साहित्यकार, चित्रकार व पत्रकार प्रभु जोशी का जाना

 

शिवकुमार विवेक

 

सुपरिचित लेखक, चित्रकार और पत्रकार प्रभु जोशी ने गत 24 अप्रैल को साहित्यकार रमेश उपाध्याय के निधन पर लिखा था-उनके न रहने के सच को स्वीकार नहीं कर पा रहा हूं। जैसे कोई धमकी देकर मुझे बाध्य कर रहा है।..गीली आंखों से उन्हें नमन। दस दिन बाद खुद प्रभुजी ने सबको ऐसी स्थिति में डाल दिया। उनके प्रयाण से एक सृजनात्मक प्रतिभा का शून्य पैदा हो गया। वह ऐसे व्यक्ति थे जिनकी मौलिकता, सहजता और विविधता का विकल्प आसानी से खड़ा नहीं होता। मालवा की मिट्टी के संस्कारों की महक भी उनमें अलग आकर्षण पैदा करती थी। इंदौर को मध्यप्रदेश की कलाधानी दर्जा ऐसी ही प्रतिभाओं से मिला था। 

प्रभु जोशी को अलग-अलग क्षेत्रों के लोग भिन्न-भिन्न छवियों में जानते हैं। जब वे कुमार गंधर्व जैसे महान संगीतकारों के साथ बैठते-उठते थे तो संगीत की मंडली उन्हें कलाकार और कलामर्मज्ञ समझती थी तो कहानीकार के रूप में उनकी साहित्य जगत में ऊंची सिंहासन मिली हुई थी। पत्रकार के तौर पर वे सामयिक विषयों के सटीक टिप्पणीकार और विश्लेषक के रूप में जाने गए। आकाशवाणी और दूरदर्शन में काम करते हुए उन्होंने अपनी रचनात्मक प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और सैकड़ों प्रतिभाएं गढ़ीं। प्रदेश भर के कई कलमवीर उनके हाथों तराशे गए हैं।

प्रभु जोशी का सफर देवास के पीपलरावां से शुरु हुआ और आकाशवाणी के विभिन्न केंद्रों पर काम करते हुए वे अंततः इंदौर में टिके। यहीं से उनकी सृजन यात्राएं मुंबई, दिल्ली और विदेश तक होती रहीं। आखिरी दिनों में उन्होंने खुद को अपने प्रारंभिक शौक चित्रकला पर केंद्रित किया था। हाल में उन्होंने फेसबुक पर अपनी कई जलरंग तस्वीरों को डाला था।

हम लोगों के पत्रकारीय प्रशिक्षण में भी प्रभु दा के हाथ लगे। प्रभु दा इंदौर में आकाशवाणी इंदौर में थे और शाम को अपना बैग और फाइलें लेकर नईदुनिया के दफ्तर में आकर बैठ जाते थे। उनकी जिद्दू कृष्णमूर्ति सी छवि ही मेरे लिए आकर्षण व कौतुहल का विषय होती थी।  वह नईदुनिया के फीचर सेक्शन के अनौपचारिक प्रभारी थे और यह प्रभाग उनके कल्पनाशील नेतृत्व में नई-नई रचना करता रहता था। हम छह प्रशिक्षुओं को वह काम देते रहते थे-नईदुनिया में ही नहीं, आकाशवाणी की वार्ताओं और अन्य कार्यक्रमों में भी। इस दौरान कई राजनीतिक व अन्य सामयिक विश्लेषण उन्होंने हरिप्रसाद के नाम से लिखे। 

हम जब उनके घर गए तो वहां एक अलग संसार सजा देखा। किताबों और आकाशवाणी की स्क्रिप्टों से अलग-रंगों, कैनवास और कूचियों का संसार। एक से बढ़कर एक पेंटिंग। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में उनके प्रदर्शित, सम्मानित और पुरस्कृत होने की यशगाथाओं के साप्थ। कोई चित्र लिंसिस्टोन व हरबर्ट के आस्ट्रेलिया के त्रिनाले में प्रदर्शित तो किसी को गैलरी फॉर कैलिफोर्निया का थॉमस मोरान अवार्ड। कोई ट्ववंटी फर्स्ट सेंचुरी गैलरी में शामिल। जलरंग उनका पहला प्यार था। ये ज्यादा टिकाऊ नहीं रहते, यह जानते हुए भी वे इन पर हाथ आजमाते रहे।

कहानीकार के रूप में 1973 में धर्मयुग से उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना गया। प्रभु जोशी की लंबी कहानियां में उनकी कई उम्दा कहानियां संग्रहीत हैं। उनकी कहानी का कथ्य हमारे आसपास का था तो भाषा में स्थानीयता और उसके परिष्कार का अलक्षित आग्रह। कहानी लिखते-लिखते और आकाशवाणी में प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव की भूमिका निभाते-निभाते वे पत्रकारिता में आ गए। इंदौर में प्राध्यापक राजेंद्र माथुर से लेकर अन्य कई क्षेत्रों के लोगों ने इसका खासा वातावरण बना रखा था। 

प्रभुजी की यह खासियत थी कि वे जिस क्षेत्र में काम करते थे, उसमें सहकर्मी उन्हें उसी क्षेत्र का असल कर्मवीर समझते थे जबकि वह अपने दूसरे कर्मक्षेत्र में भी उतनी ही तन्मयता, समर्पण और गंभीरता से लगे होते थे। रेडियो को उन्होंने कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाए। बर्लिन में जनसंचार की अंतरराष्ट्रीय सपर्धा में आफ्टर ऑल हाउ लांग रेडियो कार्यक्रम को जूरी का विशेष पुरस्कार मिला। उन्होंने धूमिल, मुक्तिबोध, पिकासो, कुमार गंधर्व व उस्ताद अमीर अली खां आदि पर केंद्रित रेडियो कार्यक्रम तैयार किया जिसे आकाशवाणी का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। प्रभु दा को भारत भवन का चित्रकला व मप्र साहित्य परिषद का कथा-कहानी के लिए अभा सम्मान मिला। 

देश के प्रख्यात व्यंगकार ज्ञान चतुर्वेदी उनके अभिन्न मित्रों में थे। हाल में उनके कोविडग्रस्त होने पर डॉक्टर ज्ञान चतुर्वेेदी उनके चिकित्सकीय मार्गदर्शक थे। ज्ञानजी के पांचवे उपन्यास पागलखाना की प्रस्तावना उन्होंने ही लिखी थी। 

प्रभु दा पत्रकार के तौर पर इंदौर के दोनों बड़े समाचार पत्रों से जुड़े रहे। इसके बाद जब वे स्वतंत्र लेखन कर रहे थे तब पत्रकारिता के स्तर व भाषा को लेकर खासे चिंतित थे। हिंदी के पक्ष में उन्होंने लंबा लेख ही नहीं लिखा बल्कि इसके लिए उठ खड़े होने का आह्वान किया। जिस अखबार को अपने बौद्धिक अवदान से सींचा, उसकी हिंग्लिस के प्रयोग को लेकर आलोचना करने से नहीं चूके।  वे बौद्धिक रूप से समृद्थ और तथ्यान्वेषी पत्रकारिता के पक्षधर थे इसलिए हिंदी पत्रकारों को हमेशा पढ़ने-लिखने और मनन-चिंतन का परामर्श देते थे। हिंदी की पत्रकारिता और संवाद करने के माध्यमों को उस परिष्कार में ले जाएं. यही उनको श्रदांजलि होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here