इंडिया डेटलाइन विशेष
इतिहास की कलंक कथाओं से संबंधित नामों को बदलने की मांग जोर पकड़ रही है। राजधानी में अफगान सरदार दोस्त मोहम्मद के छल-कपट और क्रूरता से जुड़े हलाली और लालघाटी का नाम परिवर्तित करने की भी मांग उठी है। भोपाल के नवाब खानदान से जुड़े और पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव शहरयार खान ने हलाली और दोस्त मोहम्मद खां की छल कथाओं को अपनी पुस्तक ‘द बेगम्स ऑफ भोपाल’ में वर्णन किया है, उसका सार-

देश के अन्य भागों की तरह मध्यप्रदेश के भी कुछ शहरों और स्थानों के नाम बदलने की मांग की जा रही है। शुक्रवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नर्मदा के तट पर बसे जिला मुख्यालय होशंगाबाद का नाम नर्मदापुरम करने की घोषणा की है। नर्मदापुरम का नाम हमलावर होशंग शाह के नाम पर होशंगाबाद हुआ था किंतु इसके साथ ही राजधानी भोपाल के रक्तरंजित इतिहास से जुड़े कुछ और नामों को परिवर्तित करने की मांग उठी है। सांसद प्रज्ञा ठाकुर, उमा भारती और मध्यप्रदेश विधानसभा की कार्यकारी अध्यक्ष रामेश्वर शर्मा ने भी शहर के इतिहास के इन काले धब्बों को मिटाने की मांग की। इनमें हलाली डैम और लाल घाटी का नाम प्रमुखता से शामिल है। उर्दू में हलाल का मतलब काटना या कुर्बानी देना होता है। ये दोनों नाम विदेशी लड़ाके दोस्त मोहम्मद खान से जुड़े घटनाक्रम पर आधारित हैं। दोस्त मोहम्मद खान अफगानी लड़ाका था जिसकी सेवाएं राजा और सामंत-सरदार किराए पर हासिल करते थे। वह अफगानिस्तान से मुगल सेना में शामिल हुआ जिसके बाद देश के दक्षिण की तरफ बढ़ा और भोपाल आ गया। यहां उसकी सेवाएं जगदीशपुर की रानी वह भोपाल की रानी कमलापति ने लीं। इतिहास के कुछ संकेत वह लोकोक्ति कहती हैं कि उसने रानी कमलापति को भी बाद में धोखा दिया था जिसके बाद उन्होंने तालाब में कूदकर आत्महत्या कर ली थी।

भोपाल-विदिशा-बैरसिया मार्ग पर हलाली बांध ऐसे ही एक बड़े धोखे से संबंधित है। यह भोपाल के इतिहास की कलुषित कहानी है। भोपाल के नवाब खानदान से संबंधित और बाद में पाकिस्तान के विदेश सचिव बने शहरयार मोहम्मद खां ने अपनी पुस्तक ‘द बेगम्स ऑफ भोपाल’ में भी इस छल-बल की कहानी की पुष्टि की है। यह चूंकि दोस्त मोहम्मद के वंशजों और भोपाल के खानदान से संबंधित एक व्यक्ति की लिखी पुस्तक है इसलिए यह कहानी स्वत: प्रमाणित है।

शहरयार खां लिखते हैं – ‘अपने राज्य के विस्तार और सुदृढ़ीकरण के लिए दोस्त मोहम्मद के अभियान में एक घटना घटी। वह पड़ोसी राजपूत सामंत नरसिंह राव चौहान से एक संधि करने के लिए सहमत हुआ। दोनों पक्षों के बीच बैरसिया के दक्षिण में 20 मील दूर जगदीशपुर में मिलने की सहमति हुई। हर पक्ष से 16 लोग शामिल किए गए। दोस्त मोहम्मद ने थाल नदी के किनारे तंबू लगवाए और एक शानदार मैत्री भोज का आयोजन रखा। इसमें जैसे ही इत्र और पान के बीड़े  सजाए गए, दोस्त के उन सैनिकों के लिए तंबुओं में घुसने का इशारा मिल गया जो पास की झाड़ियों में छुपे थे। वे निकले, तंबुओं की रस्सियां काटी और संशयरहित राजपूतों की हत्या कर दी। यह नरसंहार इतना वीभत्स था कि नदी बहते हुए खून से लाल हो गई। राजपूतों की हत्या के खून से रंगी यह नदी इस दिन से हलाली नदी कहलाने लगी। दोस्त मोहम्मद ने इसके बाद जगदीशपुर का नाम इस्लामपुर इस्लामनगर कर दिया।:’कई सालों बाद वर्ष 1722 में दोस्त ने अपने चचेरे भाई दिलेर मोहम्मद खान के साथ भी ऐसा ही कपटपूर्ण व्यवहार किया, जो उसके राज्य में हिस्सा मांग रहा था।’

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‘एक अन्य घटना शक्तिशाली राजपूत सरदार और मुगल सूबेदार, जो गवर्नर के बराबर माना जाता था, दिए बहादुर के साथ हुई। दिए बहादुर ने दोस्त मोहम्मद की सेना को हरा दिया था और यह सेना अपने नेता को ही छोड़कर भाग गई थी। गिने-चुने वफादार इस राजपूत सेना से लड़ने के लिए शेष बचे थे। दोस्त ने इस युद्ध में अपने भाई को भी खो किया। वह भी बुरी तरह घायल हुआ। उसे बंदी बना लिया गया। लेकिन राजपूत परंपरा के अनुसार उसके साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया गया और जब उसका स्वास्थ्य सुधर गया तो उसे दिए बहादुर के सामने प्रस्तुत किया गया। दोस्त अपनी डायरी में लिखता है कि वह राजपूत सरदार की दयालुता और उसके विभिन्न सरदारों द्वारा उसके उपचार में की गई मदद को लेकर बहुत खुश हुआ। दोस्त मोहम्मद की बहादुरी से प्रभावित होकर दिए बहादुर ने पूछा कि क्या वह उसकी सेना में शामिल होना चाहेगा? दोस्त ने गहरा आभार जताते हुए इससे इनकार कर दिया। तब दिए बहादुर ने कहा कि यदि मुक्त कर दिया जाए तोकैदी क्या चाहेगा?  दोस्त ने कहा- मैं आपकी सेना से फिर लड़ना चाहूंगा।  इस अप्रत्याशित उत्तर से दोस्त को आशंका थी कि उसे मौत के घाट उतार दिया जाएगा लेकिन वह लिखता है कि दिए बहादुर ने एक क्षण सोचा और फिर मुस्कुराते हुए बोला- ठीक है। तुम एक बहादुर व्यक्ति हो मैं तुम्हें मुक्त करता हूं और 40 दिन के भीतर हम फिर युद्ध करेंगे। दोस्त को एक घोड़ा दिया गया जिस पर उसने आभार जताते हुए सवारी की।  कुछ महीनों बाद दोस्त ने सेना खड़ी की और एक मुठभेड़ में दिए बहादुर को हरा दिया। इस कठिन अभियानों से दोस्त की दु:साहसी सेनानायक की बनती गई। दोस्त लिखता है- मालवा में उभर रहे राजपूत विद्रोहियों का दमन करने के लिए दिल्ली से एक सेना की टुकड़ी भेजी  गई थी। दोस्त मोहम्मद इस समय दूर स्थित मुगलों के प्रति वफादारी और स्थानीय राजपूत सरदारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के बीच झूल रहा था। अंततः उसने राजपूतों का पक्ष लेने का फैसला किया। इस लड़ाई में वह घायल हो गया और उसकी चेतना लुप्त हो गई। अपने सरदार को मरा हुआ समझकर उसके लोग भाग गए। दोस्त अपनी डायरी में लिखता है कि जब उसे चेतना आई तो आसपास सियार रुदन कर रहे थे। बमुश्किल उसने उनसे छुटकारा पाया तो एक आदमी की आवाज सुनी जो पानी मांग रहा था। दोस्त ने अपनी मसक में बचा हुआ पानी उसको पिलाया। वह सैयद हुसैन अली बारहा था जो हुसैन भाइयों में सबसे छोटा था, जो कि दिल्ली में मुगल बादशाहों के खासमखास थे।  दोस्त मोहम्मद खान ने सैयद हुसैन अली बाबा के साथ मिलकर अपनी खोई हुई सत्ता को प्राप्त किया। इस तरह दोनों मित्र हो गए। सैयद हुसैन अली ने उसे और उसके भाई को इलाहाबाद का राज्यपाल बनाने का न्योता दिया लेकिन दोस्त ने यह कहकर उसे खारिज कर दिया कि उसकी जड़ें मालवा में हैं। दोस्त को सोना- चांदी, एक तलवार और घोड़ा देकर विदा किया गया। दोस्त भोपाल के पास मंगलगढ़ आ गया, जहां वह रानी के संरक्षण में रहता था। दोस्त के सामने फिर यह दुविधा थी कि वह दिल्ली के सैयद भाइयों की मित्रता को निभाए या निजाम के समर्थन में खड़ा हो। लेकिन इसी बीच मुगल सल्तनत में बगावत हो गई। मंगलगढ़ लौटने पर रानी ने उसे पुत्र की तरह गोद ले लिया था क्योंकि उनके बेटे का निधन हो चुका था। दोस्त ने रानी के खजाने पर कब्जा कर लिया। अपने परिवार और बर्रूकाट पठान वफादारों से मिलकर दोस्त ने अपने राज्य के विस्तार का सिलसिला जारी रखा। कई जागीरदारों और जमींदारों ने उसकी प्रभुसत्ता स्वीकार कर ली। दोस्त मोहम्मद ने अपनी सत्ता का दोराहा, सीहोर, इछावर, आष्टा, शुजालपुर तक विस्तार किया।’

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‘संभवत: उसके पूरे जीवन का सबसे मुश्किल संघर्ष विदिशा के गवर्नर मोहम्मद फारुख के विरुद्ध था। विदिशा के समीप लड़ी गई इस लड़ाई में फारुख के साथ 40000 मराठा और राजपूत सैनिक थे जबकि दोस्त के पास सिर्फ 5000 वफादार अफगानी सैनिक। इसमें दोस्त का भाई मोहम्मद खान मारा गया। युद्ध में दोस्त की सेना हार गई और वह झाड़ियों में छिप गया। जब फारूक की सेना जश्न में डूबी थी तब दोस्त ने विजेता सैनिकों की वेशभूषा छीनकर पहन ली और उनकी सेना के हाथी पर सवार होकर फारूक के नजदीक पहुंच गया। दोस्त ने फारुख को भाला मार दिया और जब उसकी सेना विजय उन्माद में डूबी थी तब फारूक के हाथी ने विदिशा किले में प्रवेश किया। हाथी पर फारुख का मृत शरीर बैठाया गया था। तभी दोस्त ने अपनी विजय की घोषणा की। अंत में दोस्त मोहम्मद ने भोपाल पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। यह एक रोमांस की कहानी है। भोपाल के आसपास कई गोंड सामंत और गोंड राजाओं की सत्ता चलती थी। उनमें से एक राजा निजाम शाह सबसे मजबूत योद्धा के रूप में मशहूर था। जिसकी रानी कमलापति अप्रतिम सौंदर्य और प्रतिभा की धनी थी।   न केवल वह देखने में खूबसूरत थी बल्कि शिक्षित,  सुसंस्कृत और कला की जानकार थी। रानी कमलापति अपने सौंदर्य और गरिमा के लिए विख्यात थी। जब वह झील में तैरती थी तब ५००  नौकाओं में बैठकर दासियां उसकी रक्षा करती थीं। बताया जाता है कि जब उसके पति को जहर दिया गया, रानी ने अपने सारे बेशकीमती आभूषण उतार दिए, मुकुट उतारकर रख दिया और झील में फेंक दिया।’ (इंडिया डेटलाइन)

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