हकीकत यह है कि हार के सबसे बड़े जिम्मेदार खुद कमलनाथ और उनकी कोटरी के खास नेता हैं। लेकिन अब जबकि मामला कांग्रेस का है तो फिर समरथ को दोष देने की हिम्मत यहां भला कौन दिखा सकता है

प्रकाश भटनागर

समस्याओं को निपटाने के अपने-अपने तरीके होते हैं। कानून की पढ़ाई में एक सच्चा किस्सा भी शामिल है। तूफान से घिरे पानी के जहाज के डूबने का संकट पैदा हो गया। कहा गया कि यदि जहाज का वजन कम कर दिया जाए तो इस मुसीबत से छुटकारा पाया जा सकता है। कप्तान ने आदेश दिया कि जहाज पर सवार सभी हब्शियों को पानी में फेंक डाला जाए। ऐसा ही किया गया। क्या यह फैसला सही था? तो ऐसा ही उस कांग्रेस में भी होने जा रहा है, जिसका जहाज मध्यप्रदेश की सियासत के समुद्र में बुरी तरह डगमगा रहा है। पहले अपनी ही गलतियों से सरकार गवां दी। फिर सत्ता में वापस आने की कोशिशों को मतदाता ने नौ के मुकाबले उन्नीस सीटों वाले नतीजे से फेल कर दिया। इस सफीने को डूबने से बचाने के लिए वजन घटाने की वैसी ही कवायद की जा रही है जैसी डूबते जहाज को बचाने के लिए हब्शियों को समुद्र में फेंक कर की गई।

कमलनाथ ने उपचुनाव वाले जिलों के पार्टी अध्यक्षों को तलब किया है। हार की गाज इन में से कइयों पर गिराई जा सकती है। कमलनाथ एक रुक्का दिल्ली दरबार की नजर भी कर चुके हैं। इसमें उन कांग्रेसियों के नाम हैं, जिनकी नियुक्ति खुद कमलनाथ ने पिछले डेढ़ दो साल में की। रेवड़ियां बांटने की तर्ज पर यह काम किया गया था। कमलनाथ ऐसा करने के लिए मजबूर थे क्योंकि तब पार्टी में संगठन के नाम पर ‘निल बटा सन्नाटा’ वाली मनहूसियत पसरी हुई थी। इसलिए जो आया, उसे पद दे दिया गया। कमलनाथ के नजदीकी पदाधिकारी, जिन्होंने प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में मोर्चा खोल रखा था उनके लिए, कहा जाता है कि उनका ब्रीफकेस नियुक्ति पत्रों से ठसाठस भरा रहता था। उनमें केवल व्यक्ति के नाम वाला कॉलम खाली रहता था।

कमलनाथ से मिलने आने वालों के नाम भरकर वे पदों की रेवड़िया बांटते थे। तो अब इन्हीं वजनों को बाकायदा बाहर फेंककर पार्टी के जहाज को डूबने से बचाने का जतन किया जाएगा। जबकि हकीकत यह है कि हार के सबसे बड़े जिम्मेदार खुद कमलनाथ और उनकी कोटरी के खास नेता हैं। लेकिन अब जबकि मामला कांग्रेस का है तो फिर समरथ को दोष देने की हिम्मत यहां भला कौन दिखा सकता है? इधर, भाजपा को देखिए। चुनाव जीतने के लगभग तुरंत बाद कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण का काम शुरू कर दिया गया है। आमतौर पर किसी भी अभ्यास में पहले पढ़ाई होती है और फिर प्रैक्टिकल नंबर आता है। लेकिन यहां सिलसिला अलग है। बात ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके साथ भाजपा में आए लोगों की हो रही है। प्रशिक्षण में यह सब नए भाजपाई भी शामिल होंगे। ताकि नए दल की रीति-नीति से इन्हें पूरी तरह अवगत कराया जा सके। 

यह तो हुई पढ़ाई की बात। जबकि सिंधिया खेमा उपचुनावों में प्रैक्टिकली यह सीख चुका है कि भाजपा क्या है। कैसे इस दल में बाहरियों को चुनाव जिताने के लिए भी संगठन पूरी जान लड़ा देता है। किस तरह ऐसा हो सकता है कि मेहमाननवाजी से नाखुश मेजबान पक्ष के ही लोगों को समझा-बुझाकर नए माहौल के अनुसार पूरे सहयोग के साथ चलने के लिए राजी कर लिया जाता है। बीजेपी को शिवराज सरकार को बचाए रखने के लिए केवल आठ विधायकों की जरूरत थी, लेकिन इस पार्टी ने सभी 28 सीटों पर जान लगा दी। उन्नीस विधायक जितवा लिए। जो नहीं जीते, उन्हें भी देर-सवेर निगम-मंडल में एडजस्ट कर ही दिया जाएगा।

संगठन और अनुशासन के इतने तगड़े समायोजन को व्यावहारिक और प्रायोगिक रूप से देखने के बाद निश्चित ही नए आए लोगों के लिए इस प्रशिक्षण को समझना और उसका लाभ उठाना आसान हो जाएगा। कांग्रेस को चाहिए कि रीति और नीति के लिहाज से अपने और भाजपा के बीच के इस बहुत बड़े अंतर को वह गौर से समझे। इस बात को महसूस करे कि संगठन में मजबूती और सख्त अनुशासन उसकी ज्यादा बड़ी जरूरत बन चुके हैं। क्योंकि इस दल की देश को अब भी बहुत जरूरत है। लोकतंत्र में सशक्त विरोध के लिहाज से इसका अस्तित्व बहुत जरूरी है। खासतौर पर मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में, जहां आज भी किसी तीसरी राजनीतिक ताकत का निर्णायक असर नहीं है। बगैर ताकतवर विपक्ष के किसी भी राज्य में लोकतंत्र की ताकत का क्षरण होना तय है। कमलनाथ जहाज से हब्शियों को फेंकने वाले कप्तान न बनें। खुद के हित के लिए इस तरह के टोटके आजमाने से पहले वह यह सोच लें कि ऐसा कर वह उस पार्टी को कितना बड़ा नुकसान पहुंचा देंगे, जिस पार्टी ने बीते चालीस साल में कमलनाथ को सिवाय फायदों के और कुछ भी प्रदान नहीं किया है। जहाज के बोझ को कम करना ही है तो अब बारी कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं की आती है। पर कांग्रेस में इसे कौन समझेगा?

(भटनागर भोपाल स्थित वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार है।)

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