देख रहा था। हाथी सेना को कुचलने, काटने में लगा और कंक के कुंत ने बढ़-चढ़कर आते वीरों को भेद दिया था। आगे से आगे वह संहार ही संहार करता चला गया। महावत से ज्‍यादा ज्‍वार सचमुच कंकदेव ने दिखाया।ऐसे गजपति का प्रसंग लिखने में लेखनी को अपना सामर्थ्य भी कम पड़ता दिखा।

मगर, हाथी पकड़ लिया गया। खोट्टिग ने स्‍वयं अपनी आंखों से कंक का यह करिश्‍मा देखा तो चकित था। उसने कंक को नमन किया, उसकी वीरता को प्रणाम किया, उसके गज की पीठ को थपथपाया…। उसकी खबर जब सीयक और अर्थूणा पहुंची तो एक अजीब सन्‍नाटा छा गया। कवियों ने विनम्रभाव से कहा कि वह सुभट था, वीरों का वीर था, जब कंकदेव स्‍वर्ग पहुंचा तो देवताओं की वधुओं ने अपने नेत्र-कमलों में उसकी शौर्यमय छवि को विशिष्‍ट सम्‍मान से विराजित किया।**

सच यह है कि वर्षों तक कंकदेव के इस पराक्रम के चर्चे रहे। दो-दो शिलालेखों में उसका यह प्रसंग गेय रहा। शायद कोई काव्‍य भी लिखा गया हो…। कंक का करिश्‍मा मालवा से लेकर गुजरात और नर्मदा के प्रवाह क्षेत्र तक प्रणम्‍य, अविस्‍मरणीय रहा।***

लेकिन, वागड़ व मालवा के लोगों को अब याद ही नहीं! कालांतर में राजाश्रय में लिखे इतिहास में कौन उसका नाम लेता!

** आरूढो गजपृष्‍ठमदमुतशरासारै रणै सर्वत: 

कर्णाटाधिपतेर्व्‍वलं विदलयंस्‍तलनर्मदायास्‍तटे।

श्रीश्रीहर्ष नृपस्‍य मालवपते: कृत्‍वा तथारिक्षयं,

य: स्‍वर्ग सुभटो ययौ सुरवधूनेत्रोत्‍पलरर्च्चित:।। (उपर्युक्‍त अभिलेख)

*** यही वर्णन पाराहेड़ा गांव की वि. सं 1116 की प्रशस्ति में भी है, जो कि वागड़ के मंडलिक राजा के काल की है। उसमें खलिघट्ट का नाम आया है- रेवाया: खलिघट्ट नामनि तटे युध्‍वा प्रतस्‍थे दिवम् ।

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