राजनीति प्रसाद

अपने मुरैना वाले मुन्ना की आज कठिन परीक्षा है। मोदी सरकार ने किसानों के आंदोलन को समाप्त कराने का टास्क दे दिया है। आज दोपहर किसानों से आर-पार की बातचीत है। वरना किसानों ने न केवल आंदोलन तेज करने का ऐलान कर दिया है बल्कि गणतंत्र दिवस परेड को डिस्टर्ब करने की चेतावनी दे दी है। सो मुन्ना यानी केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर को आंदोलन खत्म कराने में अपनी क़ाबिलियत साबित करनी है। वैसे ही केन्द्र में इस आंदोलन की मिस हैडिलिंग के आरोप तोमर के खाते में आ चुके हैं। सो, रविवार को वे राजनाथ सिंह से गुरु मंत्र लेने गए। राजनाथ इस मामले में मोदी सरकार के संकट मोचक की भूमिका में आ गए हैं। पिछले हफ्ते उनके एक बयान से किसानों में साफ्ट कार्नर पैदा हुआ था।

कांग्रेस में पदाधिकारियों की फौज 

तेज़ चले तो खूब तेज चले। तमिलनाडु में चार-पाँच माह में विधानसभा चुनाव आने वाले हैं। इसे देखते हुए कांग्रेस कमेटी का पुनर्गठन किया गया और 32 उपाध्यक्ष, 57 महासचिव, 104 सचिवों के साथ 38 सदस्यों की चुनाव अभियान समिति बना दी। इतनी लंबी-चौड़ी फौज पर खुद कांग्रेस में ही सवाल उठे। प्रदेश कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि सब नेता पदाधिकारी बन गए, अब सिर्फ कार्यकर्ता बचे हैं। पी चिदंबरम के बेटे और  शिवगंगा से सांसद कार्ति चिदंबरम ने इसके औचित्य पर प्रश्न किया-’इतनी बड़ी फौज कोई मकसद नहीं सधेगा। किसी का कोई जवाबदेही नहीं रहेगी’  एक नेता ने पूछा कि जब उत्तरप्रदेश में प्रियंका गांधी ने इतनी बड़ी कमेटी नहीं बनाई तो यहाँ क्या जरूरत थी। 

संभाजीनगर के नाम पर झगड़ा

महाराष्ट्र में शिवसेना सांसत में फँसी है। कांग्रेस-एनसीपी के साथ गठबंधन में उसका शिवसेनत्व खो रहा है। सत्ता की ख़ातिर समझौता कर रही है और अपने एजेंडे को छोड़ रही है। जब-जब अपना एजेंडा उठाती है, इन  दोनों दलों के नेता बवाल करके बंद करवा देते हैं। उद्धव के पिता बाल ठाकरे ने औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर करने का वादा किया था। औरंगाबाद में निकाय चुनाव आ रहे हैं। लोग शिवसेना से पूछेंगे-क्या हुआ तेरा वादा। सो उसके नेता संभाजीनगर का राग अलापने लगे। प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बाला साहेब थोराट ने साफ़ इंकार कर दिया। एनसीपी ने चुप्पी साध ली। अब शिवसैनिक वाले थोराट के पुतले जला रहे हैं। लिहाजा, संभाजीनगर को भी ठंडे बस्ते में डालना होगा। 

परिवहन विभाग पर थी अड़ी

मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह मंत्रिमंडल के तीसरे विस्तार में दो मंत्रियों को शपथ दिला दी गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक इन मंत्रियों को बहत्तर दिन बाद फिर से मंत्रिमंडल में जगह मिली है। इनके संहार की भी हद हो चली थी। तो इतनी देर क्यों हुई? खबरें कहते हैं कि विभाग, खासतौर पर परिवहन विभाग के नाम पर रस्साकसी थी। भाजपा इस बार फिर से यह विभाग सिंधिया खेमे को नहीं देना चाहती थी।   

ये राजकुमार भी राहुल की राह

कांग्रेस के ‘राजकुमार’ राहुल गांधी को पार्टी के नेता जिस तरह अध्यक्ष बनाने की माँग करते हैं वैसे ही तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के नेता वहाँ के ‘ राजकुमार’ केटीआर को मुख्यमंत्री बनाने की माँग कर रहे हैं। केटी रामाराव मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के बेटे हैं और राज्य में मंत्री हैं। पिता-पुत्र की यह दूसरी जोड़ी है जो एक साथ सरकार में है। महाराष्ट्र में उद्धव-आदित्य भी हैं। अभी महाराष्ट्र के राजकुमार पालने में हैं।

हरियाणा में केवल हुड्डा

हरियाणा कांग्रेस में हुड्डा विरोधी धड़े के नेता तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर को बाहर का रास्ता दिखाने के बाद पार्टी पर हुड्डा समर्थकों की ही तूती बोल रही थी। पूर्व मंत्री शैलजा भी उन्हीं के साथ रहीं लेकिन अब उनमें भी रार देखने में आती है। हाल के निकाय चुनाव में एकमात्र कांग्रेसी विजेता हुड्डा खेमे का था और इसके पहले बरोदा विधानसभा उपचुनाव भी जिताकर लाए।सो हुड्डा का क़द और  बढ़ गया। इससे उत्साहित भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने शैलजा समर्थकों को साइडलाइन करना शुरू कर दिया। शैलजा के बाद उनका एक ही प्रतिद्वंद्वी बचेगा-रणदीप सुरजेवाला।

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