तस्वीर : लाल किले के ध्वज दंड से इस युवक ने राष्ट्रीय ध्वज निकालकर फेंका और अपना झंडा चढ़ाया। वीडियो में पूरा दृश्य कैद हुआ।

जिस आशंका से देश के कई लोग सहमे हुए थे, 26 जनवरी को दिल्ली में वही हुआ। राष्ट्रीय पर्व की गरिमा को किसान आंदोलन की आड़ में तार-तार कर दिया गया। किसान नेताओं की प्रस्तावित ट्रैक्टर परेड को पुलिस की अनुमति मिलने से जिन लोगों के फेंफड़े फूले हुए थे और वे मंगलवार की सुबह तक देश में दूसरा इतिहास रचने का प्रसंग बता रहे थे, दोपहर होते-होते उनकी गरदनें लटकने लगी थीं। रात तक तो किसान नेता शिवकुमार कक्काजी व राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष होते हुए किसान आंदोलन में कूदे पुराने चुनाव विश्लेषक योगेन्द्र यादव माफ़ी माँगते टीवी पर नजर आने लगे। पर क्या देश को शर्मसार करने वाली घटना पर माफ़ी माँगना काफी है? 

दिल्ली में सुबह राष्ट्रीय समारोह चल रहा था, तब कुछ किसानों के जत्थे समझौता तोड़कर दिल्ली में घुस आए। जिधर रास्ता मिला, वे घुसते गए। बैरिकेड्स तोड़े, गाड़ियों को तोड़ा, पत्थर फेंके और सबसे शर्मनाक यह कि लाल क़िले में घुसकर राष्ट्रीय ध्वजदंड पर अपना झंडा चढ़ा दिया। यही नहीं, वहाँ एक पंथ का झंडा भी चढ़ाया। पुलिस ने रोकने की कोशिश में हाथ जोड़े, पिटाई खाई, आँसू गैस छोड़ी और लाठियाँ भांजी। पूरी दिन दिल्ली उपद्रवकारियों और दंगाइयों की गिरफ़्त में कैद रही। संविधान के सम्मान और लोकतंत्र के गौरव का दिन लांछित हो गया।

मंगलवार को लाल क़िला और राजपथ देश की गर्वीली अभिव्यक्ति कर रहा था जिसे पूरा देश और दुनिया अपने-अपने माध्यमों से देख रही थी। गणतंत्र दिवस का उत्सव पिछले इकहत्तर सालों से उत्साह और अभिमान के साथ मनाया जाता है। यह हर नागरिक के मन में राष्ट्र के प्रति भक्ति और कर्तव्य का भाव स्फुरित करता है। लेकिन इस बार दिल्ली में आंदोलन कर रहे चालीस किसान संगठनों, जिनमें आधे से अधिक पंजाब-हरियाणा के हैं, ने इसी दिन दिल्ली में ट्रैक्टर परेड करने की घोषणा कर दी थी। यह परेड छब्बीस जनवरी को ही क्यों रखी गई, इसे लेकर आंदोलन का समर्थन करने वाले किसी बुद्धिजीवी व राजनेता ने अंगुली नहीं उठाई। जिद पर अड़े किसान नेताओं को परामर्श नहीं दिया कि वे ट्रैक्टर परेड के लिए राष्ट्रीय दिवस के अलावा कोई भी दिन चुन लें। इसके विपरीत हमारा यह बौद्धिक तबक़ा इस गणतंत्र पर एक नया इतिहास रचने की सुखानुभूति में डूबा था। 

ट्रैक्टर परेड करने में किसी को क्या उज्र होगी। जैसे सत्याग्रह के दूसरे तरीके, वैसे किसान का यह तरीक़ा। लेकिन इसका समर्थन करने वाले बौद्धिक यह नहीं जाँच रहे थे कि यह यह इसी दिन क्यों, यह दिल्ली में ही क्यों और जब किसान संगठनों में लोगों को अनुशासित रखने का माद्दा नहीं तो जोखिम उठाने की जरूरत क्या? विरोधी राजनीतिकों का इन सवालों से मतलब नहीं। वे केवल केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार को नीचा दिखाना चाहते थे। कानून व व्यवस्था के सवाल से एकदम आँखें मूँद चुके थे या जानबूझकर अनदेखी कर रहे थे।

इस आंदोलन के पहले दिन से ही यह साफ़ था कि किसान संगठनों में मतैक्य नहीं है। उनमें एक भी ऐसा प्रभावशाली नेता नहीं है जिसकी एक आवाज़ पर लोग चल दें या रुक जाएँ। आपसी सिर फुटौव्वल ऐन पहले तक होती रही। आख़िर एक संगठन ने पुलिस व किसानों के बीच परेड को लेकर तय हुई शर्तों को नहीं ही माना और यह भी दिल्ली की अराजकता का कारण बना। किसान संगठन दो दिन पहले कांग्रेस के सांसद रवनीत सिंह बिट्टू से बदमिज़ाजी कर चुके थे और योगेन्द्र यादव को लेकर भी मतभेद रहे। किसान आंदोलन में बिट्टू से बदसलूकी हुई व अन्य नेताओं को दूर रखा गया लेकिन योगेन्द्र यादव एक राजनीतिक दल के मुखिया होते हुए शामिल रहे। एक किसान संगठन के नेता गुरदेव सिंह चढ़ूनी ने बक़ायदा नेताओं को प्रवेश दिया और उन्हें बुलाकर किसान संसद भी की। 

किसान परेड का समर्थन करने वाला बौद्धिक समाज क्या इतना भोला है कि वह सौ फाँको वाले आंदोलन से गांधीजी जैसे सत्याग्रह की अपेक्षा रख रहा था जिसमें नैतिक अनुशासन होगा और एक नेता की आवाज़ हज़ारों लोगों के लिए मंत्र की तरह होगी। कौन था ऐसा नेता? नहीं था तो यह जोखिम क्यों उठाने दिया गया। वे किस बिना पर स्वर्णिम इतिहास रचने का सपना देख रहे थे और जवानों की परेड के साथ किसानों की परेड के अलंकार समझा रहे थे। ? वे किस तरीके से अराजक नहीं होने की आस बाँधे थे? वे यह क्यों भूल रहे थे कि इसमें पंजाब-हरियाणा के असामाजिक तत्व, विघ्नसंतोषी और घोर सरकार विरोधी लोग अपना हिसाब चुकता करने की जुगत में थे और उनके इरादे सामने आ चुके थे। पंजाब में ट्रैक्टरों में मजबूत बंपर लगवाने और असलहे इकट्ठा करने की तस्वीरें लगातार प्रकाशित हो रही थीं। 

सरकार-विरोध मुद्दे को लेकर हो सकता है लेकिन सरकार की बजाय नरेन्द्र मोदी नाम के शख्स और भाजपा नाम की पार्टी को लक्ष्य बनाने से मंतव्य स्पष्ट था। किसान नेता राकेश टिकैत 2024 के चुनाव में आर-पार होने की बात कहने लगे थे। यह भी छुपा नहीं था कि आंदोलन में खालिस्तान समर्थकों को विदेश से पैसा भेजा गया। आंदोलन स्थल पर खालिस्तान का झंडा लहराने की तस्वीरें तमाम देशवासियों ने देखीं किन्तु उन पर इस वर्ग ने मौन साध लिया या इसे सरकार की साज़िश बताकर अनदेखी कर दी या बदनाम कर दिया। इसके अलावा देश भर के सरकार विरोधी संगठन व एनजीओ दिल्ली सीमा पर जुटे थे। वे सब शाहीन बाग की तरह का प्रयोग दोहराने को आमादा थे। 

अब कक्काजी, योगेन्द्र यादव या अन्य जी देश से माफ़ी माँगेंगे तो कलंक को इतिहास के पन्नों से नहीं पोंछा जा सकेगा। उनके यह कहने पर कोई भरोसा नहीं करेगा कि अराजक तत्वों में उनके किसान शामिल नहीं थे। यह बाहरी असामाजिक तत्वों का कारनामा है। क्या उन्होने यह पहले नहीं सोचा था। उन्हें यह कार्यक्रम तय करते समय सोचना चाहिए था। अन्य कुछ ‘जी’ इसके लिए सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं। एक जी ने कहा कहा कि सरकार जिद पर न अड़ी होती तो यह दिन न आता। जिसका मतलब यही है कि सरकार की जिद पर यही बर्ताव किया जाना चाहिए। इस आंदोलन का समर्थन करने वाले एक अन्य ‘जी’ ने टीवी की बहस में उलटा चोर कोतवाल को डाँटे की तर्ज़ पर कहा कि सरकार ने दिल्ली में इसे रोकने के लिए क़दम क्यों नहीं उठाए? 

इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि सरकार चाहती तो गणतंत्र दिवस पर सख़्ती से इसे रोक सकती थी। लेकिन उसने परेड की अनुमति दी। गणतंत्र दिवस का राष्ट्रीय समारोह प्रभावित न हो, इसके लिए दिल्ली के बाहरी मार्ग को इसके लिए आरक्षित किया और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुछ शर्तों पर सहमति हुई। लेकिन आज दिल्ली पुलिस ने बहुत संयम बरता। हमने पुलिस को कई बार माफ़ी माँगते और पिटते हुए भी देखा। इस संयम की तारीफ़ नहीं की जानी चाहिए? (इंडिया डेटलाइन) 

-शिवकुमार श्रीवास्तव

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