लखनऊ से रामेश्वर पांडेय का विश्लेषण 

उत्तरप्रदेश में हाथरस के हाशिये पर जाने और उससे विपक्ष को सम्मानजनक जमीन नही मिलने से क्या वह सबक सीखेगा? हाल में हुए सात सीटों के उपचुनाव के नतीजे और उसके बाद की राजनीति से तो ऐसा क़तई नहीं लगता। इन उपचुनावों में सात में से छह सीटों पर भारतीय जनता पार्टी की विजय हुई तो एक सीट समाजवादी पार्टी को मिली। वह भी उम्मीदवार के व्यक्तिगत प्रभाव से। प्रियंका गांधी वाड्रा के लिए लांचिंग पैड तैयार करने वाली कांग्रेस के छह में चार प्रत्याशियों की ज़मानत ज़ब्त हो गई। आपको यह जानकर हैरत होगी कि इन सीटों पर प्रियंका, अखिलेश, मायावती कोई प्रचार करने के लिए नहीं गया। इस जानकारी से आप इनकी हालत का अंदाज लगा सकते हैं। 

डेढ़ माह पहले हाथरस में दलित लड़की से कथित दुष्कर्म के बाद उसके ख़ुदकुशी करने पर कांग्रेस सड़क पर उतरी थी। तब लग रहा था कि कांग्रेस ही वह दल है जो सड़क पर सरकार से लड़ रहा है। हाथरस कांड को राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश करते भी सिर्फ कांग्रेस दिखी थी। अखिलेश व मायावती इससे दूर बने रहे। ज़ाहिर है कि इसके ठीक बाद होने वाले उपचुनावों में दलित उत्पीड़न और कानून व्यवस्था ही मुद्दा होना चाहिए था। लेकिन इन उपचुनाव में यह मुद्दा तक़रीबन गायब था। इतने जल्दी जिस मुद्दे की हवा निकल गई, वह आख़िर किस बिना पर खड़ा था? झूठ, अफ़वाहों, अर्धसत्यों और खराब राजनीतिक प्रबंधन पर। लोगों ने इस मुद्दे की परतें उधेड़ीं तो संदेह के बीज भी दिखने लगे। लिहाजा इसकी विश्वसनीयता खत्म हो गई। चुनाव के पहले ही हाथरस का विपक्ष का बनाया नरेटिव खत्म हो गया और काउंटर नरेटिव मजबूती से उभर गया।तो कांग्रेस इतने कच्चे व तथ्यात्मक रूप से कमजोर मुद्दे पर बिना होमवर्क किए जूझने मैदान में आ गई थी? सच यही है और यही कांग्रेस की आज की शैली है। 

भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकार ने अपने साधनों और राजनीतिक चतुरता से इसकी हवा निकाली। लिहाजा ठीक बाद आए चुनाव में विश्वसनीयता के मामले में घायल विपक्ष घिसटता हुआ उतरा। स्थानीय नेताओं के सहारे। मैदान में प्रतिद्वंद्वी योद्धाओं के न होने पर भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पूरी ताकत से मैदान में डटे। कहने को तो जब विपक्ष श्रीहीन हो तो मुख्यमंत्री को इतनी ताकत लगाने की जरूरत ही नहीं थी। लेकिन भाजपा की चुनाव लड़ने की यही शैली है कि वह इन्हें भी भरोसे पर नहीं छोड़ती। उपचुनाव में न केवल योगी बल्कि उनके दोनों उपमुख्यमंत्री भी चुनाव क्षेत्रों में गए। पूरी टीम लगी रही। उनके पास सरकार की उपलब्धियों का पिटारा था। मुख्यमंत्री की ‘एक जिला-एक प्रॉडक्ट’ योजना काफी काम करती दिख रही है। केन्द्र की योजनाएँ भाजपा की जमीन बख़ूबी तैयार कर सही हैं, यह हमने उप्र के पिछले आम चुनाव और हाल के बिहार चुनाव में भी देखा। बिहार चुनाव ने यह भी बताया कि प्रवासियों के दुखों के लिए उनके परिजनों ने भाजपा को दोषी नही माना। उप्र में गत विधानसभा चुनाव के समय मतदाता का ऐसा ही सोच नोटबंदी के मुद्दे पर देखा गया था। 

चलिए, विपक्ष की बात पर आते हैं क्योंकि अक्सर यह पूछा जाता है कि राज्य में योगी का विकल्प कौन? चुनाव अक्सर इस नब्ज़ को टटोलने का ज़रिया होते हैं। हाल के उपचुनाव पर इसीलिए गहरी नजर थी। हाथरस के बाद कुछ बदला या योगी सरकार की लोकप्रियता कुछ छीजी, लोग यह देखना चाहते थे। लेकिन छह सीटें भाजपा ने जीतीं। माना कि सत्तारूढ़ सरकारें सत्ता और साधनों के बल पर अक्सर उपचुनाव में सफलता प्राप्त कर लेते हैं लेकिन क्या विपक्ष को पेट का पानी भी नहीं हिलाना चाहिए? उप्र में विपक्ष के तीनों दलों ने यही किया। अखिलेश की सपा तो अगले चुनाव में संभावित सत्ताविरोधी रुझान और मुसलमानों के समर्थन से मुख्य विपक्षी दल का आसन पा लेगी। बसपा तीसरे स्थान पर खिसकने तैयार है। कांग्रेस इनमें कहाँ बैठेगी, यह तय करना है। उसकी वर्तमान हालत कम से कम मुख्य विपक्षी दल बनने लायक भी नहीं है। प्रियंका वाड्रा कभी-कभी दिल्ली से आती हैं। लखनऊ में घर लेने की चर्चा ही होती रही। राहुल गांधी की रणनीतिक सूझबूझ हाथरस में परख ली गई। मायावती भाजपा के फेर में सब कुछ लुटाकर बैठी हैं। पार्टी दिशाहीन दिख रही है। (इंडिया डेटलाइन की बातचीत पर आधारित)

(श्री पांडेय वरिष्ठ पत्रकार हैं। चार दशकों से उप्र के मामलों पर नजर रखते रहे हैं। उत्तरप्रदेश, बिहार व पंजाब में प्रमुख हिंदी अखबारों के संपादक व स्टेट हैड रहे।) 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here