‘बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी।।

सुभद्रा कुमारी चौहान की इस कालजयी कविता ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के चरित्र को आम आदमी की जुबान पर ला दिया। सुभद्रा कुमारी चौहान के अनुसार लोगों ने हरबोलों के मुख से ही इस वीरांगना का चरित्र चित्रण सुना। तो ये हरबोले कौन थे? लोक विषयों के चितेरे श्यामसुंदर दुबे ने बताया-

एक हाथ में लकड़ी का चटकोला लिए, दूसरे में लाठी थामे और कंधे पर झोली लटकाए अक्सर वह सुबह -सुबह दरवाजे पर आ जाता है। उसके आने की सूचना उसकी जोरदार आवाज से मिलती है। वह चटकोला बजाता हुआ अपनी धुन में मस्त गीत गाता रहता है। किसी और भिखारी को भले ही दरवाजे से बिना भिक्षा दिया टरका दिया जाए लेकिन हरबोलों को आटा जरूर दिया जाता है। वह अपना गायन-वादन रोककर आटा पात्र को अपनी झोली में उड़ेलता है और पात्र वापस करते हुए अपनी रौ में पूछ लेता है ‘किनके दान।’ घर वाला घर के सबसे छोटे व्यक्ति का नाम उसे बता देता है और ‘फलां लाला के मिल गए दान हर गंगे।’ इस पंक्ति और इसमें पिरोए गए नाम को अपनी धुन में वह तब तक गाता रहता है जब तक दूसरे दरवाजे पर नहीं पहुंच जाता। जब अगले दरवाजे पर पिछले दरवाजे का नाम पहुंच जाता है तब और कोई दूसरा गीत गाना शुरू करता है। इस तरह वह एक घर से दूसरे घर को घर के सबसे कम उम्र के व्यक्ति के नाम से जोड़ता रहता है। इस प्रक्रिया में उसकी आशीर्वादात्मक गायन शैली में बचपन का विस्तार निरंतर चलता रहता है। हर घर में दुलार का केंद्र बचपन ही रहता है। इसी बचपन का यशोगान सुबह-सुबह इस गायक के मुख से सुनने के लिए उत्सुक रहता है। प्रभात गायक को बुंदेलखंड में वसदेवा या हरबोला कहा जाता है। वसदेवा एक विशेष सामाजिक समुदाय है। इस समुदाय का पेशा गीत गाते हुए भिक्षाटन करना है। एक जमाने में हरबोला अलसुबह दरवाजे पर अपने गीत सुनाकर ही जगाता था। चूंकि इनके गीतों की ध्रुव पंक्ति ‘हर गंगे’ होती है इसलिए उन्हें हरबोला नाम से संबोधित किया गया है। भोर के प्रथम सिरे पर इन्हें सुनना जीवन में स्फूर्ति और उल्लास को भरना है। ये प्रभात बेला में न केवल प्रभु स्मरण के स्थाई आधार थे बल्कि उन बलिदानों आत्माओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करने वाले भी थे जिन्होंने समाज और राष्ट्र हित में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।

बचपन में पढ़ी एक कविता में इनका उल्लेख इस तथ्य की पुष्टि करता है कि हरबोले भी हमारे स्वतंत्रता संग्राम के संदेश को घर-घर पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम रहे हैं।‌ सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘झांसी की रानी’ हरबोले के मुख से सुनी कहानी है: खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी। इस ऐतिहासिक कविता के प्रेरणास्रोत हरबोले रहे हैं। हरबोले सामाजिक जागरण के अग्रदूत रहे हैं। महादानी कर्ण उनके गायन का प्रिय केंद्रीय चरित्र है। इस तरह भी अपनी परंपराओं में पैठे लोग चरित्रों के पीढ़ी दर पीढ़ी वाहक रहे हैं। हरबोलों की वर्तमान पीढ़ी ऐसे गीत विस्तार से नहीं गाती है जिनमें दानवीर और युद्धवीर नायकों की प्रमुख भूमिका रहती थी मगर वह आज भी अपने पुरखों के समान ही घर-घर हर गंगे का गान करती है। ‌दान लेती है। दानदाता घरों के बच्चों के नामों की छाप अपने गीतों में लगाती हैं।

अब वे बड़े सवेरे नहीं आते। दिन चढ़ने पर आते हैं। उनका इस तरह समय आना फबता नहीं है। यदि शास्त्रीय संगीत के रागों की बंदिशों को वेला के आधार पर विभाजित किया गया है और विभिन्न रागों की वेलाएं निर्धारित हैं तो लोक रागनियां भी वेलासिद्ध हैं। हालांकि लोक गायकी के साथ ऐसा प्रतिबंध नहीं है लेकिन इसका मिजाज भी उसे अवेला-कुवेला गाने की इजाजत नहीं देता। बुंदेलखंड की राई रात में ही जाने पर अपना प्रभाव छोड़ती है। इसी तरह हरबोला की लोक रागिनी। मेरे घर जो हरबोला अक्सर आता रहता है उसके सामने मैंने अपनी जिज्ञासा रखी तो उसने अपनी वेला परिवर्तन के दो कारण गिनाए- एक घरों का जागरण काल बदल गया है। यहां तक कि गांव में भी यही स्थिति है। अधिकतर लोगों की सुबह दिन चढ़े होती है। दूसरे गांव देहातों में चोरों-डकैतों के बढ़ते दबाव ने उन्हें मुंह अंधेरे निकलने में हिचक पैदा की है। कोई गृहिणी जानने के बाद भी मुंह अंधेरे अपने घर का दरवाजा नहीं खोलती और ना ही इस वेला में अपने घर के सामने किसी अजनबी की उपस्थिति पसंद है। दोनों कारण हमारी बदलती सामाजिक व्यवस्था के अशुभ की ओर संकेत करने वाले हैं। यह अशुभ हमारे सामाजिक संकट को तो बढ़ाएगा ही, हो सकता है बचे-खुचे हरबोले भी कुछ समय बाद दिखने बंद हो जाएं और एक जीवन बोधिनी लोक रागनी हमारी जीवन जद से बाहर हो जाए।

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