अनवर हुसैन/कोलकाता से

 वैसे तो पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया तेज रफ्तार से चल रही है लेकिन पूरे देश की नजर पश्चिम बंगाल पर टिकी है। असम, केरल, तमिलनाडू और एक अन्य केद्रशासित प्रदेश पुंडुचेरी में तो मानो किसी की कोई दिलचस्पी ही नहीं है। वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल देश के चुनावी अखाड़ा में तब्दिल हो गया है और मुख्यधारा के मीडिया में सुर्खिया बटोर रहा है। लगातार 34 वर्षों तक पश्चिम बंगाल में शासन करने वाले वामपंथी हाशिए पर हैं। कंग्रेस और धार्मिक पहचान रखनेवाले एक नेता अब्बास सिद्दीकी की नवगठित पार्टी इंडियन सेकुलर फ्रंट के साथ मिलकर वाममोर्चा को चुनावी मैदान में संयुक्त मोर्चा के छत्र छाया में चुनाव लड़ना पड़ रहा है। बंगाल में मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच है। रज्य की चुनावी जंग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनाम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर केंद्रित हो गई है। चूंकि बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं किया गया है इसलिए पीएम मोदी ही भाजपा के चेहरा हैं। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के कई बड़े नेताओं के पार्टी छोड़कर भाजपा में चले जाने और कमल फूल का उम्मीदवार बन जाने से ममता हताश हैं। सुश्री बनर्जी ने आम जनता से अपील की है कि सभी सीटों पर उन्हें ही उम्मीदवार मान कर मतदान करें।

ऐसी स्थिति में पूरे देश की निगाहें पश्चिम बंगाल के चुनाव पर टिकी है तो इसकी कुछ खास वजह है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के मुताबिक इस बार  बंगाल का चुनावी नतीजा कुछ हद तक देश का राजनीतिक परिदृश्य भी बदल सकता है। चुनावी अखाड़े के महारथियों के बयान से भी इसके संकेत मिल रहे हैं। इस माह के प्रथम सप्ताह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड मैदान में भाजपा की चुनावी रैली को संबोधित किया तो उनको सुनने के लिए भारी भीड़ जुटी थी। उनके लंबे भाषण को यहां दोहराना जरूरी नहीं हैं फिर भी प्रधानमंत्री के दो वाक्यों पर गौर किया जाना चाहिए जो काफी महत्वपूर्ण है। पहला बकौल प्रधानमंत्री बंगाल की जीत भारत की जीत होगी। दूसरा जनता के जीवन से खेला करने के दिन शेष हो गए।

इस बार बंगाल के चुनावी महासमर में तृणमूल कांग्रेस की ओर से खेला होबे (खेला होगा) नारा उछाला गया है जो राजनीतिक हलको में चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रधानमंत्री ने अपने दो वाक्य से चुनावी मैदान में उतरे तृणमूल कंग्रसे के खिलाड़ियों को जवाब दे दिया है। उनके इन दो वाक्यों के सार तत्व यहीं है कि बंगाल में जीत हासिल किए बिना भाजपा की जीत अधूरी है। बंगाल की जनता के साथ खेला करने के दिन शेष हो गए हैं यानी राज्य की जनता अब यहां भाजपा की सत्ता चाहती है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक चुनावी सभा में कहा है कि इस बार का चुनाव एक युद्ध की तरह है। उन्होंने बंगाल की जनता से मान अभिमान छोड़कक एक बार फिर खुद को जिताने की अपील की है। ममता ने यहां तक कहा कि यदि जाने अनजाने उनकी आचरण से किसी को आघात पहुंचा है ते वह इसके लिए क्षमाप्रार्थी हैं। वह अपनी गलती सुधार लेंगी। अब देखना है कि जख्मी पैर के सहारे ह्वीलचेयर पर बैठकर ममता बंगाल की जनता से यह जो कातर अपील कर रही हैं उसका चुनाव पर कितना असर पड़ता है। तृणमूल कांग्रेस के चुनावी बैनर और पोस्टर पर ममता की तस्वीर के साथ जो दूसरा नारा चमक रहा है वह है- बांग्ला निजेर मेयेकेइ चाय (बंगाल अपनी बेटी को ही चाहता है)। ममता खुद को बंगाल की बेटी के रूप में प्रचारित कर रही हैं और भाजपा नेताओं को बाहरी साबित करने में जुटी है।

इसी कड़ी में प्रधानमंत्री की उपस्थिति में भाजपा में शामिल हुए फिल्म अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती का एक बयान महत्वपूर्ण हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि बंगाल में रहनेवाला हर व्यक्ति बंगाली है। फिल्म अभिनेता ने एक बांग्ला डिजिटल मीडिया को दिए इंटव्यू में यह भी कहा कि 70 वर्षों से बंगाल केंद्र का विरोध करता रहा है। अब भाजपा का नेतृत्व वाले केंद्र का समर्थन करके भी देखना चाहिए। बॉलीवुड में खास पहचान रखने वाले बंगाल के फिल्म अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती का कभी वामपंथियों से गहरा संबंध था। नक्सल पृष्ठभूमि से वामपंथियों के संपर्क में आए मिथुन चक्रवर्ती 2011 में सत्ता परिवर्तन होने के बाद ममता बनर्जी के आह्वान पर तृणमू कांग्रेस से जुड़ गए। ममता ने मिथुन को राज्य़सभा में भेजा लेकिन सारदा चिटफंड घोटाला में उनका भी नाम आने पर फिल्म अभिनेता ने पैसा वापस कर दिया और 2016 में तृणमूल कांग्रेस के सांसद पद से इस्तीफा दे दिया।

मिथुन चक्रवर्ती का ताजा बयान बंगाल की नई पीढ़ी की राजनीतिक सोच से मेल खाता है। बंगाल की नई पीढ़ी का मानना है कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी का शासन होने से विकास का रफ्तार तेज होगा। बंगाल में साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े लोग जो कभी भाजपा को अछूत मानते थे वे अब न सिर्फ समर्थन कर रहे हैं बल्कि सीधे केसरिया झंडा थामने लगे हैं और इस चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार भी बनाए गए हैं। भाजपा के प्रति बंगाली समाज खास कर नई पीढ़ी की सोच बदली है जो बदलाव का परिचायक है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बंगाल में 42 में से 18 सीटों पर जीत हासिल हुई है और इस आधार पर वह इस बार राज्य की सत्ता पर अपनी दावेदारी मान कर चल रही है।

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो दूसरी बार पूर्ण बहुमत से केंद्र की सत्ता में आने के बाद भाजपा के लिए सबकुछ ठीक नहीं है। उस पर रज्यों में जोड़तोड़ कर सत्ता हथियाने के आरोप लग रहे हैं। सक्रिय राजनीतिक से दूर रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री व भाजपा के विक्षुब्ध नेता यशवंत सिन्हा ने तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के बाद भाजपा पर लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थओं को पंगु बनाने का गंभीर आरोप लगाया है। सिन्हा ने न्याय पालिका और चुनाव आयोग तक की कैर्यशैली पर सवाल उठाया है। मोदी के विरुद्ध लड़ाई में यशवंत सिन्हा ममता के लिए कितना मददगार साबिबत होंगे यह तो समय बताएगा। लेकिन राजनीतिक पंडितों का मानना है कि शाहीन बाग आंदोलन के बाद किसानों के आंदोलन ने एक बार फिर भाजपा के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर माहौल तैयार कर दिया है। भाजपा बंगाल में चुनाव जितती है तो उसकी गलतियों और खामियों पर पर्दा पड़ जाएगा और क्षेत्रीय दल के रूप में विरोध के स्वर पर एक तरह से पूर्ण विराम लग जाएगा। यही वजह है कि भाजपा बंगाल चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक रही है। लेकिन अगर ममता जीतकर तीसरी बार मुख्यमंत्री बनती हैं तो रष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विरुद्ध लड़ाई को दूर तक ले जाएंगी इसमें कोई दो राय नहीं है। देश की राजनीति पर पैनी नजर रखनेवाले कुछ लोग तो बंगाल विधानसभा चुनाव को 2024 के लोकसभा चुनाव के भविष्य़ से जोड़ कर देख रहे है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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