पत्रकार व सूचना आयुक्त विजय मनोहर तिवारी की ताजा पुस्तक की समीक्षा कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल

पोंगा पंडितों और धर्म गुरुओं के पतन और पाखंड पर लिखना बड़ा आसान है। हिंदू धर्म व संस्कृति पर अमर्यादित टिप्पणियां करना सेकुलरियों के लिए एक फैशन सा है। लेकिन मजाल क्या कि दकियानूस मुल्लाओं और फरेबी मौलानाओं पर कोई लिखने की हिम्मत दिखाए..। पर मित्र विजय मनोहर तिवारी अलग ही माटी के बने पत्रकार हैं..उन्होंने ‘ उफ ये मौलाना’ किताब लिखकर उन सबको एक मुश्त जवाब दिया है, बिल्कुल हिसाब किताब बराबर। यह किताब दरअसल में एक डायरी है जो 52 चैप्टर्स और 430 पृष्ठों के साथ इस कोरोना काल में नुमाया हुई है।

विजय तिवारी जैसा पत्रकार सबकुछ ठोक बजाकर लिखता है ताकि शक-सुबहा की कोई गुंजाइश ही न बचे। 2005 में जब नीति-नियंता इंदिरा सागर बाँध के गेट बंदकर सो रहे थे तब विजय जागते हुए डूबते हरसूद की संवेदनाओं को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे। और वे तब-तक व्याकुल रहे जब-तक कि पूरे ब्योरे को एक किताब  की शक्ल में नहीं उतार पाए..’ हरसूद 30 जून’।

ऐसी ही कुछ ऐसी ही अकुलाहट लॉकडाउन के दरमियान झेली होगी। जब हम सब कमरों में कैद टीवी स्क्रीन पर रहस्यमयी मौलाना शाद उनके मरकज में जमा तब्लीगी जमात के फरेबी ‘फरिश्तों’ का कौतुक देख रहे थे.. या रामायण, महाभारत के सीरियल देखकर राम-कृष्ण के प्रति श्रद्धाभाव में विभोर हो रहे थे तब विजय मनोहर पेन उठाकर डायरी में उन वाकयात को अल्फाज दे रहे थे जो अगली सदी में इतिहास का सबसे बदनुमा अध्याय बनकर याद किए जाने वाले हैं।

कोरोना एक वैश्विक आपदा थी लेकिन मौलानाओं ने उसे अपनी फितरत फैलाने के अवसर के तौर पर इस्तेमाल किया। इस वैज्ञानिक युग में दुनिया की इतनी बड़ी जमात को अँधी खोह में ले जाने का जो काम किया गया जो इस पुस्तक के जरिए वह हमारे सामने हैं वह बेहद ही हैरतअंगेज, डरावना है। चलिए कोरोना या कोविड-19 को लेकर जो तकरीरें आईं उससे हम पेश-ए नजर हो लें फिर आगे की बात करें।

– एक मौलाना साहब ने फरमाया – लंदन के मौलाना अब्दुल रहीम लिंबादा, जो हदीस के ज्ञाता हैं, उन्हें कोरोना वायरस सपने में आया। वायरस ने उनसे कहा- मैं हिंदुस्तान जाकर वहां के लोगों को तबाह और बर्बाद कर दूँगा, जहां मुसलमानों पर जुल्म हो रहे हैं।

– दूसरे मौलाना को इटली में ऐसे सपने आए। चीन में आयशा नाम की महिला से ज्यादती की गई। उसने अल्लाह को दुखड़ा सुनाया। अल्लाह का अजाब तीनों गुनहगारों पर कोरोना के रूप में नगद बरपा।

-हरी झिल्लीदार टोपी पहने एक बुजुर्ग अलीम ने समझाइश दी कि ये जो कमली वाले के रोजे पर कबूतर है, अल्ला-अल्ला करता है..इसे पकाकर खा जाओ..करोना भाग जाएगा..।दर्जन भर से ज्यादा ऐसी ही तकरीरे हैं..जो यूट्यूब, सोशल मीडिया और प्रिंट माध्यमों से आईं। ये सब किताबकार के संदर्भ में सप्रमाण सुरक्षित हैं। खैर चलो, यह मान लेते हैं कि ये सभी के सब दकियानूस कठमुल्ले थे। लेकिन इनके बारे में क्या कहिएगा जो बेंगलुरु में इनफोसिस में इंजीनियर हैं जनाब मुजीब मोहम्मद। ये फरमा रहे थे कि बाहर आओ, हाथ मिलाओ, भीड़ में घुसो और ज्यादा से ज्यादा कोरोना वायरस फैलाओ। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त शहाबुद्दीन याकूब कुरैशी तो और भी गजब के निकले, उन्होंने एक ट्वीट में नरेन्द्र मोदी को कोरोना हो जाने की शुभेच्छा व्यक्त कर दी। 

विजय मनोहर ने देश में रह रहे मुसलमानों की एक कंट्रास्ट झांकी पेश की है, कि ये लोग किस तरह गुरबत में रहते हैं और मुल्ला-मौलाना कैसे इन्हें दोजख में ही बने रहने का बंदोबस्त करते हैं। 

किताब में एक बात स्पष्ट उभरकर आई है कि मुस्लिम प्रभुवर्ग कितना दकियानूस, खुदगर्ज है जबकि आम गरीब मुसलमानों में समाज के प्रति दर्द का रिश्ता अभी भी कायम है। किताब में ये बातें तफ्तील से दर्ज हैं कि एक मुसलमान किस तरह अपने पड़ोसी हिंदू की अर्थी पर कंधा देकर राम नाम सत्य का उच्चार करते हुए चल रहा है। या बेबस होकर अपने घर लौट रहे मजदूरों की भूख की चिंता कर रहा है। 

विजय मनोहर की चिंता में आम भारतीय मुसलमान नहीं अपितु सलीम-जावेद, असगर अली इंजीनियर,और मुनव्वर राणा जैसे लोग हैं। सलीम-जावेद की जोड़ी ने नब्बे के दशक तक फिल्मी जेहाद चलाया। सुल्तान अहमद जैसा फिल्मकार मुल्लाओं की प्राणप्रतिष्ठा और हिंदू धर्मगुरुओं का मजाक उड़ाने के लिए जाना जाता था। नब्बे के दशक तक या जिन फिल्मों के संवाद इस जोड़ी ने लिखे हैं, प्रायः हर दूसरी फिल्मों में आपको अजान की आवाजें सुनाई देंगी। और ऐसे लोगों के कुचक्र में मनमोहन देसाई, यश चौपड़ा जैसे  फिल्मकार भी थे जिन्होंने बिल्ला न.786 को अपनी फिल्मों में सफलता का शुभंकर माना।

आलोक श्रीवास्तव जैसे विख्यात कवि की रचना ‘माँ’ की डंके की चोट पर चोरी करने वाले जनाब मुनव्वर राणा कहते हैं कि इस देश में 35 करोड़ इंसान हैं और 100 करोड़ जानवर। यानी कि इस देश में जो मुसलमान नहीं हैं वे जानवर हैं। यहां आमिर खान जैसे अभिनेता फिल्मकार हैं तो मरहूम इरफान खान जैसे भी। पीके फिल्म में हिंदू मठ मंदिरों के अंधविश्वास की धुर्रियाँ उड़ाने वाले आमिर खान की नजर में ये मौलाना नहीं हैं जो मानते हैं कि काफिरों को मारने के लिए यह कोरोना वायरस अल्लाह की नेमत है। दूसरे इरफान खान हैं जो अपने दकियानूस परिवार में पत्नी सुतपा सिकदर के पारंपरिक व धार्मिक मूल्यों की रक्षा के लिए कुछ भी कर गुजरने को तत्पर रहते थे। इरफान कहते हैं कि सिनेमा सरस्वती और लक्ष्मी का संगम है।

किताब में विजयजी एक और मार्के की बात लिखते हैं- यहां गंगा और जमुना समानांतर संस्कृति नहीं है। गंगा भी देश की है और जमुना भी..जो एक दूसरे में समाकर गौरवशाली संस्कृति रचती हैं। वह संस्कृति सिर्फ और सिर्फ गंगा की है।

हर मुद्दे पर गंगा-जमुनी संस्कृति की दुहाई देने वालों के लिए यह खुला सबक है। किताब में रवीश कुमार पांडेय उर्फ रवीश कुमार तथा दिलीप मंडल जैसे पत्रकारों की भी खबर ली गई है जो आँकड़ों के मकड़जाल को परोसकर कोरोना को भी मोदी की साजिश के रूप में देखते हैं। और वो मंडलजी जो मनुस्मृति पर जूती रखकर देश के राष्ट्रवादी मुसलमान संस्कृतिकर्मियों को गोदी मीडिया का हिस्सा कहते हैं।

चार सौ तीस पन्नों की इस किताब में काफी कुछ है जो बंद और सड़े दिमाग के दरवाजे का ताला खोलता है। सबसे बड़ी बात यह कि..एक-एक वाकए का संदर्भ भी आखिरी पन्नों पर दिया है, ताकि सनद रहे वक्त पर काम आए। कोरोना के कड़वे सबक किताब का निष्कर्ष है..और नसीहत भी..मुसलमानों के रहनुमाओं के लिए  और सियासतदानों के लिए भी..।

और अंत में, अलाउद्दीन खिलजी कालीन जिस निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर ‘गंगा-जमुनी’ तहजीब वाले सेकुलरिए चादर चढ़ाने और सजदा करने जाते हैं, उस औलिया साहब की शख्सियत पर इतिहासकार बरनी के हवाले से लिखते हैं- हिंदुस्तान में इस्लामी परचम को जो भी फतह हासिल हुई, वे सबकी सब शेखुल इस्लाम निजामुद्दीन गयासपुरी की दुआओं का सबूत है। इसकी वजह यह है कि वे अल्लाह के चहेते और करीबी हैं। उनकी ही दुआओं से इस्लामी परचम बुलंदी पर है। ‘उफ ये मौलाना’ उन्हीं को समर्पित।

( शुक्ल मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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