जीवन संगीत केवल मनुष्यों ने गंवाया है पशु-पक्षियों के पास आज भी अपना जीवन संगीत अक्षुण्ण है। मोर ने नाचना नहीं छोड़ा है और गाय के बछड़े ने रंभाना, मेंढक आज भी फुदकते हैं और बंदर उछल-कूद मचाते हैं।‌ हिरणों ने कुलांचें भरना नहीं छोड़ा और सिंह आज भी वन में दहाड़ता है। गंवाया है तो हमने ही।.आइए जीवन संगीत को खोजें।

राकेश अचल

आज न राजनीति की बात है और न किसान आंदोलन की और न कोरोना के टीके की। आज बात कर रहा हूँ ध्वनियों की जो धीरे-धीरे हमारी जिंदगी से विदा ले रहीं हैं। विदा क्या ले रहीं हैं बल्कि उन्हें हमसे छीना जा रहा है। विकास की अंतहीन दौड़ में हम जितना हासिल कर रहे हैं उससे कहीं गंवाते जा रहे हैं। क हमने बीते पचास साल में जितना पाया है उससे ज्यादा गंवाया है। 

अतीत में झाँक कर देखिए, हमारे जीवन का एक अलग था। हर क्रियाकलाप संगीत से आबद्ध था।क् उसकी अपनी लय थी। अपनी ताल थी। अपना सुर था। भारतीयों का ही नहीं, दुनिया के हर हिस्से की मानवता के पास जीवन का संगीत होता है। जन्म से मृत्यु तक संगीत हमारे साथ होता था लेकिन अब जीवन संगीत की यही दुनियां वीरान होती जा रही है. अब जीवन में या तो कानफाडू शोर है या मरघट जैसा सन्नाटा। 

दरअसल जीवन की आपाधापी में हमारा ध्यान गायब होते जीवन संगीत के प्रति है ही नहीं। अब हमारे यहां बच्चों के जन्म पर थालियां नहीं बजाई जातीं। चलिए जीवन संगीत की कुछ ध्वनियों को याद करते हैं। 

आज से कुछ दशक पहले तक आपकी रसोई संगीत का एक केंद्र होती थी। पहली ध्वनि चूल्हे की आग की होती थी। एक ध्वनि सिल-बट्टे की होती थी। एक ध्वनि  चमीटे की थी तो एक फुँकनी की। एक ध्वनि चूल्हे से निकली फूली हुई रोटी को फटकारने की होती थी तो एक ध्वनि दाल, कढ़ी के खदकने की। अब यह सारी ध्वनियाँ नदारद हैं। 

आज रसोईघर में जाइए तो सिल -बट्टे गायब हैं, फुँकनी गायब है, खदकना गायब है,रोटी फूलती है लेकिन फटकारी नहीं जाती। अब रसोई की पारम्परिक और मधुर ध्वनियों के स्थान पर कुकर की सीटी गूंजती है या फिर फ़ूड प्रोसेसर की चीख। ये जीवन का नहीं मशीनों का संगीत है। इसमें न लय है न ताल है। एक कर्कशता है और यही अब हमारा साथ निभा रही है। हमारा खलबट्टा न जाने किस कोने में पड़ा सिसक रहा है। अब हम रसोई को सफेद मिट्टी से पोतकर ‘डिसइंफेक्ट’ नहीं करते बल्कि ‘काला हिट’ इस्तेमाल करते हैं।

जीवन की इन ध्वनियों का पीछा करना अब कठिन ही नहीं अपितु असम्भव सा हो गया है। आजकल मै अपने अंग-वस्त्र अपने हाथ से धोता हूँ। मेरे घर में कपड़े धोने की स्वचलित मशीन है लेकिन इस मशीन से कपड़े धोने से निकलने वाली वे ध्वनियाँ लापता हो गई हैं जो कर्णप्रिय थीं। कपड़ों को फींचने और फुलकने से जो ध्वनियाँ निकलतीं हैं उन्हें मशीने नहीं निकाल सकतीं। आपने कभी अपने बुजुर्गों को बड़े कपडे फींचते [पछीटते] हुए देखा है? ऐसा करते समय कपड़े और शरीर दोनों से जो ध्वनि निकलती है उसमें एक जुगलबंदी होती है। छोटे कपड़ों को हाथ से धीरे-धीरे फुलकने से जो ध्वनि निकलती है उसमें एक मृदुलता  होती  है। अब ये सब ध्वनियाँ गायब हैं।

आज रसोई घर से लेकर स्नानगार तक में पानी की सीधी उपलब्धता है।‌ पहले ऐसा नहीं होता था। पहले हर स्थान पर पानी का संग्रह करना पड़ता था। तब पेयजल घिनौची में होता था। वहां मटकों, कलशों के ऊपर रखा ढक्कन और डंका इस्तेमाल के समय अलग ध्वनि देता था। अब यह ध्वनि गायब है। पहले कुएं से पानी भरत समय खाली बर्तन के पानी पर गिरने, भरने की एक अलग ध्वनि होती थी। पानी खींचते समय घिर्री की अपनी ध्वनि थी और पानी खींचने  के लिए काम करने वाले की अलग ध्वनि, हूँ..हाँ …..अब सब गायब हैं।  अब रसोई में आरओ है, नल है।

अब दरवाजे पर सांकल की ध्वनि सुनने को नहीं मिलती। उसकी जगह ‘कॉलबेल’ ने ले ली है जो या तो डिंग डांग करती है या सरकारी दफ्तरों में लगी घंटी की तरह चीखती है। दरवाजे पर सांकल होती ही नहीं है अब। अब सीढ़ियों पर चढ़ते समय सुनाई देने वाली पदचाप नदारद है क्योंकि हम सीढ़ियां चढ़ते ही कब हैं, लिफ्ट का इस्तेमाल करते हैं। बिजली न हो तो मजबूरी में सीढ़ियां इस्तेमाल की जातीं हैं। अब कप से प्लेट में चाय सुड़कने की ध्वनि गायब है। असभ्यता की निशानी बन गई है बेचारी, सो उसे दफन कर दिया गया। यानी हम ही हैं जो अपने जीवन को अपने हाथों से नीरस बना रहे हैं। 

अतीत में झांकिए और खोजिए उन ध्वनियों को  जो आपने गँवा  दीं हैं। आप संगीत से कोलाहल में खो रहे हैं। अब आपको न हंसना आता है और न रोना। आप दोनों काम नीरसता से करते हैं। हमें याद है कि हमारे  यहाँ बेटी की विदाई हो या किसी की मृत्यु दोनों अवसरों के रुदन की अलग संगीत ध्वनियाँ थीं। अब विदाई पर न बेटी बुक्का फाड़कर रोती है और न परिजन। सब कुछ एक नीरस औपचारिकता में बदल गया है। किसी की मृत्यु पर गांवों में आप परिजनों को रोते हुए सुनिए, एक लय होती थी उस रुदाली में। अब कोई रोता ही नहीं है लय का तो सवाल ही नहीं। सब स्थितिप्रज्ञ हो गए हैं।

आप मेरे कहने पर यदि अपने जीवन से चुराए जा रहे संगीत को टटोलेंगे तो मन पसीज जाएगा। आप फिर महसूस करेंगे जीवन में संगीत की,जीवन की हर गतिविधि,हर क्रिया-कलाप संगीतबद्ध लगेगा आपको। आपको लगेगा की आपका बहुत बड़ा नुक्सान कर दिया है इन मशीनों ने और आपको पता ही नहीं चला ! आपके जीवन के हर क्षेत्र से संगीत  की चोरी हुई है, उसे खदेड़ा गया है ,मारा गया है, दबाया गया है, कुचला गया है .

आज जीवन में जो निराशा है,जो अवसाद है, जो कर्कशता है उसकी एकमात्र वजह जीवनसंगीत का गायब होना ही है।‌ हम दवाओं के जरिये इस निराशा,अवसाद और कर्कशता का इलाज करना चाहते हैं किन्तु जीवनसंगीत को वापस नहीं लाना चाहते। आपको लगता है की आपका इलाज सही दिशा में हो रहा है? मुमिकन है कि आपको मेरी बात रुचिकर लगे और मुमकिन है कि आपको यह सब व्यर्थ का प्रलाप भी लगे लेकिन यदि अवसर मिले तो इस विषय पर सोचिये जरूर। अपने जीवन को टटोलिए अवश्य ताकि आपको पता चल सके कि जीवन में संगीत की अहमियत है या नहीं?

मेरी निजी मान्यता है कि जीवन संगीत हमें इस तरह की भावनाओं से निपटने में मदद करता है और इस तरह शक्ति प्रदान करता है। यह हमारे जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है और हमारे नियंत्रण की भावना को बढ़ा सकता है। यह स्वस्थ भावनाओं का समर्थन करता है और इसलिए विभिन्न शारीरिक के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की संभावना को बढ़ाता है। जीवन संगीत केवल मनुष्यों ने गंवाया है पशु-पक्षियों के पास आज भी अपना जीवन संगीत अक्षुण्ण है। मोर ने नाचना नहीं छोड़ा है और गाय के बछड़े ने रंभाना, मेंढक आज भी फुदकते हैं और बंदर उछल-कूद मचाते हैं।‌ हिरणों ने कुलांचें भरना नहीं छोड़ा और सिंह आज भी वन में दहाड़ता है। गंवाया है तो हमने ही।.आइए जीवन संगीत को खोजें। मिल जाएं तो एक-दूसरे को बताएं।

(अचल मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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