नरेन्द्र दुबे

कैलाश सारंगजी अब स्मृति शेष हैं। आपद वर्ष 2020 ने बहुत से लोगों को हमसे हमेशा के लिए छीन लिया, उसमें बुजुर्ग पीढ़ी के लोग ज्यादा हैं। बाल दिवस और मूल दीवाली के रोज यानी 14 नवम्बर 2020 को पूर्व सांसद और वरिष्ठ भाजपा नेता कैलाश सारंगजी भी धर्मराज के धाम को चले गए। यह भी एक संयोग था कि अखिल भारतीय कायस्थ सभा के भूतपूर्व और यशस्वी अध्यक्ष रहे कैलाश सारंगजी की पार्थिव देह कायस्थों के मुख्य पर्व यम द्वितीया की पूर्व दोपहर उनकी कर्मभूमि और प्रिय शहर भोपाल में पंचतत्व में विलीन हुई। सारंगजी, जनसंघ के पितृ पुरुष दिवंगत कुशाभाऊ ठाकरे, सुन्दर लाल पटवा, कैलाश जोशी की पीढ़ी के अंतिम शेष थे। उनके बाद वह पीढ़ी पूरी तरह स्मृति शेष हो गई।

जनसंघ से भाजपा तक की यात्रा के पथिक और भाजपा को सफलता के शीर्ष पर देखने के साक्षी रहे सारंगजी व्यावहारिक राजनीतिक कौशल के धनी थे। वे मूलतः संगठन के आदमी थे। विधि, विधान, नीति और रणनीति तैयार करने में कैलाश सारंगजी को महारत हासिल थी। यूँ तो राष्ट्रीय नेतृत्व का उन्हें विश्वास हासिल था पर ठाकरेजी और पटवाजी के वे सर्वाधिक प्रिय और भरोसे के साथी थे।

लेखक

सारंगजी से मेरी पहली मुलाकात मई 1984 में दमोह में हुई थी। दमोह के कांग्रेस विधायक चंद्रनारायण टंडनजी के निधन के कारण दमोह सीट पर उपचुनाव हो रहे थे। युवा जयंत मलैया भाजपा के प्रत्याशी थे। पटवाजी के नेतृत्व में प्रदेश भाजपा के अधिकांश कद्दावर नेता दमोह विधानसभा क्षेत्र में डेरा डाले थे। चुनाव के संचालक थे सारंगजी। कांग्रेस की तरफ से खुद मुख्यमंत्री अर्जुन सिंहजी सतत दौरा कर रहे थे और हर बड़े नेता को जिम्मेदारी बांट रहे थे। सारंगजी ने कुछ पत्रकारों को मलैया निवास पर ही बातचीत के लिए बुलाया था। मैं भी एक था। उस समय मैं किसी बड़े अखबार से नहीं जुड़ा था। स्थानीय ‘दमोह संदेश’ के अलावा प्रदेश के कुछ अखबारों में फ्रीलांसर के तौर पर लिखता था। सारंगजी से पहली मुलाकात ही इतनी प्रभावी रही कि फिर कभी मुझे परिचय देने की आवश्यकता नहीं हुई। बिलकुल अपरिचित और सामान्य व्यक्तियों को भी अपने परिचय और भरोसे में ले लेने की अद्भुत कला सारंगजी में थी। वह चुनाव भाजपा 9 हजार से ज्यादा वोट से जीती थी। धन्यवाद, एप्रीसियेशन और आभार जताने में सारंगजी कृपण नहीं थे। उन्होंने मेरी कुछ रिपोर्टिंग का हवाला देते हुए मेरे आकलन को सराहा ।

बाद के वर्षों में जब मैं जनसत्ता दिल्ली से जुड़ा तो वे खुश हुए। मुझे मार्गदर्शन भी दिया। सारंगजी खुद भी पत्रकारिता से सम्बद्ध रहे थे, सो वे पत्रकारों के मिजाज, मान और उपयोगिता को जानते थे। सारंगजी ने खुद तो कभी नहीं बताया पर मुझे उनसे ही ज्ञात हुआ जिनसे उन्होंने मेरी तारीफ की थी। भोपाल में महेश पांडेजी और दिल्ली में प्रभाष जोशीजी से मुलाकात में उन्होंने मेरा जिक्र किया था ।

 एक समय सारंगजी का अक्सर दमोह आना होता था। उनके दामाद ब्योहार साहब डायमंड सीमेंट नरसिंहगढ़ में अधिकारी थे। सो राजनीतिक दौरे के साथ ही पुत्री दामाद से मिलना हो जाता था। दमोह में भी उनका एक संबंधी परिवार है। इसलिए सारंगजी दो तीन दिन का समय निकालकर आते थे। उस दरमियान मुलाकात सुलभ हो जाती थी। उनसे हर मुलाकात में कुछ न कुछ सीखने और जानने मिलता था। दल की सीमा से परे वे स्वस्थ राजनीतिक विमर्श करते थे। उनके विगत जमाने की बहुत सी जानकारी से अवगत हो जाते थे। संघ, जनसंघ, भाजपा और ठाकरेजी की विलक्षणता को लेकर कितनी बातें, उनकी बातों से पता चलती थीं। सारंगजी ने ही एक मुलाकात में बताया था कि संयुक्त मध्यप्रदेश में पंडित रविशंकर शुक्ल और कुशाभाऊ ठाकरेजी ही ऐसे नेता थे जिनका समग्र प्रदेश के सुदूर अंचलों के साधारण कार्यकर्ताओं से भी परिचय और जुड़ाव रहता था। सारंगजी अपनी स्मृति में बड़ा इतिहास संजोये रहते थे। सारंगजी की देह भाषा भी बहुत कुछ कह देती थी। मैं अपने पत्रकार मित्रों को यह बताता था कि मध्यप्रदेश के दो राजनेता अपनी आंखों और चश्में की कोर से ही बहुत कुछ कह देते हैं। एक श्री अर्जुन सिंह और दूसरे श्री कैलाश सारंग। ये दूर दृष्टि संपन्न नेता थे और भविष्य को भांप लेते थे ।

उनकी आत्मीयता का एक और अवसर याद आता है ।1990 में आडवाणीजी की  सोमनाथ से अयोध्या राम रथ यात्रा दमोह भी पहुंची थी । मध्यप्रदेश में संयोजन सारंगजी कर रहे थे। आडवाणी ज के साथ रथ पर सारंगजी भी आरुढ़ थे । दमोह के प्रवेश द्वार पर सड़क किनारे दर्शकों में उनकी पुत्री थीं और वहीं मैं भी खड़ा था। अभिवादन किया तो वही चिर-परिचित मंद मुस्कान के साथ जवाब मिला। कुछ इशारा किया तो मैं समझा अपनी पुत्री को कुछ कहा होगा। फिर दोबारा उन्होंने उंगली से मुझे दृष्टिगत कर संकेत दिया। सभा स्थल पर भारी सुरक्षा बंदोबस्त के बीच भी चलते-चलते सारंगजी से बात हो पाई। उतने में भी उन्होंने कुछ ऐसा बता दिया कि हमारी खबर कुछ हटकर फाइल हुई। वे गुणग्राहक थे और मेधा सम्पन्न व्यक्तित्व थे।

सारंगजी जब राज्य सभा में थे तो संसद भवन में कभी-कभार मुलाकात हो जाती थी। वो नरसिंह रावजी की सरकार का समय था। अन्यत्र व्यस्तता के चलते उस समय दिल्ली में ज्यादा समय रहते भी सारंगजी के सान्निध्य से वंचित रहा।इस बात का अफसोस रहा अन्यथा और कुछ महत्वपूर्ण उनसे सीखने मिलता। सारंगजी को खुद तो उनकी सेवा और योग्यता के मान से राजनीति में कम हासिल हुआ। किन्तु बाबा तुलसी दास की कहन- ” बाढ़हि  पूत पिता के धर्मा ” चरितार्थ हो रही है। पिता के पुण्य प्रताप से उनके पुत्र विश्वास सारंग को शुभता प्राप्त हो रही है। वे दूसरी बार शिवराज सिंह सरकार में शामिल हैं । सारंगजी को पुत्र की सफलता से सुकून रहा होगा। स्मृति के वातायन से बहुत सी यादें झोंके की तरह आती हैं। आदरणीय कैलाश सारंग जी की पुण्य स्मृति को श्रद्धा नमन। (इंडिया डेटलाइन)

(दुबे दमोह में जनसत्ता के संवाददाता रहे हैं। ) 

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