मिलबर्न (न्यू जर्सी, अमेरिका) से सुदेश गौड़ (इंडिया डेटलाइन के लिए विशेष)

पिछले दिनों उत्तरपूर्वी अमेरिका में बर्फ़बारी की चेतावनी दी गई। आम अमेरिकी के लिए इस चेतावनी का मतलब होता है-जब तक जरूरी न हो घर से न निकलें व कुछ दिनों का रोज़मर्रा का जरूरी सामान लेकर अपने घर में जमा कर लें। अमूमन ऐसी सूचना के बाद ग्रोसरी स्टोर्स में एकाएक खरीदारी बढ़ जाती है।ऐसी ही चेतावनी के बाद अपने मेज़बान के साथ मुझे भी एक ग्रोसरी स्टोर जाने का मौका मिला। चूंकि यहां डिब्बाबंद फ्रोजन फूड का चलन ज़्यादा है, इसलिए ज़्यादातर लोगों की ट्रॉली कार्ट में वही भरा होता है। खान-पान सामग्री के अलावा हर ट्रॉली कार्ट में एक और सामग्री ने मेरा ध्यान खींचा वह था- टिशू पेपर रोल के बंडल। उस ग्रोसरी स्टोर में शायद ही कोई ग्राहक रहा हो जिसने ट्वॉयलेट टिशू पेपर रोल के बंडल न खरीदे हों। भारत में चूंकि ऐसे दृश्य सामान्य तौर पर नहीं दिखते हैं तो मेरी भी इस बारे में जिज्ञासा बढ़ी और लोगों से बातचीत की। तब यह जानकर आश्चर्य हुआ कि अमेरिकी लोगों के लिए ट्वॉयलेट टिशू पेपर खाने-पीने की चीजों जितना महत्वपूर्ण  ही नहीं बल्कि उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। उनका मानना है कि शौच प्रक्रिया के दौरान हाथ का सीधे प्रयोग करना स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं होता है। ट्वॉयलेट पेपर के उपयोग से सीधे तौर पर हाथ गन्दे नहीं होते जो प्रकारांतर में हमें बेहतर स्वास्थ्य की गारंटी में मददगार सिद्ध होता है। 

अमेरिका का ठंडा मौसम व ठंडक से बचने के लिए काष्ठ निर्मित भवन भी शौच क्रिया में पानी के उपयोग को अनुकूलता प्रदान नहीं करता है।साथ ही ट्वॉयलेट पेपर का सबसे खास गुण होता है पानी के संपर्क में आते ही उसमें घुल जाना। ट्वॉयलेट पेपर के महत्व के बारे में हमारे एक मित्र ने बताया कि घर पर एक बार खाना न भी मिले तो कहीं भी चाहे रेडीमेड हो, फ्रोजन हो या किसी रेस्तराँ में अरेंज किया जा सकता है पर टिशू पेपर रोल न हो तो इस देश में जीवन ही मुश्किल हो जाएगा क्योंकि इसका कोई विकल्प है ही नहीं । उसकी यह बात सुनकर मेरे  जेहन में वह अमेरिकी वीडियो आ गया जो मैंने अप्रैल 2020 में कोविड लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में देखा था जिसमें ग्रोसरी स्टोर्स लूटने की घटना के दौरान लोगों को ट्वॉयलेट टिशू पेपर रोल के बंडल ले जाते हुए देखा था। तब भारत में टीवी देखते हुए मैं सोच रहा था कि ये लोग आखिर ट्वॉयलेट टिशू पेपर रोल लूटकर क्यों ले जा रहे हैं? उसका उत्तर अब मुझे अमेरिका आने पर समझ में आया। एक ग्रोसरी स्टोर मैनेजर ने भी स्वीकार किया कोई चीज जो किसी भी स्टोर में सबसे पहले ख़त्म होती है वह ट्वॉयलेट टिशू पेपर रोल ही होते हैं। उसने यह भी माना कि उस वक़्त पूरे अमेरिका में सबसे ज़्यादा डिमांड वाली वस्तु ट्वॉयलेट टिशू पेपर ही थे। पता नहीं यह बात कितनी सच है पर चर्चा तो यह भी है कि कुछ पड़ोसियों ने तो अंडे व अन्य जरूरी सामान तक के एवज में ट्वॉयलेट टिशू पेपर दिए थे। इस दौरान सोशल मीडिया में  खासतौर पर टिकटॉक पर ट्वॉयलेट पेपर से जुड़े अनेक मेम्स चर्चित रहे। एक मेम में पिज्जा डिलीवरी ब्वाय को टिप के तौर पर ट्वॉयलेट टिशू पेपर रोल का बंडल देते हुए दिखाया गया था। 

वैसे उस दौरान टिशू पेपर से जुड़े अपराध भी एकाएक बढ़ गए थे। नॉर्थ कैरोलिना पुलिस ने एक ट्रक में चोरी किए गए 18,000 पाउंड (लगभग 9000 किलोग्राम ) ट्वॉयलेट पेपर बरामद किए थे। फ्लोरिडा के मैरियट होटल से ट्वॉयलेट पेपर के 66 रोल चुराने के आरोप में एक व्यक्ति की गिरफ़्तारी भी हुई थी। कई स्टोर मालिकों ने तो दस डॉलर तक में ट्वॉयलेट पेपर का एक रोल बेचा था। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि ट्वॉयलेट पेपर एक आम अमेरिकी के लिए मूलभूत आवश्यकता है जबकि भारत समेत अनेक एशियाई देशों में तो ट्वॉयलेट पेपर लक्जरी की श्रेणी में माना जाता है।

ट्वॉयलेट पेपर की खपत के मामले में पूरी दुनिया में अमेरिका सबसे आगे है। प्रतिष्ठित पत्रिका ‘टिशू वर्ल्ड मैगज़ीन’ के अनुसार 2018 में अमेरिका की प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत खपत 25 किलोग्राम थी जबकि अफ्रीकी व एशियाई देशों में प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत खपत लगभग एक किलोग्राम ही है। ट्वॉयलेट पेपर की वैश्विक प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत खपत 5 किलोग्राम है जबकि यूरोपीय देशों व जापान में प्रति व्यक्ति  वार्षिक औसत खपत 15 किलोग्राम है। अमेरिका अपनी जरूरत का ज़्यादातर ट्वॉयलेट पेपर खुद ही उत्पादन करता है, सिर्फ़ 7.5% ही कनाडा व मेक्सिको से आयात करता है। ट्वॉयलेट पेपर का निर्यात करने वाले देशों में चीन अव्वल है। इसके बाद जर्मनी, जापान, पोलैंड व इटली का नंबर आता है।

इतिहास के परिप्रेक्ष्य में ट्वॉयलेट पेपर-

कागज का ज्ञात इतिहास ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी का मिलता है। मानव इतिहास में ट्वॉयलेट पेपर के तौर पर कागज के उपयोग का ज़िक्र पहली बार चीन में छठी शताब्दी में पाया गया। 589 AD में चीनी विद्वान Yan Zhitui (531-561) ने ट्वॉयलेट पेपर का ज़िक्र करते हुए लिखा था-‘कागज जिस पर महान कंफ्यूशियस के पाँच महाग्रंथ, श्रेष्ठ ऋषियों के नाम से उद्धरण या टिप्पणियां हैं, मैं शौचालय के प्रयोजनों के लिए उपयोग नहीं कर सकता हूं।’

तांग शासन (618-907) के दौरान 851AD में चीन आए एक अरबी यात्री ने भी लिखा है- वे (चीनी लोग) शौच के लिए पानी का उपयोग नहीं करते हैं।वे शौच के बाद कागज का उपयोग करते हैं। मिंग शासन (1368–1644 AD) के दौरान राजभवन के उपयोग हेतु ट्वॉयलेट पेपर के सीमित उत्पादन का जिक्र दस्तावेज़ों में मिलता है।1747AD  में लंदन में लॉर्ड चेस्टरफील्ड ने अपने बेटे को लिखे पत्र में एक व्यक्ति का जिक्र किया था जो सस्ते उपन्यास खरीद कर पहले पढ़ता था फिर पन्ने फाड़कर ट्वॉयलेट पेपर के तौर पर इस्तेमाल करता था।

अमेरिका में ट्वॉयलेट  पेपर के व्यावसायिक उत्पादन का श्रेय जोसफ़ गेयटी को जाता है। 1857 में जोसफ़  ने ‘गेयटी पेपर’ के नाम से ट्वायलट पेपर लांच किया था जो 1920 तक देखा गया।शुरुआती दौर में पेपर के कारण नाली जाम होने की दिक़्क़त भी होती थी।1942 में दो प्लाई वाले सॉफ्ट टिशू पेपर ब्रिटेन में तैयार किया गया था।  ब्रिटेन के वाल्थमस्टाव की सेंट एन्ड्रूव मिल्स का यह ट्वॉयलेट पेपर नर्म व घुलनशील था जो बाद में ब्रिटेन का मशहूर ट्वायलट पेपर ब्रांड एंड्रेक्स के रूप में जाना गया। ट्वॉयलेट पेपर पर लगातार अनुसंधान जारी है और बच्चों व महिलाओं के लिए विभिन्न खुशबू वाले वेट व ड्राई वाइप्स भी आजकल बाजार में मिलते हैं। (इंडिया डेटलाइन)

(गौड़ नवदुनिया भोपाल व दैनिक भास्कर के संस्करणों में संपादक रहे हैं। ) 

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