विजय बुधोलिया

वाल्मीकि के बाद की रचनाओं में राम की बाललीला के वर्णन में भागवत पुराण की कृष्ण की बाललीला का अनुसरण किया गया है। अध्यात्म रामायण में राम का नटखटपन,मक्खन चोरी, बरतनों का फोड़ना आदि वर्णित है, जो स्पष्टत: भागवत पुराण पर निर्भर है। यह वर्णन आनन्द रामायण और राम रहस्य में भी पाया जाता है।

‘भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी’ हर रामनवमीं पर हम रामचरित मानस की इस स्तुति को पूरी श्रद्धा और भक्ति-भाव के साथ गाते हैं। जिसमें शिशु राम अपनी माता कौशल्या को अपने चतुर्भुज विष्णु रूप का दर्शन देते हैं। किन्तु, बहुत कम लोगों को यह ज्ञात होगा कि अध्यात्म रामायण वह प्राचीनतम रचना है जिसमें पहले-पहल इसका वर्णन किया गया है कि शिशु राम जन्म लेते ही अपनी  माता के सामने अपने विष्णु रूप में प्रकट हुए। कौशल्या “नीलोत्पपलदलस्याम: पीतवासाश्चतुर्भुज:” बालक को देखकर भगवान के रूप में उनकी स्तुति करने लगती है और अन्त में उनसे निवेदन करती है कि वह अपना सुकोमल शिशु रूप ग्रहण करें। इस पर राम अपनी माता को पूर्व जन्म की तपस्या तथा वर-प्राप्ति का स्मरण दिलाते हैं कि तब दशरथ कश्यप और वे अदिति थीं और उन्होंने तपस्या कर नारायण  को प्रसन्न किया था तथा उन्हें पुत्र के रूप में प्राप्त करने की अभिलाषा प्रकट की थी। इसके बाद वे शिशु का रूप धारण कर लेते हैं। अध्येताओं का यह मानना है कि इस प्रसंग का आधार स्पष्टत: भागवत-पुराण है,जिसमें शिशु कृष्ण द्वारा वसुदेव-देवकी के सामने विष्णु-रूप का प्रदर्शन, वसुदेव-देवकी द्वारा उनकी स्तुति, देवकी द्वारा बालक रूप धरने का निवेदन तथा कृष्ण द्वारा पूर्व-जन्म में वसुदेव-देवकी की तपस्या और वर-प्राप्ति का उल्लेख बहुत कुछ समान भाव से किया गया है। अध्यात्म रामायण के अनुसरण पर बाद की राम-कथाओं में प्राय: कौशल्या के सामने राम के अपने विष्णु रूप में प्रकट होने की कथा मिलती है,जिनमें पद्म-पुराण, आनन्द रामायण, रामचरित मानस, राम रहस्य, भावार्थ रामायण, राघवोल्लास तथा तत्वसंग्रह रामायण प्रमुख हैं।

वाल्मीकि के बाद की रचनाओं में राम की बाललीला के वर्णन में भागवत पुराण की कृष्ण की बाललीला का अनुसरण किया गया है। अध्यात्म रामायण में राम का नटखटपन,मक्खन चोरी, बरतनों का फोड़ना आदि वर्णित है, जो स्पष्टत: भागवत पुराण पर निर्भर है। यह वर्णन आनन्द रामायण और राम रहस्य में भी पाया जाता है। सत्योपख्यान में राम द्वारा जलपात्र में प्रतिबिंबित चन्द्रमा को पकड़ने के प्रयास का वर्णन है। तुलसीदास जी ने अपनी कवितावली तथा गीतावली के वर्णन में सूरसागर की कृष्ण-बाललीला का अनुकरण किया है।

कई रचनाओं में बालक राम पर राक्षसों के आक्रमण का वर्णन किया गया है।कृतिवास रामायण के अनुसार राम के जन्म के समय रावण का मुकुट भूमि पर गिर गया तथा एक आकाशवाणी भी सुनाई पड़ी कि दशरथ के घर में विष्णु का जन्म हुआ है। इस पर रावण ने विचार किया कि शैशव में ही मारने में मेरा कल्याण है और उसने पता लगाने के लिए शुक-सारण को अयोध्या भेज दिया। दोनों राक्षस जाकर शिशु को प्रणाम करते हैं, भक्ति का वरदान मांग कर लंका लौटते हैं और रावण को आश्वासन देते हैं कि उसकी आशंका निर्मूल है।

पद्मपुराण के अनुसार ब्रह्मराक्षस वात्या का रूप धारण कर आता है और राम को गिराकर मूर्छित कर देता है।वसिष्ठ मंत्र पढ़कर राक्षस को शापमुक्त कर देते हैं। ब्रह्मराक्षस अपना परिचय देकर कहता है कि वह वेदगर्वित ब्राह्मण था और परधन हड़पने के कारण ब्रह्मराक्षस बन गया था। पद्मपुराण के ही एक अन्य प्रसंग में बालक राम पुष्पनिर्मित धनुष से एक राक्षस को मार डालते हैं। भुशुण्डी रामायण में भागवत पुराण का प्रभाव है। इसके अनुसार रावण द्वारा भेजे गए दो राक्षस बाल्यावस्था में ही राम को समाप्त करने का प्रयत्न करते हैं और स्वयं मारे जाते हैं। उनके डरसे दशरथ राम को किसी गुप्त स्थान पर भेजते हैं। सरयूपार गोप्रदेश में गोपेन्द्र सुखित और उनकी स्त्री मांगल्य उनका पालन-पोषण करते हैं। कृतिवास में ये राक्षस रामभक्त बन जाते हैं।

काक भुशुण्डी की कथा का पहले-पहल योगवशिष्ठ में वर्णन किया गया है। किन्तु,योगवशिष्ठ के भुशुण्डी-उपाख्यान में कहीं भी उसके पूर्वजन्म या उसकी रामभक्ति का वर्णन नहीं किया गया है। पर रामचरित मानस में उसके पूर्व जन्मों की कथा दी गई है; पूर्व कल्प के एक कलियुग में वह अयोध्यावासी शूद्र था। बाद में वह उज्जैन चला गया।गुरु का सत्कार न करने के कारण वह शिव-शाप से सर्प हो गया। बाद में वह गुरु तथा शिव की कृपा से सगुणरूप राम का उपासक ब्राह्मण बन गया और अंत में लोमश ऋषि के शाप से उसे काक-योनि प्राप्त हुई।

रामचरित मानस के अनुसार काक भुशुण्डी तथा शिव, दोनों मनुष्य के रूप में  राम-जन्म-उत्सव पर अयोध्या गए थे। सत्योपख्यान में रामभक्त काक भुशुण्डी राम को रोटी खाते हुए देखकर उनके नारायणत्व में संदेह करता है। परीक्षा करने के उद्देश्य से वह उसे राम के हाथ से खींच कर भाग जाता है । किन्तु,राम गरूड़ पर बैढ़ कर तीनों लोकों में उसका पीछा करते हैं।अंत में काक राम की शरण लेता है और  निश्चल भक्ति का वरदान पाकर अपने आश्रम लौटता है। बाद में शिव तथा भुशुण्डी दोनों के ब्राह्मणवेश में राम को देखने के लिए अयोध्या जाने का उल्लेख है।

रामचरित मानस में भुशुण्डी गरुड़ से कहता है कि मेरा इष्टदेव बालक राम है। वह प्रत्येक रामावतार में राम की बाललीला देखने जाता है और पांच वर्ष तक राम की संगति में बिताता है। वह अपने मोह की कथा भी सुनाता है। किसी दिन राम की बाललीला देखकर (प्राकृत सिसु इव लीला देखि) भुशुण्डी के मन में उनके नारायणत्व के विषय में संदेह उत्पन्न हुआ । इस पर राम भुशुण्डी को पकड़ने आगे बढ़े और भुशुण्डी भाग गया, किन्तु वह आकाश में उड़ता हुआ भी राम की भुजा अपने पास ही देखता रहा। अन्त में भयभीत होकर भुशुण्डी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने को अयोध्या में पाया। राम उसके सामने हसते हुए खड़े थे और भुशुण्डी ने उनके मुख में प्रवेश कर राम के शरीर के अँदर बहुत से ब्रह्मांड़ देख लिए। इस प्रकार भुशुण्डी का मोह दूर हुआ।

भगवद्गीता के अनुसार कृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट रूप दिखलाया था तथा भगवत पुराण के अनुसार यशोदा ने बालक कृष्ण के मुख में समस्त ब्रह्माण्ड देखा। बाद की कुछ रचनाओं में ऐसी कथा राम के विषय में भी मिलती है। रामलिंगामृत तथा रामचरितमानस में राम ने अपनी माता को भी अपना विराट रूप दिखलाया था (देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड।रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड।।) पद्मपुराण के अनुसार राम ने अपना विष्णुरूप प्रकट करते समय अपने विश्व-रूप को भी दिखलाया था। बाद की रचनाओं के अनुसार राम ने रामायण के अन्य पात्रों जैसे परशुराम, हनुमान्, भुशुण्डी और अभिषेक के अवसर पर अपने अतिथियों को भी अपना नारायण रूप दिखलाया था। रामलिंगामृत में राम की बाललीला के बाद उनकी वन-क्रीड़ा का भी उल्लेख किया गया है। कृष्णकथा का यह अनुकरण उड़िया नृसिंहपुराण और बृहत्कोशल खंड में आगे बढ़ा दिया गया है तथा विवाह के पूर्व राम की रासलीला का भी विस्तृत वर्णन किया गया है। (इंडिया डेटलाइन)

    

     ( बुधोलिया रामकथा के अध्येता हैं।)

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