संदीप राशिनकर की चित्रकला की अलग शैली है। इसमें हमें ज्यामिट्री का बड़ा असर दिखता है। इंदौर के इस अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित कलाकार के रेखाचित्रों की आड़ी-तिरछी रेखाएँ बहुत कुछ सुगमता से कहती हैं। दुनिया भर की पुस्तकों और पत्रिकाओं के मुखपृष्ठों पर आजकल उनके चित्र शोभायमान हैं। 

शिवकुमार विवेक

संदीप राशिनकर के रेखाचित्रों से आपकी आँखें कहीं न कहीं दो-चार हो चुकी होंगी और मानस में खोजेंगे तो वह आपकी स्मृतियों में उभर आएँगी क्योंकि संदीप की रेखाएँ सबसे अलग हैं। उनकी अलग शैली है। जिसमें हमें ज्यामिट्री का बड़ा असर दिखता है। इंदौर के इस अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित कलाकार के रेखाचित्रों की आड़ी-तिरछी रेखाएँ बहुत कुछ कहती हैं और अगम नहीं, सुगम तरीके से। दुनिया भर की पुस्तकों और पत्रिकाओं के मुखपृष्ठों पर आजकल उनके चित्र शोभायमान हैं। हजार से ज्यादा है इनकी संख्या। खुद संदीप को गिनती याद नहीं। बस, किसी ने कहा और यह कलाकार अपनी पेंसिल के साथ हाज़िर। यहाँ तक कि वह किसी शहर (गोवा का प्रसंग है) के होटल में ठहरा है और उस शहर का कोई संपादक उस दिन की घटना पर चित्र बनाने के लिए घटनास्थल पर जाने का आग्रह करता है, तो लोक की ख़ातिर यह कलाकार बोरी-बग़चा उठाकर यह काम करने के लिए सहर्ष चल देता है। गोवा में विमान गिरने की घटना पर संदीप के ये चित्र उस दिन खींचे गए फोटोग्राफ्स से अधिक शक्तिशाली सिद्ध होते हैं। 

संदीप ऐसे ही रोज तस्वीर गढ़ते हैं। उनका फलक काग़ज ही नहीं है अपितु दीवारें भी उनका कैनवास हैं। पेशे से सिविल इंजीनियर ने अब अपनी व्यावसायिक शिक्षा और शौक़ को मिलाकर भवनों में कलात्मक एलीविएशन/ एलीविएशनल म्यूरल्स की कला भी विकसित की है। ब्रास/स्टील वेंचर में सृजित अनेक कलाकृतियाँ देश-विदेश में प्रदर्शित हैं। इंदौर में उनके ऐसे कई प्रयोग देखे जा सकते हैं। यही नहीं, यहाँ यह भी बता दें कि राशिनकर कवि हृदय भी हैं। डॉ. वाकणकर की जन्मशताब्दी पर उनकी एक कविता में उक्त पुरा-संस्कृतिविद का समूचा जीवन समो गया तो हाल में प्रभात प्रकाशन की पत्रिका में माँ कविता उनके संवेदनशील मन की दूसरी अभिव्यक्ति है। उनका ‘कैनवास पर शब्द’ और जीवन संगिनी श्रीति के साथ ‘कुछ मेरी कुछ तुम्हारी’ काव्य संग्रह आ चुका है। संदीप का मानना है कि ‘कलाएँ, चाहे वह साहित्य हो या कला, जीवन को आनंदपूर्ण बनाती हैं। जीने का सलीक़ा सिखाती हैं।’ 

अस्सी-नब्बे के दशक में जब इंदौर में कला गुरु विष्णु चिंचालकर की प्रेरणा से कला का संसार रचा जा रहा था तभी दिलीप चिंचालकर व संदीप राशिनकर चित्रों की बारहखड़ी पढ़ रहे थे। दिलीप चिंचालकर जहाँ नईदुनिया के लोकप्रिय माध्यम पर सृजनात्मकता को प्रदर्शित कर रहे थे तो संदीप समांतर रूप से अन्य पत्र-पत्रिकाओं में छा रहे थे। नीमच में नौकरी ने उनके हाथ-पाँवों को थोड़ा धीमे कर रखा था। इससे मुक्त होकर वे खुले आसमान में उड़ने लगे तो उनकी इंद्रधनुषी प्रतिभा चमक उठी। उन्होंने इंदौर में कला गैलरियों से बाहर जाकर प्रदर्शनी लगाई, गाँवों की दीवारों पर म्यूरल्स बनाए और दुनिया भर में प्रदर्शनियाँ लगाईं। हाल में उदय शंकर के साथ उनकी कृति समकालीन भारतीय साहित्य के मुखपृष्ठ पर सुशोभित हुई है। भारतीय ज्ञानपीठ की पुस्तकों के कवर पृष्ठों की कला के जरिये वे पुस्तक के हजार शब्दों से बढ़कर एक तस्वीर के सिद्धांत को चरितार्थ कर रहे हैं। अनगिनत प्रकाशनों के मुखपृष्ठ के रेखाचित्र संदीप की प्रतिभा के पैमाने हैं। 

चित्रों की दुनिया रेखाओं और रंग से सजती है। इसे सजाने वाले के मन में कोई व्यक्त करने वाला विचार होता है तो देखने वाले की नजर में उसे ग्रहण करने का विचार। दो अलग-अलग सिरों पर खड़े लोग भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमि के होते हैं और एक ही विचार को पकड़ते हैं। दोनों सुखानुभूति से भरे होते हैं। कला यहाँ सार्थक होती है। धन्य होती है। यही कला का स्वांत: सुखाय रूप है और यही परमार्थ का कारज। संदीप इसे यूँ कहते हैं- जैसे मासूम बच्चे की मुस्कुराहट सभी को आनंदित करती है। वह क्या सोचकर मुस्करा रहा है, यह जानना या न जानना अलग बात है। रेखाओं के जादूगर संदीप राशिनकर स्वयं की अनुभूति और विचार से चित्र गढ़ते हैं किन्तु विशुद्ध रूप से परमार्थ उनका साध्य होता है। इसलिए वे अपनी कलाकृतियों को अपने संग्रह को समृद्ध करने अथवा कला प्रदर्शनियों के माध्यम से यशोलिप्सा पाने से आगे का सोचते हैं और आगे जाते हैं। वह इसे लोक तक सहज और व्यापक रूप से ले जाने और इससे लोकभलाई करने की इच्छा रखते हैं। कहते हैं-कला सबकी है, सिर्फ कलाकारों की नहीं है। 

संदीप ने किसी कलावीथिका या कला विद्यालय से शिक्षा ग्रहण नहीं की। सातवीं-आठवीं कक्षा से ही अलग तरह की रेखाएँ खींचने का अभ्यास किया। पिता इंदौर से काग़ज़ की खींचें कटवाकर व पेंसिलें ख़रीदकर नीमच में ले जाकर देते रहे और वे चित्र बनाते गए। यह प्रश्न मन में लिए कि ये आड़ी-तिरछी रेखाएँ कला क्षेत्र में मान्य होंगी या नहीं। पहली पेंटिंग हैदराबाद की चित्र प्रदर्शनी में भेजी तो वही मेरी कला की पहली परीक्षा थी। वह चयनित व प्रदर्शित हुई तो मैंने इसे ही मनाया मान लिया। उसके बाद पच्चीस से तीस हजार रेखांकन बना चुके हैं। मानते हैं कि रेखांकन ही चित्रकला की आत्मा है। उज्जैन के भारती कला भवन में, जहाँ संदीप इंजीनियरिंग करने के बाद एक साल रहे,  डॉ. वाकणकर कहा करते थे कि रेखांकन कला की रीढ़ की हड्डी है। 

कितनी कीमत में बिकते हैं आपके चित्र? सवाल अटपटा है पर जवाब सुंदर। संदीप कहते हैं-’मैने समाज में कला दृष्टि विकसित करने पर जोर दिया। लोगों के बीच कला अपनी पैठ बनाए, दरबारों खास से दरबारों आम बनाएँ, यही मक़सद रहा। मेरा प्रयास है कि कलाओं को कला दीर्घा से निकालकर लोगों के बीच ले जाएँ। वही शाश्वत है। लोक कलाएँ आज भी इसीलिए जीवित हैं। इंदौर में म्यूरल्स की मुहिम चलाई। म्यूरल्स लोगों से संवाद करते हैं। (इंडिया डेटलाइन)

(लेखक संपादक स्वदेश पत्र समूह भोपाल हैं।) 

 

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