रवि भोई

त्तीसगढ़ में एक बार फिर ढाई-ढाई साल के फार्मूले की हवा बहने लगी है।  हवा तूफान में बदलती है या फिर शांत हो जाती  है, यह तो समय बताएगा, लेकिन कांग्रेस के भीतर की बयानबाजी से राजनीति गर्म हो चली है। कुछ लोग दिल्ली में अपने-अपने स्तर पर लॉबिंग की भी बात कर रहे हैं। भूपेश बघेल की सरकार को 17 जून को ढाई साल हो जाएगा। सुनते हैं कि 2018 में राज्य में कांग्रेस की सरकार के गठन के वक्त पार्टी हाईकमान के सामने  भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव में सत्ता के बंटवारे पर कोई बात हुई थी। यानी पहले ढाई साल भूपेश बघेल मुख्यमंत्री रहेंगे और उसके बाद का कार्यकाल टीएस सिंहदेव को मिलेगा। पर तब इस फार्मूले की कोई घोषणा नहीं हुई, पर चर्चा में फार्मूला उभरता रहा है। कांग्रेस के छत्तीसगढ़ के प्रभारी महासचिव पीएल पुनिया ऐसे किसी फार्मूले से इंकार कर हवा के रुख को बदलने की कोशिश जरूर की है, वहीं राज्य के वरिष्ठ मंत्री रवींद्र चौबे ने भूपेश सरकार के पांच साल बने रहने की बात की है। श्री चौबे दिग्विजय सिंह और अजीत जोगी के मंत्रिमंडल में रहे हैं।  छत्तीसगढ़ में पांच साल नेता प्रतिपक्ष भी रहे हैं।  वे पांच बार के विधायक, सीनियर मंत्री और सरकार के प्रवक्ता हैं। लोगों के दिमाग में सवाल कौंध रहा है कि रविंद्र चौबे को बयान देने की आवश्यकता क्यों पड़ी ? और क्या यह सरकार का अधिकृत बयान है ? टीएस सिंहदेव ने रवींद्रद्र चौबे के बयान पर यह कहकर तड़का लगा दिया कि चौबे वरिष्ठ और अनुभवी हैं, जो कह रहे है, तो सही होगा।  पर कहावत है – “बिना आग धुआं नहीं उठता।” कहते हैं टीएस सिंहदेव की दिली इच्छा एक बार मुख्यमंत्री बनने की है। श्री सिंहदेव ने नेता प्रतिपक्ष रहते हुए कुछ मौकों पर अपनी इच्छा सार्वजनिक तौर पर प्रकट कर चुके हैं और उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिलने पर सरगुजा के लोगों में निराशा की बात भी उनकी जुबान पर आ चुकी है। कहा जा रहा है श्री सिंहदेव के मन में भले मुख्यमंत्री के पद की तड़प हो, पर वे न तो राजस्थान के सचिन पायलट की तरह आक्रामक हो सकते हैं और न ही मध्यप्रदेश के ज्योतरादित्य सिंधिया की तरह बगावत कर सकते हैं। वे पंजाब के नवजोतसिंह सिद्धू की तरह मुख्यमंत्री के खिलाफ मोर्चा भी नहीं खोल सकते। सचिन पायलट ने बगावत कर उपमुख्यमंत्री का पद त्याग दिया, लेकिन कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गाँधी के कहने पर पिछले आठ महीने से शांत बैठे हैं। लोगों  का कहना है कि पायलट को कोई न कोई आश्वासन तो मिला होगा। कहा जा रहा है श्री सिंहदेव शालीन राजनीतिज्ञ हैं और शालीनता में रहकर हाईकमान के निर्देश का इंतजार करेंगे।  फिर ढाई साल में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के लिए राजस्थान, पंजाब या मध्यप्रदेश की तरह कोई वातावरण  दिखाई नहीं पड़ रहा है । राजनीति तो संभावनाओं का खेल है। राजनीति में कुछ भी लिखित नहीं होता और कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता। कांग्रेस में तो हाईकमान या कहे गांधी परिवार जो कह दे या सोच ले वही होता है। इंदिरा गाँधी से लेकर सोनिया गांधी के जमाने तक यही बात सुनने को आती है। 1980 में आदिवासी नेता शिवभानुसिंह सोलंकी के साथ अधिकांश विधायक होने के बाद भी इंदिरा गांधी ने अर्जुन सिंह को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया। शिवभानुसिंह सोलंकी को उपमुख्यमंत्री पद से संतुष्ट होना पड़ा। 1993 में अर्जुन सिंह दिल्ली से पिछड़े वर्ग के नेता सुभाष यादव को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने की सोच कर भोपाल आए, पर सुभाष यादव की जगह उन्हें दिग्विजय सिंह को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। तब दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। सुभाष यादव को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी मिली। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बनने का सपना विद्याचरण शुक्ल संजोए थे और अधिकांश विधायक उनके पक्ष में थे, लेकिन इक्के-दुक्के विधायक होने पर भी हाईकमान के निर्देश पर अजीत जोगी मुख्यमंत्री बन गए। कांग्रेस में हाईकमान ही ताकतवर है और उसकी इच्छा ही सर्वोपरि होती है।  यह बात तो भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव दोनों कह चुके हैं। हाईकमान के सामने किसका पलड़ा भारी है, उससे ही तय होगा ढाई-ढाई साल का फार्मूला। वैसे कांग्रेस हाईकमान ने भूपेश बघेल पर असम का चुनाव प्रभारी बनाकर भरोसा जताया।  उत्तरप्रदेश और बिहार के चुनाव में भी उन्हें आगे किया था।  पर छत्तीसगढ़ में कुछ होता है तो राजस्थान वाले भी चुप रहने वाले नहीं हैं, ऐसे में लोगों की धारणा है हाईकमान आ बैल मुझे मार वाली कहावत को क्यों चरितार्थ करेगा ? पंजाब में तो घमासान चल ही रहा है।

एसपी की लिस्ट की चर्चा

सरकार ने आईएएस अफसरों की ट्रांसफर लिस्ट शनिवार देर शाम जारी कर दी। अब अब चर्चा है कि महीनों से पेंडिंग पुलिस अधीक्षकों की ट्रांसफर लिस्ट जल्द निकल सकती है। कहते हैं पहले चार-पांच छोटे जिलों के एसपी बदलने का प्लान था।  अब एक दर्जन से अधिक जिलों के एसपी की सूची बनकर तैयार है। कहा  जा रहा है कि इस लिस्ट में कुछ एसपी के जिलों में हेरफेर  तो कुछ को पुलिस मुख्यालय में पदस्थ करने का प्रस्ताव है।  इससे पुलिस मुख्यालय में काम कर रहे अफसरों को फील्ड में जाने का मौका मिल जायेगा।  अब देखते हैं यह लिस्ट जारी होती है या पिछली बार की तरह अटकी पड़ी रहती है। 

सुब्रह्मण्यम को डोभाल का आशीर्वाद

कहते हैं भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से अच्छे संबंध के चलते आईएएस बीवीआर सुब्रह्मण्यम भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय में पहुँच गए। वे 30 जून से केंद्रीय वाणिज्य सचिव होंगे। छत्तीसगढ़ कैडर के 1987 बैच के अफसर श्री सुब्रह्मण्यम पिछले करीब तीन साल से जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव थे। उन्हें 27 मई को जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव पद से हटाकर वाणिज्य मंत्रालय में ओएसडी के रूप में नियुक्त कर देश के अगले वाणिज्य सचिव के तौर पर नामित कर दिया गया।  चर्चा तो यह भी है कि श्री सुब्रह्मण्यम के कामकाज के तरीके को लेकर जम्मू-कश्मीर के भाजपा नेता लगातार शिकायतें कर रहे थे।  कारण जो भी हो,सुब्रह्मण्यम छत्तीसगढ़ कैडर के पहले अफसर होंगे, जो केंद्र में सचिव बनेंगे।  वे डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में लंबे समय तक प्रधानमंत्री कार्यालय में थे।  विश्व बैंक की सेवा से लौटने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भी काम किया। श्री सुब्रह्मण्यम छत्तीसगढ़ के गृह सचिव भी रहे।  यहां से वे जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव बने। आरपी मंडल और सीके खेतान के बैच के अधिकारी सुब्रह्मण्यम सितंबर 2022  में रिटायर होंगे।  कहा जा रहा है केंद्र में सचिव बनने के बाद सुब्रह्मण्यम के लिए आगे के लिए कई रास्ते खुल गए हैं। 

87 बैच के आईएफएस बनेंगे पीसीसीएफ

भारतीय वन सेवा के 1987 बैच के अधिकारी जेएससीएस राव,श्रीमती बी.वी. उमादेवी और के. मुरुगन को इस महीने पीसीसीएफ ( प्रधान मुख्य वन संरक्षक ) के पद पर पदोन्नति मिल  जाएगी। भारत सरकार से पदोन्नति के लिए हरी झंडी मिल गई है।  श्रीमती उमादेवी  केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर हैं , जबकि श्री राव और श्री मुरुगन छत्तीसगढ़ में पदस्थ हैं। श्री राव इसी महीने रिटायर हो जाएंगे। श्री मुरुगन दिसंबर 2021 तक पद पर रहेंगे।  कहा जा रहा है 1987 बैच के अफसरों की पदोन्नति की प्रक्रिया जून के दूसरे हफ्ते तक पूरी हो जाएगी। एपीसीसीएफ ( अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक ) के एक खाली पद पर सीसीएफ ( मुख्य वन संरक्षक) एसएसडी बड़गैया की पदोन्नति तय मानी जा रही है। वन विभाग में शीर्ष स्तर पर प्रमोशन के बाद सीसीएफ, सीएफ और डीएफओ स्तर पर भी पदोन्नति प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है।

नेताजी  के जलवे

कहते हैं बिलासपुर में एक कांग्रेस नेता ने जिले के स्वास्थ्य महकमा पर कब्जा कर रखा है। हेल्थ विभाग में अफसरों से ज्यादा उस नेता की चलती है। चर्चा है कि यह नेता समय और पावर को पहचानने में माहिर हैं।  इस कारण जिस नेता या मंत्री की तूती बोलती है , उसको अपना आका बना लेते हैं। कहा जाता है आजकल ये राज्य के एक मंत्री के खासमखास बन गए हैं। नेता तो फिर नेता होते हैं और  सिर पर मंत्री जी का हाथ हो, तो सीना चौड़ा होना स्वाभाविक है।  ऐसे में किसी सरकारी विभाग के अफसर उनके सामने लगते क्या हैं ? (इंडिया डेटलाइन)

(लेखक, पत्रिका समवेत सृजन के प्रबंध संपादक और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

 

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