न्यूयार्क से सुदेश गौड़ (इंडिया डेटलाइन के लिए विशेष)

अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति के तौर पर जो बाइडेन के 20 जनवरी को पदभार संभालने के साथ ही भारत अमेरिकी रिश्तों का भी नया अध्याय शुरू होगा। डेमोक्रेट राष्ट्रपति बराक ओबामा और रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बाद डेमोक्रेट बाइडेन के सत्तारूढ़ होने के साथ भारत के लोगों के बीच आशा का नया संचार होना तय है। दोनों देशों के बीच इमीग्रेशन अभी सबसे बड़ा खटकने वाला मसला है। ट्रंप की नीतियाँ इस बारे में थोड़ी ज़्यादा कठोर रहीं थीं। होने वाले राष्ट्रपति बाइडेन व भारतीय मूल की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने इस पर उदारवादी रवैया अपनाने का वादा तो किया है पर सत्ता में आने के बाद आंतरिक दबावों को झेलते हुए इस बारे में कितने कारगर कदम उठा पाते हैं, यह जानने के लिए कम से कम छह माह का इंतज़ार करना पड़ेगा। दूसरा मामला जो बाइडेन व कमला हैरिस अपने भाषण में लगातार उठाते रहे हैं वह है कश्मीर व मानवाधिकार उल्लंघन। भारत को इस मामले के लिए कूटनीतिक प्रयासों के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना पक्ष और मजबूती के साथ रखना होगा। डेमोक्रेटिक सांसदों के बीच इस मुद्दे पर लॉबींग भी तेज करनी पड़ेगी। यह एक ऐसा विषय है जिसमें समय व श्रम दोनों ही ज़रूरत से ज्यादा लगेंगे और परिणाम हमारे चाहे अनुसार आएगा इसकी भी कोई गारंटी नहीं है।

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भारतीय कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बाइडेन ओबामा की टीम में काफी सशक्त सदस्य रहे हैं और ओबामा मोदी की केमिस्ट्री भी उन्होंने देखी है। भारत अमेरिकी संबंधों में जो गति पहले ओबामा काल में, फिर ट्रंप काल में आई, वह अनेक लोगों के लिए किसी पहेली से कम नहीं है। एशिया में चीन पर नकेल बनाए रखने के लिए अमेरिका की मजबूरी है कि वह भारत से अपने संबंध मधुर व दीर्घकालिक बनाए रखे। साथ ही बाइडेन की सत्ता हस्तांतरण टीम में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर लगभग 25 भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक हैं। इनकी मौजूदगी व पहली बार भारतीय मूल की किसी महिला का अमेरिकी उपराष्ट्रपति बनना भारतीयों की उम्मीदों को पंख लगा देती है। अमेरिका के 244 साल के इतिहास में अब तक कोई भी महिला शीर्ष पद तक नहीं पहुँच पाई है।

अगर ओबामा व ट्रंप की तुलना की जाए तो बगैर किसी तकनीकी विश्लेषण या बहस में जाए, आम भारतीय ओबामा को अपने ज़्यादा करीब पाता है। इसका एक बड़ा कारण डोनाल्ड ट्रंप का तुनक मिजाज, अड़ियल व अक्खड़ होना भी था।1947 से 1999 तक भारत अमेरिकी रिश्तों में तल्खी रही। इस दौरान 1959 में राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर, 1969 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन व 1978 में राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर भारत की यात्रा पर आए थे।1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध के बाद बांग्लादेश की आजादी व 1974 में परमाणु परीक्षण के तनावपूर्ण माहौल के बाद राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर की भारत यात्रा काफी महत्वपूर्ण थी। 

प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के सामने परमाणु अप्रसार के मसले पर अमेरिकी दाल न गलने के कारण अगले 22 साल सूखे ही बीत गए।1999 में हुए कारगिल युद्ध में बिल क्लिंटन द्वारा भारत का खुलकर समर्थन करने से ठंडे पड़े आपसी रिश्तों में एक बार फिर गर्मी पैदा हुई। नई सदी 2000 से अब तक यानी पिछले 20 साल में चार अमेरिकी राष्ट्रपतियों की पांच भारत यात्राएं हो चुकी हैं। 2000 में बिल क्लिंटन, 2006 में जॉर्ज बुश, 2010 व 2015 में बराक ओबामा व 2020 में डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की यात्रा की। बराक ओबामा एकमात्र अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जो दो बार भारत की यात्रा पर आए, एक बार पीएम मनमोहन सिंह व एक बार पीएम नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में। 21वीं सदी में भारत अमेरिकी रिश्तों में आयी प्रगाढ़ता का श्रेय के दो प्रमुख कारण माने जा सकते हैं, शीत युद्ध का समापन व भारत का वैश्विक स्तर पर आर्थिक व सामरिक शक्ति के रूप में अभ्युदय। इसी कारण सिर्फ़ दो भारतीय प्रधानमंत्रियों मनमोहन सिंह व नरेंद्र मोदी को ही अपने कार्यकाल में दो-दो अमेरिकी राष्ट्रपतियों की मेज़बानी करने का अवसर प्राप्त हुआ। 

2006 में जार्ज बुश की भारत यात्रा ऐसे समय पर थी जब 2003 में इराक पर हमले के कारण अमेरिका को दुनिया भर की जलालत झेलनी पड़ रही थी। तब भारत ने उसे अपना कंधा उपलब्ध कराया था। बुश की भारत यात्रा का देश में भरपूर विरोध भी हुआ था। वामपंथी सांसदों ने तो बुश के कार्यक्रमों का बहिष्कार तक किया था। इसी यात्रा में ही दोनों देशों के बीच न्यूक्लियर डील का तानाबाना बुना गया। इसके बाद दोनों देशों के बीच संबंधों को नई गति मिली जो शनै: शनै:  प्रगाढ़ता में तब्दील होती गई। ट्रंप के कार्यकाल में भारत अमेरिकी संबंधों में एक अजीब सी गर्माहाहट के साथ कसमसाहट भी थी। दोनों ही नेता टफ निगोशिएटर माने जाते रहे हैं। दोनों ही में शोमैनशिप कूट कूट कर भरी हुई है। ‘हाउडी मोदी व नमस्ते ट्रंप’ इसके साक्षात उदाहरण हैं। दोनों ही एक दूसरे से सीखने व एक दूसरे का परस्पर उपयोग करने में दक्ष भी रहे। नमस्ते ट्रंप के थोड़े दिन बाद ही कोविड के संदर्भ में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की आपूर्ति को लेकर मोदी ट्रंप में तनातनी कौन भूल सकता है? विश्लेषकों की माने तो सभी राजनेताओं के लिए अपने देश की आडियंस के लिए ऐसा करना जरूरी होता है। 

अंतरराष्ट्रीय संस्थान गैलप के एनुअल वर्ल्ड अफेयर सर्वे के अनुसार अमेरिका की नजर में दुनिया में भारत उनका छठवाँ चहेता देश है। भारत के लिए अमेरिका दूसरा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है वहीं अमेरिका के लिए भारत नौवां सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है।

जो बाइडेन और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अमेरिकी  वाणिज्यिक, व्यापारिक, आर्थिक, सामरिक व  सामाजिक रिश्ते और प्रगाढ़ होंगे, ऐसी आशा इसलिए की जा सकती है क्योंकि विश्व के दो श्रेष्ठ लोकतांत्रिक  देश मानवता के कल्याण के लिए इस्लामिक आतंकवाद समेत सभी विध्वंसकारी शक्तियों को समाप्त करने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं। (इंडिया डेटलाइन)

(गौड़ नवदुनिया भोपाल और दैनिक भास्कर के संस्करणों में संपादक रहे है।)

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