मध्यप्रदेश में युवाओं को दिया गया भाषण उनकी सोच में आध्यात्मिक और राष्ट्रवाद के आयाम दिखाता है।  इसमें वह विवेकानंद की तरह नजर आते हैं। 

नेताजी सुभाषचंद्र बोस जयंती

भारतीय स्वाधीनता के आंदोलन में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने युवकों को जितना उत्साहित और स्फुरित किया, उतना किसी नेता ने नहीं किया। इसीलिए नेताजी युवा पीढ़ी के सदैव आदर्श रहे हैं। पिछली सदी के तीसरे दशक में उन्होंने शहर-शहर जाकर युवाओं को संबोधित किया था। इस सिलसिले में वह मध्यप्रदेश भी आए और 29 नवंबर 1929 को मध्यप्रदेश युवा सम्मेलन के अध्यक्ष के तौर पर ‘हमारे राष्ट्रीय जीवन में युवाओं की भूमिका’ विषय पर भाषण दिया। यह संयोग है कि ठीक दस वर्ष के अंतराल के बाद 29 जनवरी 1939 को फिर मध्यप्रदेश की धरती से उन्होंने पूरे देश को संबोधित किय। जबलपुर के त्रिपुरी में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनका यह भाषण हुआ।
त्रिपुरी का अधिवेशन ऐतिहासिक था क्योंकि इसी में नेताजी को 41 वर्ष की अवस्था में कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया था। कांग्रेस के इस चर्चित चुनाव में उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा समर्थित पट्टाभिसीतारमैया को 203 मतों से परास्त किया था। यद्यपि 6 माह के अंतराल में नेताजी ने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया था।
मध्यप्रदेश के प्रादेशिक युवा सम्मेलन को संबोधित करते हुए नेताजी ने युवाओं को रचनात्मक ऊर्जा से स्वयं समाज व राष्ट्र के विकास और उत्थान के लिए प्रेरित किया था। इसके लिए उन्होंने युवा आंदोलन को सशक्त बनाने की आवश्यकता बताई थी। युवा आंदोलन की अवधारणा को उन्होंने ऊंचे वैचारिक और आध्यात्मिक धरातल पर पहुंचाया। इसकी व्याख्या करते हुए वह विवेकानंद की तरह प्रतीत हो रहे थे। उन्होंने कहा था, मध्यप्रदेश के युवा अपने बड़ों से मार्गदर्शन की अपेक्षा के साथ हमारे राष्ट्रीय जीवन की आधारभूत समस्याओं पर विचार करने के लिए यहां एकत्र हुए हैं। यदि मैं आपके इस पवित्र उद्देश्य की सफलता में कुछ भी सहयोग कर सका तो यह मेरा सौभाग्य होगा। हम अपने राष्ट्रीय इतिहास के एक भीषण दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में युवा वर्ग का यह कर्तव्य है कि भविष्य के कार्यक्रमों की रूपरेखा निश्चित करने के लिए सभी युवजन एकजुट होकर विचार विमर्श करें।
नेताजी युवाओं को कांग्रेस से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे जिसे वे ‘युवा आंदोलन’ कहते हैं। यह युवा आंदोलन स्वाधीनता के लिए था लेकिन नेताजी ने स्वाधीनता को बहुत व्यापक अर्थों में सामने रखा। इन अर्थों में वह युवाओं को कांग्रेस की सीमाओं से परे जाकर देखने तक की बात कहते हैं। इस सम्मेलन में उन्होंने कहा- देश आज एक ऐसा आंदोलन चाहता है जो व्यक्ति और राष्ट्र को हर प्रकार के बंधनों से मुक्ति दिलाए। उनकी आत्मा भी व्यक्ति के सभी द्वार खोले। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो युवा आंदोलन को कांग्रेस की एक शाखा के रूप में बदल देना चाहते हैं। लगता है, ऐसे लोग इसके उद्देश्य से अवगत नहीं हैं। कांग्रेस मूलतः एक राजनीतिक संस्था है। इसका उद्देश्य सीमित है। वह राजनीतिक समस्याओं में पूर्ण स्वाधीनता को आज भी स्वीकार नहीं करती इसीलिए जो तरुण-तरंगित जीवन को समग्रता में देखना चाहते हैं, वह कांग्रेस जैसी किसी राजनीतिक संस्था में ही पड़े रहना नहीं चाहते हैं। बल्कि उनकी चाह मानव हृदय की सभी आकांक्षाओं और जीवन की सभी कामनाओं को पूरा करने की हो सकती है। किसी ऐसे आंदोलन से जुड़ने की भी हो सकती है। इसमें अचरज की कोई बात नहीं। इसलिए यह समझ में आता है कि युवा आंदोलन केवल राजनीतिक आंदोलन ना होते हुए भी राजनीति से अलग नहीं है। इसके उद्देश्यों का दायरा जीवन की भांति व्यापक है। इसकी समग्रता में जीवन की सभी दिशाएं निहित हैं। इस कारण यही युवा आंदोलन हमारी राजनीति को भी बल देगा।
युवा आंदोलन वर्तमान के प्रति हमारे असंतोष का प्रतीक है। युगों से पड़े बंधन, स्वेच्छाचारिता और अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह का यह एक विशिष्ट रूप है। सभी बंधनों को तोड़कर मानव की अशेष सृजन शक्ति के क्षेत्रों को उन्मुक्त बनाना, हमारे और मानव जाति के लिए नूतन जगत की प्रतिष्ठा करना ही इसका लक्ष्य है। युवा आंदोलन इसलिए वर्तमान आंदोलन समूह द्वारा आरोपित किसी अन्य या विदेश से आयात की हुई कोई कार्य पद्धति नहीं है। यह वास्तविक एक स्वतंत्र आंदोलन है और उसका मूल उत्स मानव स्वभाव के गहनतम अंतस्तल में है।
वर्तमान युग में एक विशिष्ट अभाव और मानव मन की उदग्रीव लालसा को पूरा करने के लिए ही इसका जन्म हुआ है। इसका गूढ़ अर्थ और उद्देश्य बिना जाने सिर्फ आंदोलन में योग देने पर या युवक संघ का प्रधान बनने पर भी कोई परिणाम नहीं निकलेगा। मेरा ख्याल है कि युवा आंदोलन के स्वाभाविक वशिष्ट्य के बिना केवल तरुण-तरुणियों का संगघ होने मात्र से इसे युवा संघ की संज्ञा नहीं मिल सकती। मैं पहले ही कह चुका हूं कि आलोढ़न और वर्तमान अवस्था के प्रति असंतोष और नए समाज की स्थापना की चेष्टा इस आंदोलन की वास्तविक विशेषता है। हर प्रकार के बंधनों से मुक्ति और जहां विधि और व्यवस्था मानव विवेक के विरुद्ध यथावलंबित है वहां उस विधि और व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह है, युवा आंदोलन का यही लक्ष्य है। उसका मंत्र है आत्मनिर्भरता। जो अंधभक्ति और बड़े बूढ़ों के अविकल अनुसरण से बिल्कुल पृथक है। इससे यदि कोई बड़े-बूढ़े युवा आंदोलन को संदेह या बुरी दृष्टि से देखें तो इसमें आश्चर्य की बात नहीं है।
अपनी समस्त जीवनधारा को नई-नई दिशाओं में प्रवाहित करना और नवीन आदर्श की अनुप्रेरणा से संजीवित करना युवा आंदोलन का उद्देश्य है। हम जीवन का जो पुनर्गठन करना चाहते हैं, यही आदर्श उसे नया अर्थ और नई प्रेरणा देता रहेगा। वह आदर्श है पूर्ण सर्वांगीण स्वाधीनता और अपने को चारों ओर से इसार्थक बनाना। स्वाधीनता और जीवन की सार्थकता का परस्पर अटूट संबंध है। स्वाधीनता के बिना अपने को सार्थक बनाना संभव नहीं है और सार्थकता की ओर यह जीवन को ले जाता है, इसलिए स्वाधीनता इतनी मूल्यवान है।
युवा आंदोलन का दायरा जीवन की भांति ही व्यापक है इसलिए जीवन की जितनी भी दिशाएं हैं, युवा आंदोलन की भी उतनी ही दिशाएं होंगी। शरीर को संजीवित करने के लिए हमें क्रीड़ा-कौतुक और व्यायाम करना होगा। हृदय को मुक्त और नव शिक्षा द्वारा उद्बुद्ध करने के लिए नए से नए साहित्य, ऊंची से ऊंची शिक्षा प्रणाली और सुदृढ़ नैतिकता की प्रस्थापना करनी होगी। समाज को नवजीवन दान देने के लिए हमें निर्दयतापूर्वक बाधा- विघ्नों, विधि व्यवस्थाओं और विचारधाराओं को मिटाकर नई और जीवंत समाज व्यवस्था तथा विचार समूह का परिवर्तन करना होगा और युग सापेक्ष आदर्श निकष पर हमें वर्तमान सामाजिक और नैतिक व्यवस्था को जांचना होगा और संभवत हमें ऐसे नैतिक और सामाजिक आदर्शों की अवतारणा भी करनी पड़े, जो भविष्य का पथ नियंत्रित कर सके।
विचार और कर्म की नई धारा के प्रवर्तन के लिए वर्तमान विचारधारा और स्वार्थ एवं शक्तिशाली दलों से हमें विरोध मिलेगा यह स्वाभाविक है। विरोधी वातावरण और अनेक बाधाओं के मध्य युवा आंदोलन को अग्रसर होना होगा। ऐसी स्थिति बार-बार आ सकती है जब हमारे चारों ओर बाधाएं ही बाधा हों और लगे कि संपूर्ण विश्व से हम विच्छिन्न हो चुके हैं।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने इसके ठीक एक महीने पहले 19 अक्टूबर को लाहौर के छात्र सम्मेलन में भी इसी वैचारिक उच्चता को प्रदर्शित किया था। छात्र सम्मेलन में उन्होंने कहा था- मैं कहना चाहता हूं कि भारत का अपना एक विशिष्ट कथ्य है जिसे सुनाने के लिए भारतवर्ष शताब्दियों से मुखर है। जगत की साधना और सभ्यता के प्रायः प्रतिरूप में भारतवर्ष को एक नव अवदान देना है। मेरी बातों पर विश्वास ना हो तो आप स्वयं सभ्यता के उत्थान-पतन के नियमों को ढूंढें। इस नियम के अन्वेषण से ही हम अपने देशवासियों को सलाह दे सकेंगे कि उन्नतिशील, शक्तिशाली जाति की उत्पत्ति के लिए हमें कौन सा पथ अवलंबन करना होगा, अपनाना होगा। -कमलनयन

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