शिवकुमार विवेक

“मुझे ऐसे  दो ही गणतंत्र दिवस ऐसे याद आते हैं जिनमें भारतीय मानस नैराश्य में नहीं था तो व्यथित जरूर था। एक चीनी आक्रमण में भारत की पराजय से ग्रस्त राष्ट्रमन का राष्ट्रीय पर्व 1963 में मना तो दूसरा गणतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं के दरवाज़े बंद कर मनाया गया 1976 का गणतंत्र दिवस।”

हत्तरवां गणतंत्र मनाते हुए मन कुरेद रहा है कि देश की स्वतंत्रता के इतिहास में कभी हमने इतनी विषादपूर्ण  और विषम स्थितियों में यह राष्ट्रीय त्योहार मनाया? जब गण और तंत्र दोनों ही कोरोना महामारी से बेज़ार हैं। निजी व सार्वजनिक जीवन में संकटपूर्ण हालात है और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व गिरावट है। सिर्फ नौ महीने में 1 लाख 53 हजार लोग अपनी जान गँवा चुके हैं और 1 करोड़ 7 लाख बीमारी की चपेट में आ चुके हैं। इतनी जानें पिछले सात दशक में किसी युद्ध, महामारी या अन्य आपदा में नहीं गईं।

हमने पहला गणतंत्र दिवस 1950 में मनाया था। 26 जनवरी की तिथि इसलिए निश्चित की गई थी क्योंकि इसी तारीख को वर्ष 1929 में रावी के तट पर लाहौर में पंडित जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस सम्मेलन में संपूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पारित किया गया था और अंगरेजों को 26 जनवरी 1930 तक भारत को स्वाधीन घोषित करने को कहा गया था। तब से हर वर्ष इस तिथि को गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है।

मुझे ऐसे  दो ही गणतंत्र दिवस ऐसे याद आते हैं जिनमें भारतीय मानस नैराश्य में नहीं था तो व्यथित जरूर था। एक चीनी आक्रमण में भारत की पराजय से ग्रस्त राष्ट्रमन का राष्ट्रीय पर्व 1963 में मना तो दूसरा गणतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं के दरवाज़े बंद कर मनाया गया 1976 का गणतंत्र दिवस।

1976 में आपातकाल का गणतंत्र दिवस आया। तब लगभग 1 लाख 40 हजार राजनीतिक कार्यकर्ता देश के कारागारों में बिना किसी मुक़दमे के बंद थे। राजनीतिक विरोध को इस क़दर दबाने के दुनिया के हाल के  लोकतांत्रिक देशों में उदाहरण नहीं मिलते। इन बीस महीनों के दौरान न्यायपालिका सहित सभी संवैधानिक संस्थाओं पर अंकुश लगा दिया गया था और जनतांत्रिक अधिकार छीन लिए गए थे। इसके मूल में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में तेज हुआ छात्र आंदोलन और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरुद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला था जिसने इंदिरा गांधी के विरुद्ध चुनाव लड़ने वाले राजनारायण की याचिका पर उनका चुनाव रद्द कर दिया था।

चीन का युद्ध 20 नवंबर 1962 को युद्धविराम के साथ संपन्न हुआ। इस एक महीने चले युद्ध ने भारतीय स्वाभिमान पर कभी न भरने वाला घाव किया। इस लड़ाई ने भारत का भूभाग छीनकर हमेशा के लिए एक अधूरापन दे दिया। इसे सैन्य पराजय के साथ राजनीतिक आपदा कहा गया क्योंकि यह तत्कालीन नेतृत्व की चीन नीति की भारी भूल का परिणाम था जिसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को ज़िम्मेदार माना गया। उनका ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा धूल चाट गया और चीन की तरफ से सीमाओं के प्रति निश्चिंतता हार की वजह मानी गई। इस भूल को नेहरू ने खुद संसद में स्वीकार किया था। यह माना गया कि 1964 में नेहरू की मृत्यु उसी सदमे में हुई। चीन के हमले के साल भर बाद 1963 से ही उन्हें दिल के दौरे पड़ने लगे थे।

स्पष्ट है कि दोनों ही घटनाओं के बाद मनाए जाने वाले गणतंत्र दिवस में हमारी स्वाधीनता व लोकतांत्रिक मूल्यों पर गहरे ज़ख़्म दिख रहे थे और इन्हें लेकर उसी तरह का मंथन हो रहा था जैसा अंगरेजों के समय था। कई विचारकों व राजनेताओं का मानना है कि यह अंगरेजों से स्वाधीनता माँगने से भी अधिक दयनीय दौर था क्योंकि अब स्वाधीन भारत की अपने ही लोगों के हाथों पराजय हुई थी। प्रश्न यह है कि क्या हम स्वाधीनता माँगकर उसके संघर्ष की भावना और संकल्पों को भूल गए अथवा उन्हें पूरा करने की दिशा में गाफ़िल हो गए?

दोनों ही अवसर पर सारे सवाल हमारे नेतृत्व पर जा टिकते हैं क्योंकि चीन से युद्ध में अथवा आपातकाल में जनता ने अपनी भूमिका और कर्तव्यों में कोताही नहीं की। चीन से लड़ाई में हमारे पास संसाधन और सही रणनीति नहीं थी जिसके कई साक्ष्य बाद में उजागर हो चुके हैं, तब भी भारतीय सैनिकों ने पूरी क्षमता से लड़ाई लड़ी और इसके बाद लोगों ने आपातकाल में अभूतपूर्व संघर्ष किया जिसका परिणाम देश ने 1977 के आम चुनाव में देखा था जब इंदिरा गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी चौखाने चित गिरी थी।

चीन से मिली शिकस्त के ठीक दो माह बाद  जो गणतंत्र दिवस आया, उसमें चीन की पराजय का विषाद छाया था। दो दिवसीय समारोह के दूसरे दिन लता मंगेशकर ने नेहरूजी की उपस्थिति में कालजयी गीत ‘ए मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी’ गाया जो चीन से मिले नैराश्य को व्यक्त करता था। मध्यप्रदेश के कवि प्रदीप के लिखे इस गीत को सुनकर नेहरूजी की आँखों में पानी भर आया था।

विषाद और विलाप में डूबे उक्त दोनों गणतंत्र दिवसों के सबक क्या थे और उनसे सीखकर हमने देश की भौगोलिक व लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं की सुरक्षा के प्रति क्या क़दम उठाए, इस प्रश्न का मंथन करना होगा। चीन से मिली शिकस्त के बाद क्या हमने सरहदों की सुरक्षा के आवश्यक क़दमों को तेज़ी से उठाया? क्या आपातकाल के बाद लोकतांत्रिक संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण की दिशा में बड़ी पहल की गईं? उत्तर में हमें बहुत आशाजनक संदर्भ नहीं मिलते। संसद में तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी द्वारा 2013 में सीमा पर अधोसंरचना विकास के मामले में दिया गया जबाव हमारी कमजोरी बताता है। उन्होंने कहा था कि चीन से लगती अविकसित सीमा हमारे लिए ज्यादा सुरक्षित है, बनिस्बत विकसित सीमा के।

केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद उत्तर-पूर्व लद्दाख सीमा पर अधोसंरचना की परियोजनाओं को तेज़ी से पूरा करने का काम हाथ में लिया गया। पहली बार प्रधानंत्री, मंत्री व सरकार ने इन पर फोकस किया। यही नही, सेना को सुसज्जित करने के लिए रक्षा सौदों की खरीद की प्रक्रिया को तेज किया गया। चीन और पाकिस्तान के खिलाफ कूटनीतिक स्तर पर पहली बार भारत ने बड़े प्रयास किए गए जिनके सुफल हाल में देखे गए। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि हमारी विदेश नीति और रक्षा मामलों में तटस्थता और चीन के प्रति संशयरहित सदाशयता हमारी भूल रही।

लोकतांत्रिक मूल्यों की जहाँ तक बात है तो आपातकाल के बाद जनता के स्तर पर अभूतपूर्व चेतना के दर्शन समय-समय पर हो रहे हैं। यद्यपि इसमें जनमाध्यमों, वैश्विक चेतना, शिक्षा जैसे अन्य कारकों की भी अहम भूमिका है। लेकिन सत्ता प्रतिष्ठान के स्तर पर कई सुधारों की अभी भी जरूरत महसूस की जाती है। आपातकाल के लगभग चार दशक बाद लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए अन्ना हज़ारे का अनशन करना इसी का परिचायक है। इसी तरह, चुनाव सुधार करने में देरी लोकतंत्र की कई बुराइयों को ज्यादा देर तक ढोने के लिए विवश करती है।

ताजा संदर्भ पर आएँ तो महामारी प्राकृतिक आपदा है जिसकी कोई पूर्व सूचना नहीं होती। ऐसी आखिरी बड़ी आपदा आजादी के पहले 1943 में बंगाल में आया दुर्भिक्ष था जिसमें बीस से तीस लाख लोगों की अकाल मौत हुई थी। हालाँकि यह तत्कालीन अंगरेज सरकार की गलत नीतियों की उपज थी। मई 1957 से 58 तक दक्षिण भारत में फैली इनफ़्लुएंज़ा महामारी में एक हजार से अधिक जानें गईं थी और लगभग ढाई लाख लोग प्रभावित हुए थे। कोरोना महामारी अप्रत्याशित है। इसने हमारी जीवन पद्धति व सामाजिक जीवन को ऐसे बदलावों के लिए विवश किया जैसे सदियों में आते हैं। इनमे कुछ समयानुकूल हैं लेकिन कई ने विचलन पैदा किया है। अर्थव्यवस्था को जो क्षति हुई है, उसे भरने में काफी समय लगेगा। भले ही अर्थशास्त्री यह अनुमान बताते हों कि इस साल की दो तिमाही में नीचे आने के बाद तीसरी तिमाही में सुधार के आसार दिख रहे हैं लेकिन हमें बजट को पटरी पर लाने में समय लगेगा क्योंकि कई संस्थाओं, सेवाओं और बाजार को हुई क्षति को भरने के लिए ही काफी पूँजी की जरूरत है।

अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं दुनिया भर के देशों में बेरोज़गारों व ग़रीबों की तादाद बढ़ने का अनुमान बता चुकी हैं। भारत के सामने बड़ी चुनौती अपने स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करने की है। 2018-19 में सकल घरेलू उत्पाद का सिर्फ 1.5 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य के खाते में जा रहा था। सेहत पर हमारा कुल ख़र्च ( जेबखर्च व लोकव्यय ) सघउ का 3.6 प्रतिशत था जो अन्य देशों की तुलना में काफी कम है।

चुनौती यह है कि यदि हम स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारते हैं तो बड़ा ख़र्च केवल अधोसंरचना खड़ी करने व सुधारने पर होगा और इसका भार भी आम करदाता पर पड़ेगा जिस पर पहले ही महँगाई और अभाव की मार पड़ चुकी है। लिहाजा सरकार को जन के साथ तंत्र के लिए समांतर सुविधा देखकर काम करना होगा। यह बेहद मुश्किल काम है। इसी में अवसर खोजने की चुनौती है। हालाँकि चुनौतियों से निपटने की प्रतिभा व सामर्थ्य अतीत में हमारे इसी ‘गण’ और ‘तंत्र’ ने दिखाई है। इसलिए हमें इसे उम्मीदों का गणतंत्र मानना चाहिए। 

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