हनुमान जयंती

आज कोरोना के भयपूर्ण वातावरण के बीच मात्र हनुमत-कथा ही वह रामबाण औषधि प्रतीत होती है, जो इस संकट से उबारने में सहायक हो सकती है। संकटमोचक हनुमान् जी के स्मरण मात्र से मन आश्वस्त होता है और ऐसा महसूस होने लगता है कि कोई जागृत शक्ति है, जो हमारे आस-पास ही है और वही हमें कष्टों से उबारेगी। 

                  विजय  बुधौलिया

 

रामकथा में हनुमान् जी अपने अद्भुत कारनामों और अखंड रामभक्ति की वजह से सबसे लोकप्रिय पात्र हैं। उनका अकेलेे ही  विशाल समुद्र लांघना, अशोक वाटिका को उजाड़ देना, रावण के हजारों योद्धाओं का वध कर देना, रावण को भरी सभा में उसे सीता जी को लौटा कर श्रीराम की शरण में जाने का उपदेश देना, पूँछ में आग लगा देने पर सारी लंका को जला देना जैसे उनके ऐसे ही शौर्य और शक्ति भरे काम हैं, जिनकेे कारण वे सदा से लोगों में साहस का संचार करते रहे हैं। (को नहिं जानत है जग में कपि संकट मोचक नाम तिहारो।)

अद्भुत एवं हास्यरस की भरपूर गुंजाइश के कारण लंकादहन कवियों का प्रिय विषय रहा है इसलिए इसके वर्णन में अनेक नई सामग्रियों की कल्पना कर ली गई है। अध्यात्म रामायण के अनुसार हनुमान् को भूख लगी थी, उन्होंने सीता जी की अनुमति लेकर अशोक वन के फल खाए और बाद में प्रणाम करके चले गए। फिर कुछ दूर चलने पर उन्होंने तय किया कि रावण से मिलकर जाना अच्छा है और इसलिए वे अशोक वन उजाड़ने लगे। आनन्द रामायण में इस प्रसंग को बढ़ा दिया गया है। जब हनुमान् ने फल खाने की आज्ञा मांगी, सीता ने अपना कंकण उतार कर कहा–“यह लो और लंका की दूकानों से फलों के ढ़ेर खरीदकर खा लो।” तब हनुमान जी ने कहा–“मैं दूसरों के हाथों के तोड़े हुए फल नहीं खाता,रहने दीजिए,मैं ऐसे ही जाता हूँ।” उन्हें चले जाते देख कर सीता ने कहा जो फल पृथ्वी पर गिर पड़े हैं,उन्हें चुपचाप खा लो। इस पर हनुमान् पूँछ से वृक्षों को बांध कर हिलाने लगे और अशोकवन के सब फल खा गए। अंत में उन्होंने वन के सारे वृक्ष गिरा दिए। भावार्थ रामायण में ऐसी ही मिलती-जुलती कथा दी गई है।

असमिया रामायण के अनुसार सीता ने विदाई के समय एक मधुफल दिया। हनुमान को और फल खाने की इच्छा हुई और उन्होंने सीता से पता लगाया कि यह फल अशोक वन का ही है।तब हनुमान ने ब्राह्मण का वेश बनाया और रावण के पास आकर बोले–“मैं सौराष्ट्र का ब्राह्मण हूँ। कल एकादशी का व्रत था, मैंने सोचा कि राजा के सामने वेदपाठ करके चला जाऊँगा।” इसके बाद हनुमान् चले गए और अशोक वन पहुँचने पर बन्दर बन कर फल खाने लगे और उत्पात मचाने लगे। सेरीराम में यह प्रसंग इस प्रकार है। सीता से दो आम पाकर हनुमान् ने पूछा कि ये फल कहाँ से आए।सीता ने उन्हें रावण की अमराई का पता बताकर उन्हें सावधान किया कि सौ राक्षस दिन-रात उसकी रखवाली करते हैं। हनुमान् जी ने वहाँ जाकर छोटे वानर के रूप में अमराई में पड़ी हुई पत्तियाँ और टहनियाँ बटोरना शुरू कर दी, जिससे रक्षक प्रसन्न हो गए। दिन में किसी समय सब की सब मद्य पीकर मतवाले बन गए और हनुमान् ने सारे फल खा कर अशोकवाटिका नष्ट कर डाली। दूसरे दिन रक्षक हनुमान् जी से पूछने लगे कि यह किसका काम है। हनुमान् के चुप रहने पर रक्षक उन्हें रावण के पास ले गए।

गुणभद्र के उत्तरपुराण के अनुसार हनुमान् के नेतृत्व में वानरसेना ने विभीषण की शरणागति के बाद समुद्र पार कर अशोक वन को नष्ट किया और उसके रक्षकों को मार डाला था।

आनन्द रामायण, तोरवे रामायण और भावार्थ रामायण के अनुसार  ब्रह्मा ने हनुमान् से निवेदन किया कि तुम मेरे ब्रह्मास्त्र का मान रखो और उसमें बंध कर रावण के पास जाओ।(जो न ब्रह्म सर मानऊ,महिमा मिटई अपार।)एक अन्य कथा के अनुसार हनुमान् ने इन्द्रजित के साथ युद्ध करते समय आहत होने का अभिनय किया था। वह जमीन पर निष्चेष्ट पड़े रहेे जिससे राक्षसों ने उन्हें आकर बाँधा था। बाद में वे हनुमान् जी को उठाकर ले जाने में असमर्थ रहे, तब हनुमान् ने कहा कि मेरे बन्धन कुछ ढीले कर दिए जाएँ तो मैं चल सकूँगा।इन्द्रजित् ने राक्षसों को वानर की पूँछ पकड़ने का आदेश दिया, किन्तु हनुमान् सबसे पीछा छुड़ाकर अपने आप रावण से मिलने गए।

भावार्थ रामायण, दक्षिण भारत की एक रामकथा और अन्य रचनाओं में हनुमान् रावण की सभा में अपनी पूँछ का कुँडल बनाकर रावण से ऊँचे सिंहासन पर विराजमान हुए। बाद में अंगद केे प्रसंग में भी ऐसा ही वर्णन आया है। लगभग समस्त कथाओं में विभीषण के बीच-बचाव का उल्लेख है। सेरीराम के अनुसार रावण को एक भविष्यवाणी का स्मरण दिलाया जिसके अनुसार छोटे वानर की हत्या लंका के लिए अहितकर है।

कुुछ रामकथाओं में हनुमान् स्वयं सुझाव देते हैं कि उनकी पूँछ जलाई जाए। आनन्द रामायण के अनुसार रावण ने हनुमान् की पूँछ काटकर फेंकने का आदेश दिया था किन्तु राक्षसों के हथियार इसमें असमर्थ सिद्ध हुए। तब रावण ने हनुमान् से पूछा कि तुम्हारी पूँछ नष्ट करने का क्या उपाय है। तब वानर ने उसे जलाने का सुझाव दिया।

हनुमान् की पूँछ बढ़ जाने के विषय में कृतिवास रामायण में लिखा है कि वह पचास योजन लम्बी थी, उसे तीन लाख राक्षसों ने पकड़कर दबाया था और ईउसमें तीस मन कपड़ा लपेट दिया गया था। उरांव नामक आदिवासी अपने को रावण का वंशज समझते हैं। उनमें लंकादहन के विषय में यह कथा प्रचलित है कि जब हनुमान लंका आए थे और रावण ने हनुमान् की पूँछ जलाने के लिए अपनी प्रजा से सब कपड़े ले लिए थे और उस समय से रावण की प्रजा और उनके वंशजों के पास कपड़ों की कमी है।

आनन्द रामायण में सबसे पहले यह उल्लेख आया है कि हनुमान् ने तब अपनी पूँछ बढ़ाना बंद किया था जब उनके सुनने में आया कि राक्षस सीता के कपड़े भी लेने  जा रहे हैं। तोरवे रामायण और भावार्थ रामायण में भी ऐसा ही प्रसंग है।

वाल्मीकि रामायण और बाद की रामकथाओं में विभीषण के महल के सुरक्षित रहने का उल्लेख है।(जारा नगर निमिष एक माही। एक विभीषन कर गृह नाही।।)जैन रामकथा पउमचरियं में लंकादहन का उल्लेख  नहीं है। इसके अनुसार इन्द्रजित् हनुमान् को बाँधकर लाया था।रावण ने उनको नगर के चारों ओर घुमाकर प्रजा को दिखलाने का आदेश दिया किन्तु हनुमान् अपने बंधनों को तोड़कर और लंका में बहुत से महल गिराकर श्रीराम के पास लौटे। राम हनुमान से मिलकर अति प्रसन्न हुए और उन्हें “तुम मम प्रिय भरत सम भाई” कहकर  अपने गले लगा लिया। (इंडिया डेटलाइन)     

(विजय बुधोलिया भोपाल स्थित रामकथा के अध्येता हैं।)

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