पुस्तकालय

पुस्तक का नाम-बर्नियर की भारत यात्रा

लेख-फैंवि्कस बर्नियर एमडी 

प्रकाशक- नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया

विदेशी यात्रियों के विवरण हमारे अतीत पर बहुत अच्छा प्रकाश डालते हैं। मुगल वंश के भीतरी और वास्तविक इतिहास को जानने के लिए तत्कालीन फ्रांसीसी यात्री बर्नियर का ब्योरा कई नए तथ्य उद्घाटित करता है। बर्नियर सत्रहवीं सदी में आए जब शाहजहां अपने अंतिम दौर में थे और उनके चारों बेटों में मुगल बादशाह की गद्दी पाने का संघर्ष चल रहा था। बर्नियर दरबार में आठ साल तक रहे इसलिए इनके प्रत्यक्ष दृष्टा रहे। उन्होंने औरंगजेब के चरित्र को उसके असली रूप में उजागर किया है जिसे कई इतिहासकारों ने महिमामंडित किया है। बर्नियर की भारत यात्रा यद्यपि पहली बार कल्पतरु प्रेस काशी से वर्ष 1905 में प्रकाशित हुई थी किन्तु बाद में इसके कई संस्करण निकलते रहे। नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित पुस्तक के संपादित अंश पाठकों के संदर्भ के लिए प्रस्तुत हैं-

यदि दारा शिकोह हाथी से नहीं उतरता, यदि वह सोचता कि साथी ही की कृपा से आज वह कैसे-कैसे काम कर सका है और सैनिकों को उसके दिखाई देते रहने से इतना साहस हुआ है तो वही अपने पिता के सुविस्तृत राज्य का अधिकारी होता। परंतु राज्य के लोभ में पड़कर उसने खलीलुल्लाह की बातों का विश्वास किया जो एक विश्वासघाती सरदार था। थोड़ी देर के बाद जब उसे कुछ संदेह हुआ तब उसने पूछा कि खलीलुल्लाह कहां है। पर अब वह कहां था और कब उसके हाथ आता था। परंतु उसका यह धमकी देना और क्रोध प्रकट करना एकदम व्यर्थ हुआ। कारण यह कि सिपाहियों ने जब यह देखा कि उनका मालिक हाथी पर नहीं है तब तुरंत उसके मारे जाने का संवाद चारों ओर फैल गया और सारी सेना में हलचल मच गई। क्षण मात्र में विचित्र परिवर्तन दिखाई दिया अर्थात विजयी विजित हुए और विजित विजयी। यह विलक्षणता देखिए कि औरंगजेब के केवल 5 घंटे हाथी पर चढ़े रहने का यह परिणाम हुआ कि वह भारतवर्ष का बादशाह हो गया और कुछ क्षणों के निमित्त हाथी से उतरने का दारा को यह फल मिला कि वह हाथी से क्या उतरा, मानो राजासन से गिर गया। और अभागे राजकुमारों की श्रेणी में परिगणित हुआ। देखिए मनुष्य कैसा अदूरदर्शी है। एक छोटी सी बात से इस संसार में कैसे-कैसे बड़े बड़े परिवर्तन हो जाते हैं। 

औरंगजेब जो अपना मतलब निकालने के लिए नीच से नीच काम कर डालने को सदा तैयार रहता था, आकस्मिक और ईश्वरीय विजय पाकर तथा यह समझकर कि अब उपयुक्त समय आया है, अपनी चाल के जाल फैलाने में प्रवृत्त हुआ।  तुरंत ही विश्वासघाती खलीलुल्लाह भी उससे आ मिला।उसके आते ही उसने उसकी खूब प्रशंसा की और अनेक आशाएं दिखाईं। परंतु जो कुछ प्रतिज्ञा की, वह अपनी ओर से नहीं अपने भाई मुराद की ओर से। और इसके उपरांत वह स्वयं उसे मुराद के निकट ले गया। उसने भी समय के अनुसार बड़ी प्रसन्नता से इसका स्वागत किया। औरंगजेब ने दिखाने के लिए खलीलुल्लाह से कहा कि जनाब सिर्फ हजरत ही (अर्थात मुराद) तख्तनशीनी के लायक हैं और यह फतेह इन्हीं की काबिलियत से हासिल हुई है। इधर तो औरंगजेब ऐसी प्रीतियुक्त बातें करता था, उधर रात दिन शाहजहां के दरबार के उमरा को पत्र लिखकर धीरे-धीरे अपने पक्ष में करता था। इन दिनों उसका मामू शाइस्ता खां भी इसके निमित्त बहुत कुछ उद्योग कर रहा था। वह एक चतुर, बुद्धिमान और शक्तिशाली पुरुष था। सारे भारतवर्ष में यह बात प्रसिद्ध थी कि वह बहुत सधी हुई और प्रभावशाली भाषा में पत्र लिखकर तथा बातें करके बड़े-बड़े काम निकाल सकता है। राज्य का विकट लोभी होने पर भी औरंगजेब लोगों के दिखावे में ऐसा बना रहता, मानो इस खटपट से उसका कुछ स्वार्थ ही नहीं है। जो काम होते, मुराद के नाम से होते। औरंगजेब अपने बर्ताव से यह भाव दिखाता कि राज्य के खटपट में पढ़ने की उसकी कदापि इच्छा नहीं है। वरन वह संन्यासियों की भांति पवित्रता और शांति से अपने जीवन का अंत कर देना चाहता है।

औरंगजेब यद्यपि दारा के समान शिष्ट और उदार मन का नहीं था तो भी उसकी अपेक्षा अधिक दृढ़ विचार और ऐसे मनुष्यों को चुनने में अधिक चतुर था, जो उसके कामों को भक्ति और योग्यता के साथ पूरा कर सकते हैं। वह केवल उन्हीं लोगों को खूब इनाम देता जिनको प्रसन्न करना या प्रसन्न रखना उसके लिए अत्यंत आवश्यक होता। वह अपने भेद को बहुत छुपाकर रखता, धूर्तता और कपटता उसमें कूट-कूट कर भरी थी। जिस समय वह अपने पिता के दरबार में आता, उस समय जो भक्ति उसमें जरा भी न होती, उसको भी दिखाने का प्रयत्न करता और सांसारिक सुख वैभव को धिक्कारता था परंतु भीतर ही भीतर भविष्य में ऊंचा पद पाने का मार्ग तैयार करता जाता। यहां तक कि जब उसे दक्षिण की सूबेदारी भी दी गई, तब भी उसने बहुतों से यही कहा कि अगर मुझे तर्क, दुनिया और दरवेशी की इजाजत मिल जाती तो मैं ज्यादा खुश होता क्योंकि मेरी दिली तमन्ना भी थी कि बाकी जिंदगी पारसाई जिम्मेदारी में पड़ना मुझे नामरगूब और ,नापसंद है।  यद्यपि औरंगजेब का समस्त जीवन धूर्तता और कपट आचरण में ही बीता तथापि वह ऐसी बुद्धिमानी के साथ काम करता कि उसके भाई दारा शिकोह को छोड़ दरबार के सभी लोग उसकी चतुराई को समझने में धोखा खा जाते। शाहजहां बादशाह के औरंगजेब के विषय में ऊंचे विचार थे जिससे दारा शिकोह को ईर्ष्या होती और अपनी मित्र मंडली में बैठकर हुए कभी-कभी कहा करता कि अपने सब भाइयों में मुझे सिर्फ एक ही का शुबहा और खौफ है वह किसी और का नहीं, इन्हीं हजरत दीनदार और नमाजी साहब का है।

दो दिन तक तो शाहजहां किले की कुंजियां देने में आगा पीछा करता रहा किंतु जब उसने देखा कि सब लोग उसे छोड़कर जा रहे हैं बल्कि थोड़े से जो उसके निजी संरक्षक थे, वे भी चले गए और बचाव की कुछ आसानी रहेगी। तब विवश होकर उसने दुर्ग की तालियां सुलेमान शिकोह को दे दीं और कहा कि अब तो औरंगजेब को जरूर ही आना चाहिए और समझदारी भी इसी में है कि वह आकर जल्द हमसे मिले क्योंकि सल्तनत के बाद जरूरी इसरार हम उसको समझाना चाहते हैं। परंतु औरंगजेब और धूर्तता और चतुराई से नहीं चूका। स्वयं ना आकर उसने एतबार खां नामक अपने एक विश्वासी अनुचर को किलेदार नियुक्त किया जिसने यहां पहुंचते ही सब बेगम और बड़ी राजकुमारी बेगम साहब और स्वयं बादशाह को कैद कर लिया बल्कि किले के कई द्वार एकदम बंद करा दिए। शाहजहां और उसके शुभचिंतकों का बाहर आना जाना तो कहां, उनकी बातचीत और पत्र व्यवहार तक बंद हो गए। शाहजहां को किलेदार के पास बिना सूचना भेजे अपने कमरे से बाहर निकलने तक का अधिकार नहीं था। इस अवसर पर औरंगजेब ने पिता को एक पत्र लिखा जो बंद किए जाने से पहले जानबूझकर सब लोगों को सुनाया गया। बहुत से बुद्धिमान और सूक्ष्मदर्शी लोग कहते हैं कि यह पत्र जिनको औरंगजेब ने किसी प्रकार पा लिया और सर्वसाधारण को सुनाया था, बिल्कुल झूठा और बनावटी था। औरंगजेब ने केवल इसलिए इनको प्रकट किया था कि जिसमें शाहजहां के शुभचिंतक और सहायक गण जो उसके अनुचित व्यवहार से असंतुष्ट हो रहे थे, ठंडे पड़ जाएं। अस्तु,सत्य बात चाहे कुछ भी हो,  इस बात का निश्चय है कि जब बादशाह इस कठोर रीति से कैद हो गया, तब सभी उमरा औरंगजेब और मुराद के दरबार में सलाम करने के लिए उपस्थित हुए। शोक, उस बेचारे वृद्ध और अत्याचार पीड़ित बादशाह के पक्ष में किसी अमीर व सरदार ने हाथ पांव तक नहीं हिलाए और किसी के भी फूटे मुंह से कोई बात ना निकली। यह उमरा उन भयंकर अत्याचारियों के आगे सिर झुकाने जाते थे जिन्होंने उसके स्वामी और पालक के साथ ऐसा कठोर व्यवहार किया था। जिन जिन उपायों से औरंगजेब ने उन्नति पाई और उच्चतम पद प्राप्त किया है, निश्चय है कि पाठकगण उसको बहुत नापसंद करेंगे क्योंकि भी उपाय अत्याचारपूर्ण, अन्यायपूर्ण और अनुचित थे परंतु यदि इन उपायों को उसी दृष्टि से जांचा जाए जिससे यूरोप के राजकुमारों के चरित्र जांचे जाते हैं तो ऐसा करना अनुचित होगा क्योंकि यूरोप देश में उत्तराधिकार के नियम बंधे रहते हैं और बड़े पुत्र के सिवा दूसरा कोई पिता की गद्दी पर बैठने नहीं पाता । भारतवर्ष में पिता के बाद राज्य प्राप्ति के लिए राजकुमारों में सदैव झगड़ा होता है और इन कठोर बातों में से कोई एक बात होती है या तो राज्य के लिए स्वयं प्राण दे दें या भाइयों के प्राण ले लें।  तो भी उन लोगों को जो देश के नियम, कुटुंब के नियम और शिक्षा पद्धति के असर को स्वीकार करते हैं,  यह तो मानना ही पड़ेगा कि औरंगजेब को परमेश्वर ने बड़ी बुद्धि, चिंतन शक्ति और समझदारी दी और वह एक बड़ा ही ऊंचा व आलीशान बादशाह है। (इंडिया डेटलाइन)

प्रस्तुतिः भूमि श्रीवास्तव

1 COMMENT

  1. कभी किसी युग मे राजनीति और सत्ता का संघर्ष नैतिकता से चला हो तो जरूर बताइये ।

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