उम्मीद की जा सकती है कि वह आने वाले दिनों में देश के नेतृत्व के लिए कमर कसकर खड़े दिखाई देंगे क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने पूर्वजों से सीख लिया है कि राजपथ से लोकपथ पर चलने के लिए किस लोहे की जरूरत होती है। 

राकेश अचल

लेखक ज्योतिरादित्य के साथ

राजनेता के जन्मदिन पर लिखने की मेरी आदत नहीं है। अक्सर ऐसे लेखन से मैं बचता हूँ। बीते सोलह साल में एक बार पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के जन्मदिन पर लिखा था, वो भी सहमते हुए क्योंकि आप जन्मदिन पर आखिर तारीफों के पुल बांधने के अलावा कर क्या सकते हैं और यह काम दूसरी वृत्ति के लेखकों  का है लेकिन भाजपा के युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के जन्मदिन पर मैं साहसपूर्वक लिख रहा हूँ, यह जानते हुए भी कि यह जोखिम का काम है। 

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने आज से अठारह साल पहले जब राजनीति में पहला कदम रखा था। उस समय ‘आजतक’ के लिए उनका पहला लंबा साक्षात्कार मैंने किया था। यह बात ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया के निधन से कोई 20 दिन पहले की है। माधवरावजी को शायद अपने जाने का पूर्वाभास हो गया था। उन्होंने उस रोज मुझे बुलाकर आग्रह किया कि मैं उनके बेटे का इंटरव्यू करूं और निर्ममता के बजाय उदारता से करूं। उस समय ज्योतिरादित्य सिंधिया विदेश से लौटे ही थे और उनके राजनीति में पदार्पण की पूरी तैयारी कर ली गई थी। 

सिंधिया परिवार में राजनीति में प्रवेश नहीं पदार्पण ही किया जाता है। जैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने किया वैसा ही पदार्पण के पिताश्री ने भी किया था।बहरहाल, मैंने रानीमहल के पिछवाड़े बगीचे में ज्योतिरादित्य सिंधिया से एक घंटे तक विविध विषयों पर लम्बी बातचीत की, जिसमें से कोई 22 मिनट का साक्षात्कार ‘आजतक’ पर प्रसारित भी हुआ। उस समय मैंने अनुभव किया कि ज्योतिरादत्य सिंधिया ने सियासत के लिए पूरी तैयारी कर ली है। उन्होंने हर मुद्दे पर एक सधे हुए राजनीतिज्ञ की तरह उत्तर दिए। उनमें बोलते समय कोई हकलाहट नहीं थी। 

अपने पिता के आकस्मिक निधन के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया आम बच्चों की तरह सहमे हुए थे लेकिन जब उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत सम्हालने के लिए लोकसभा उपचुनाव में कदम रखा तब उनका आत्मविश्वास उनके साथ था। शिवपुरी की मुम्बई कोठी में वह अपने पिता के समर्थकों से पूरी विनम्रता से मिल रहे थे और बहुत जल्द उन्होंने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को पूरी तरह सम्हाल लिया। आज उनके राजनीतिक सफर के दो दशक पूरे होने को है और इन वर्षों में वह  पार्टी के एक कद्दावर और संभावनाशील नेता के रूप में सामने आए हैं। 

ज्योतिरादित्य सिंधिया में जिस राजनीतिक परिपक्वता की जरूरत थी अब उसकी कोई कमी नहीं है। उनके व्यक्तित्व में अपने पिता की ही तरह एक चुंबकीय आकर्षण है लेकिन आपको बता दें कि राजनीति में आने से पहले ज्योतिरादित्य को माधवराव सिंधिया का पुत्र होने के कारण कोई “प्रिवलेज”नहीं मिला। वह छात्र जीवन में और बाद में भी आम छात्रों की तरह अपनी प्रतिभा के बल पर आगे बढ़े। जब उन्होंने मर्लिन लिंच और मॉर्गन स्टेनली जैसी इंटरनेशनल फाइनेंस कंपनियों के लिए काम किया तो वहां सिंधिया रियासत के महाराज होने का कोई फायदा नहीं मिला। ग्लोबल प्लेटफार्म पर इन कंपनियों के लिए काम करना चुनौती पूर्ण रहा, क्योंकि यहां किसी को मतलब नहीं था कि कौन महाराज है। यहां तो रिजल्ट देकर ही खुद को श्रेष्ठ साबित करना पड़ा, सिंधिया होकर नहीं।

 ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने पहले  इंटरव्यू में कहा था ‘मेरे हॉवर्ड और स्टैनफोर्ड यूनीवर्सिटी में पढ़ने वाले दिन बहुत अच्छे थे। सबसे ज्यादा खुशी इस बात की थी कि मुझे दोनों वर्ल्ड क्लास संस्थानों में निजी काबिलियत के आधार पर प्रवेश मिला, सिंधिया होने की वजह से नहीं। पढ़ाई पूरी होने के बाद मुझे साढ़े चार साल दो फाइनेंसियल कंपनियों, मर्लिन लिंच और मॉर्गन स्टेनली के साथ काम करने का मौका मिला।’ 

हाल के विधानसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने वजूद को न सिर्फ प्रमाणित किया बल्कि पार्टी के आम कार्यकर्ता और जनमानस को भी यह अनुभूति करा दी कि वे लाम पर हैं। अपने पिता की पीढ़ी के साथ सियासत में मजबूती से खड़े रहकर ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के भावी नेतृत्व की श्रेणी में शामिल हो गए हैं। उनके सामने मौजूद मुख्यमंत्री कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह आने वाले दिनों में सिंधिया के पीछे ही खड़े नजर आएंगे, आगे नहीं क्योंकि समय और परिस्थितयां सिंधिया के साथ हैं।

लोगों को लगता होगा कि हाल की सूबे की सियासत में सिंधिया ने समझौतावादी रुख प्रदर्शित किया लेकिन मेरा मानना है कि वह अपनी सीमाओं में कांग्रेस और अपने समर्थकों के लिए जितना कर सकते थे उतना करने में कामयाब रहे। दस माह पहले हालात यह थे कि सिंधिया को किनारे कर प्रदेश में कांग्रेस की राजनीति की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी लेकिन यह अनहोनी हुई ज्योतिरादित्य को कांग्रेस के नेतृत्व ने हासिए पर खड़ा कर दिया। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तमाम अटकलों, नैतिकताओं और आदर्शों को धता दिखाते हुए उस भाजपा को अपना भविष्य स्वीकार किया जिसमें उनके पिताश्री कभी नहीं गए हालांकि उनके सामने भी विषम परिस्थितियों ने जाल फैलाया था ।

1 जनवरी 2020  को वह 50 साल के हो जाएंगे। यह उम्र परिवक्वता की गवाही देने वाली उम्र है। हम उनके भावी भविष्य के लिए शुभकामनाएं दे सकते हैं। उनसे उम्मीद की जा सकती है कि वह आने वाले दिनों में देश के नेतृत्व के लिए कमर कसकर खड़े दिखाई देंगे क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने पूर्वजों से सीख लिया है कि राजपथ से लोकपथ पर चलने के लिए किस लोहे की जरूरत होती है। 

ज्योतिरादित्य सिंधिया का इसमें कोई दोष नहीं है कि वह एक पूर्व शासक परिवार में जन्मे हैं। उनके जन्म के समय देश से और खुद उनके परिवार से साम॔तवाद विदा ले चुका था। ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी स्वर्गीय राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने सबसे पहले इस बात को प्रमाणित किया और बाद में उनके पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया ने यह जता दिया कि वह राजमहलों में जन्म लेने के बावजूद सच्चे लोकसेवक हैं और जनता के दुःख-दर्द को समझते हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया भी अपने परिवार की इसी लीक पर आगे चल रहे हैं। बदली हुई राजनीति की पटरी पर उनकी रेल तेजी से दौड़े तो बात बने। अभी वह भाजपा की बहुस्तरीय परीक्षाओं से गुजर रहे हैं। भाजपा का वर्तमान दंभी नेतृत्व उन्हें कितना, क्या अवसर देगा, यह भविष्य के गर्त में है। फिलहाल वह शतायु हों और दीर्घकाल तक देश, सूबे और अंचल की सेवा करते रहें। यही सब चाहते हैं। बधाई, शुभकामनाएं। (इंडिया डेटलाइन)

(अचल मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 

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