कविवर गोपालदास नीरज के  जन्मदिन (4जनवरी) पर विशेष/ राकेश अचल

दुनिया में कम ही लोग ऐसे होते हैं जो सभी का शुभ सोचते हों। साहित्य, राजनीति, इतिहास, भूगोल या कोई अन्य क्षेत्र शुभ के सोचने वाले कम ही हैं। भारत में साहित्य जगत के जाज्वल्यमान नक्षत्र महाकवि गोपालदास नीरज ऐसे ही अपवाद हैं। नीरजजी ने जो भी लिखा, अद्भुद लिखा, अपने तरीके से लिखा और आज भी अपने लिखे पर कायम हैं। इस देश की एक साथ अनेक पीढ़ियां नीरजजी से प्रभावित हैं और नीरजजी प्रभावित हैं उस सनातन, शाश्वत भारतीय परम्परा से जिसका कोई ओर-छोर नहीं है। यह परम्परा है परस्पर प्रेम की परम्परा। 

महिलाओं के श्रृंगार का अभिन्न हिस्सा रही चूड़ी के जरिए नीरजजी ने इस प्रेम की व्याख्या कर डाली थी। याद कीजिए-“चूड़ी जैसा प्यार है मेरा,जिसका और न छोर।” सीधे-सपाट शब्दों में प्रेम की व्याख्या अद्भुद है। नीरजजी ने भारतीय सिनेमा के लिए कोई 110 गीत लिखे। इनमें से एक-दो को छोड़कर सबके सब अमर हो गए। अमर इस मायने मे कि इन गीतों को आज भी देश गुनगुनाता है।

इंसानियत के लिए नीरज के गीत धरोहर हैं। उन्होंने सीना ठोककर कहा था-बस यही अपराध में हर बार करता हूँ, आदमी हूँ ,आदमी से प्यार करता हूँ।” यह गीत सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि नीरजजी का एक हलफनामा है,वजिस पर हर भारतीय अपने हस्ताक्षर करना चाहता हूं। समूची मानवीयता के लिए इससे बड़ा और कोई दूसरा उद्घोष कोई और  हो सकता है क्या ?

नीरज ने भारतीय साहित्य के सभी वादों का सामना किया और टिके रहे। उन पर न छायावाद हावी हो सका और न हालावाद। वह निरंतर सदाबहार बने रहे। भारत में जनता जितना किसी फ़िल्मी महानायक को जानती या स्नेह करती है उससे कहीं ज्यादा नीरज को चाहती है। वह आज भी जनता के हीरो हैं और पता नहीं कब तक रहेंगे। इन्हें याद रखने में पल भर नहीं लगता लेकिन भुलाने में ज़माने लग जाएंगे। यह भरोसा खुद नीरज को भी है।

सिनेमा के इतर नीरजजी के साहित्य पर लगातार लिखा जा सकता है, लेकिन मैं आज केवल जनता के नीरज की बात कर रहा हूँ जो जाफरान की खुश्बू को पहचानता है, शोखियों में शराब घोलकर नया नशा तैयार करने का फन जानता है, जो किसी की याद में लिखे खतों को कभी फूल तो भी सितारे बना सकता है. और जिसमें इतना साहस है जो गुजरते कारवां को और उसके गुबार को देख सकता है।

ऐसे ही नीरज आज होते तो वे  ९६ साल के हो रहे होते. छह साल पहले जब मैं उनसे मिला था तब  नीरजजी पूरी तरह सक्रिय,चेतन और मस्त थे। अपने सदाबहार गीतों के साथ,समुझे उनसे इस शुभ दिन सत्संग का अवसर मिला था। यदि आप भी इस महानयक के मुरीद हैं तो आइए, दीजिए उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं, ताकि वह लगातार हमारी सुधियों में रहकर गा सकें-’रंगीला रे…….’(इंडिया डेटलाइन) 

(अचल व डॉ. सचिन शर्मा, तत्कालीन सम्पादक,अमर उजाला,अलीगढ़)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here