राकेश अचल


छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार और देशबंधु पत्र समूह के संचालक ललित सुरजन नहीं रहे

बात आज की नहीं, 36 साल पुरानी है। तब मैं 22 का और ललित जी 38 के रहे होंगे। पहली मुलाकात ग्वालियर में हुई थी। बाबू मायाराम सुरजन के अनुचर थे हम सब और ललितजी हमें इसीलिए अपने परिवार का हिस्सा मानते थे।तब देशबंधु की अलग प्रतिष्ठा थी, अलग पहचान थी। हम प्रगतिशील लेखकों के लिए तो बाबूजी, देशबन्धु और ललितजी अलग थे ही नहीं।
लंबी कद-काठी के ललितजी सूट-बूट वाले थे और हम बाबूजी की तरह धोती कुर्ता वाले। कुछ तो था जो हमें बांधे था। उन दिनोंं मैं उनके सामने बहुत छोटा होता था। उन्हें मुझसे बात करने के लिए झुकना पड़ता था। तब वे संपादक ज्यादा थे,लेखक कम। लेकिन लेखकों से लिखवाना वे खूब जानते थे।

ग्वालियर में तब देशबंधु का काम राजेंद्र श्रीवास्तव देखते थे। आज भी देखते हैं लेकिन उन दिनों साहित्य और संस्कृति पर मेरा लिखा अधिक छपता था देशबन्धु में। ललितजी ही इसके पीछे थे। गांवों की दशा दुर्दशा पर वे खूब लिखवाते थे।क्षएक अरसे तक सिलसिला जारी रहा। फिर मैं अपनी नौकरियों में फंसता गया और देशबन्धु के साथ साथ ललितजी से मिलना जुलना कम हो गया। यदा कदा जब भी मिले अभिभावक की ही तरह मिले। एक युग से उनसे मुलाकात नहीं हुई थी। अब जब मिलने की सूरत बन रही थी तो वे अचानक चले गए एक अनंत यात्रा पर।
अब ललितजी जैसे संपादक चिराग लेकर खोजने पर भी नहीं मिलने वाले। खुद उनके अपने लोगों में ललितजी जैसी बात नहीं है। ललितजी के पास करमदी, कलाम था और कला थी, जीने की ललित कला। भगवान ने उन्हें अलग से बनाया था। वे न अपने पिता की अनुहारी थे और न भाइयों जैसे। वे सबसे अलग थे। उनमें जो लालित्य था वो सर्वथा भिन्न था।
ललितजी के जाने से अविभाजित मध्यप्रदेश और अब छत्तीसगढ़िया हिन्दी पत्रकारिता को भारी आघात पहुंचा है।उनकी स्मृतियों को प्रणाम करते हुए विनम्र श्रद्धांजलि।

पत्रकारिता के शिक्षक

मनोज कुमार

एक स्कूल का कपाट बंद हो जाने जैसी खबर ने भीतर तक हिलाकर रख दिया। यह स्कूल कोई और नहीं पत्रकारिता के अग्रज और आधार स्तम्भ ललित भैया का असमय चले जाना है। मेरे जैसे प्रशिक्षु पत्रकार के लिये तो उनका होना ज़रुरी था लेकिन नियती के सामने हम सब नतमस्तक हैं। कोई 17 वर्ष का था जब देशबंधु पत्रकारिता सीखने पहुंचा। एकदम अनघढ। तब भोपाल से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक देशबंधु की छपाई रायपुर में होती थी। ललित भैया आकर पेज देख जाते। कहीं कोई गलती होती तो ना केवल उसके बारे में बताते बल्कि उससे जुड़ा इतिहास भी बता जाते। हम लोग चमत्कृत हो जाते। अपने चश्मे को हाथ में रखने की उनकी आदत थी लेकिन कुछ पढ़ना हो तो पहन लेते थे।
कई यादें हैं। कोई 7-8 पेज की ग्रामीण खेलकूद पर रिपोर्ट को लेकर अपने केबिन में गए और मेरा बुलावा आया। थोड़ा सहमे-सहमे उनके केबिन में दाखिल हुआ। केबिन में घुसते ही उन्होने मेरी तरफ सवाल उछाला- ‘मनोज ये बताओ कि दुर्गा कॉलेज कब से ग्रामीण का हो गया।’ मेरी बोलती बंद हो गई। दुर्गा कॉलेज रायपुर शहर का प्रतिष्ठित कॉलेज है। मेरी रिपोर्ट तो खारिज होना ही थी लेकिन एक सबक जो मिला, वह आज भी याद है।
कितनी बड़ी कापी लिखकर कोई भी ले जाएं लेकिन सपाटे से वे पढ़कर गलती पर निशां लगा देते थे। वे शायद एकमात्र सम्पादक रहे हैं जो देशबंधु के अलावा अन्य अखबारों में नियमित लिखते रहे।
पत्रकारिता का एक बड़ा शिक्षक आज हमें छोड़ गया है। अब हमारी जिम्मेदारी है कि जिस शिद्दत के साथ उन्होंने पत्रकारिता की बड़ी लकीर खींची है, उसे मिटने ना दें।

ललितजी सिर्फ पत्रकार नहीं ,अनूठे व्यक्तित्व थे

-अशोक मनवानी

ललितजी सिर्फ एक पत्रकार नहीं थे बल्कि एक प्रख्यात चिंतक, एक अच्छे मनुष्य, श्रेष्ठ कवि और प्रबुद्ध संपादक भी थे। वे वास्तव में बहुत बेजोड़ व्यक्तित्व के धनी थे। संवेदन शील मनुष्य होने के सभी गुण उनमें थे। साल 1984-85 में सागर विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों के साथ उनके दो दिवस आज भी उस बैच के विद्यार्थियों को याद हैं। पत्रकारिता गुरु भुवनभूषण देवलिया उनके अभिन्न मित्र थे। उनके आग्रह पर ही वे सागर आए थे। ग्रामीण पत्रकारिता के संबंध में उनके व्याख्यान बहुत अनूठे और अनुभव आधारित थे। उल्लेखनीय है कि देशबंधु के रायपुर संस्करण को अनेक बार ग्रामीण पत्रकारिता के लिए स्थापित स्टेट्समैन अवार्ड से नवाजा जा चुका है। देशबंधु रायपुर से जुड़े पत्रकार यह प्रतिष्ठित पुरस्कार कई बार प्राप्त कर चुके हैं।

सुरजनजी से मेरा पत्राचार भी होता था । उन्होंने पत्रकारिता में आने वाले युवाओं को सदैव भरपूर प्रोत्साहन दिया। जब मैं पत्रकारिता की डिग्री कर रहा था तब उन्होंने मुझे रायपुर आ कर देशबंधु में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए कहा था। साथ ही हॉस्टल सुविधा देने की बात भी कही थी। किन्हीं परिस्थितियों के कारण मैं रायपुर ना जा सका और नईदुनिया इंदौर से हमारे बैच के दो विद्यार्थियों को प्रशिक्षण के लिए सहमति प्राप्त होने पर निर्णय बदलना पड़ा। लेकिन बाद में, मैं देशबंधु के रायपुर संस्करण में जब भी कोई सामयिक विषय आलेख के लिए चुनता, ललितजी उसे न सिर्फ स्थान देते थे बल्कि उनसे प्रशंसा के दो शब्द भी सुनने को मिलते और सुझाव के रूप में अपनी बात से वे जरूर अवगत करवाते थे। वे फेसबुक प्रारंभ होने के बाद वैसे फेसबुक मित्र भी बने जिनमें वरिष्ठ होने का कोई दंभ न था। मेरी किसी पोस्ट पर विचार व्यक्त करने में तत्पर रहते ही थे, साथ ही मत भिन्नता हो तो उसे भी व्यक्त करते थे। हाल ही में उन्होंने देशबंधु के प्रकाशन के इतिहास पर लिखे अपने आलेख के बारे में मेरी प्रतिक्रिया जानी तो बहुत प्रसन्न हुए और यह भी कहा कि पढ़ने की आदत बनाए रखो। वे अपने समकालीन मित्रों के साथ ही कनिष्ठ लोगों का भी हौसला बढ़ाते थे। यह जीवन के आखिर तक उनकी आदत में शामिल रहा।
सागर विश्वविद्यालय परिसर ललितजी को बहुत पसंद आया था। यहां की सोशल साइंस बिल्डिंग में कक्षाएं लेते हुए वे बहुत आनंदित हुए थे। साथ ही यूनिवर्सिटी कैंटीन में स्टूडेंटस के साथ चाय पर गपशप की थी। उन्होंने अपनी कुछ कविताएं भी सुनाई थीं। मुझे याद है उन्होंने अपना वो काव्य संग्रह एक डाकिए अर्थात पोस्टमैन को समर्पित किया था। समाज के छोटे से छोटे व्यक्ति को सम्मान देने के हिमायती ललितजी अपनी जीवन यात्रा पूरी कर इतनी जल्दी चले जाएंगे, यकीन नहीं होता। ऐसा लगता है ललितजी हमारे आसपास हैं, वे कहीं नहीं गए।


मूल खबर

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार और हिंदी समाचार पत्र ‘देशबंधु’ के प्रधान संपादक ललित सुरजन का निधन हो गया है। वह 74 वर्ष के थे। सुरजन के परिवार के सदस्यों ने बुधवार को बताया कि आज देर शाम दिल्ली के धर्मशीला नारायणा अस्पताल में सुरजन का निधन हो गया।

परिवार के सदस्यों ने बताया कि सुरजन कैंसर के इलाज के लिए दिल्ली में थे। सोमवार को अचानक मस्तिष्काघात (ब्रेन स्ट्रोक) होने के बाद उन्हें धर्मशीला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान आज शाम उनका निधन हो गया।

सुरजन हिंदी समाचार पत्र ‘देशबंधु’ के प्रधान संपादक थे। उनके परिवार में पत्नी और तीन बेटियां हैं। उनके निधन पर राज्यपाल अनुसुईया उइके और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने दुख जताया है। राज्यपाल उइके ने ट्वीट कर कहा, “वरिष्ठ पत्रकार व देशबंधु पत्र के प्रधान सम्पादक श्री ललित सुरजन जी के निधन का दुःखद समाचार प्राप्त हुआ। पत्रकारिता के क्षेत्र में सुरजनजीेे योगदान को सदैव याद किया जाएगा। मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूं कि दिवंगत आत्मा को शांति एवं परिजनों को संबल प्रदान करें। “

वहीं मुख्यमंत्री बघेल ने अपने शोक संदेश में कहा, “ललित सुरजन जी के निधन की सूचना ने स्तब्ध कर दिया है। आज छत्तीसगढ़ ने अपना एक सपूत खो दिया। सांप्रदायिकता और कूपमंडूकता के खिलाफ देशबंधु के माध्यम से जो लो मायाराम सुरजन जी ने जलाई थी, उसे ललित भैया ने बखूबी आगे बढ़ाया। “

उन्होंने कहा, ” पूरी जिंदगी उन्होंने मूल्यों को लेकर कोई समझौता नहीं किया। मैं ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति और शोक संतप्त परिवार को संबल देने की प्रार्थना करता हूं। “(भाषा)

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