सुसंस्कृति परिहार

जिस दिन से संघ की भृकुटि मोदी पर चढ़ी है उस दिन से भाजपा और सत्तालोलुप नेताओं ने अपने तेवर बदलने शुरू कर दिए हैं। डूबती भाजपा को बचाने संघ ने भगवाधारी मठाधीश योगी को खेवनहार के रूप में सामने क्या किया कांग्रेस के घिसे पिटे नेताओं में रंगत आ गई है, वे तलुए चाटने तैयार है। उन्हें पूरा भरोसा है कि योगी का राजयोग प्रबल हो चुका है इसलिए उनसे जुड़कर ही कुछ हासिल कर पाएंगे। क्योंकि कांग्रेस की हालत उ.प्र. में ठीक नहीं है भविष्य भी अंधकार में डूबा दिखाई दे रहा है। बड़ी बात तो ये कि मोदी को प्रधानमंत्री बनाने वाले उनके अपने ज्योतिषियों ने उनके मंगल के दशम में ना जाने पर यह भी जता दिया है कि मोदी का सुनहरा अध्याय दिसंबर 21तक है। वे त्यागपत्र दे सकते हैं। कुछ दिनों बाद मीडिया भी अपने सुर बदल लेगा। तब नेताओं के विचारों में बदलाव स्वाभाविक है, फिर आजकल दलबदल एक ट्रेंड बन गया है। वैसे भी भाजपा को समृद्ध करने में संगमा, नजमा हेपतुल्ला की पहलकदमी महत्वपूर्ण रही।

इसी श्रंखला में आज राजीव गांधी के मित्र जितेन्द्र प्रसाद के पुत्र इसी ट्रेंड में शामिल होकर भाजपाई पट्टा लपेट लिए। उन्हें उम्मीद है कि उ.प्र.में भाजपा से दूरी बनाने वाले ब्राह्मणों को साध पाएंगे। जबकि वहां भाजपा के एक उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा हैं ही। साथ ही साथ मंत्रीमंडल में छः मंत्री और ब्राह्मण हैं। अब जतिन प्रसाद जो लगातार तीन बार कांग्रेस से लोकसभा चुनाव हार चुके हैं, पर विश्वास है वे भाजपा में अपनी क्या ताकत दिखा पायेंगे। देखना है वे कितने सफल होते हैं?

ये वही जितिन प्रसाद हैं जिन्हें चंद दिनों पहले कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन जितिन प्रसाद वहां भी कोई करिश्मा नहीं दिखा सके। उनके नेतृत्व में पार्टी की सीटें न केवल शून्य हो गईं, कांग्रेस के वोट प्रतिशत में भी लगभग 10 फीसदी की रिकॉर्ड कमी हुई थी। आपको याद होगा जी-23 के नेताओं का एक पत्र मीडिया की सुर्खियां बन गया था। कांग्रेस के शीर्ष 23 नेताओं ने पार्टी आलाकमान सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पार्टी में चुनाव कराए जाने की मांग की थी। इन नेताओं में भी जितिन प्रसाद शामिल थे और इस पत्र पर उन्होंने भी हस्ताक्षर किया था। यानी कांग्रेस आलाकमान से उनकी नाराजगी पहले से सामने आ रही थीऔर वे मौके की तलाश में रहे।

यहां एक बात बहुत गंभीर और विचारणीय है कि चाहे ज्योतिरादित्य हों या जतिन प्रसाद दोनों के पिता कांग्रेस में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। उनकी मृत्यु के बाद कांग्रेस ने उनके पुत्रों को जिस तेजी से आगे लाया, मंत्री बनाया, पार्टी संगठन की जिम्मेदारी सौंपी, वही आज हानिकारक हो गया है। दोनों को सत्ता की ललक इतनी बुरी लगी कि यह चाहत ही खींचकर सत्तारूढ़ पार्टी में ले गई। यदि ये चरणबद्ध तरीके से मेहनत करते हुए आगे बढ़ते तो शायद पार्टी से इन्हें प्रेम भी होता। सचिन पायलट भी इसी कड़ी के हिस्से हैं और आए दिन उनकी इसी तरह की ख़बरें मिलती रहती हैं। संभावित है उनकी आकांक्षाओं की उपेक्षा जारी रही तो वे भी नहीं रुकेंगे।

भाजपा निरंतर कांग्रेसमयी होती जा रही है। इस दौरान रह रह कर एक ख़्याल मन में आता है कि कांग्रेसियों का क्रेज़ कम नहीं हो रहा। उन पर बराबर भाजपा का जादू बढ़चढ़ कर बोल रहा है। जब से हिमंता बिस्वा सरमा जैसे पूर्व कांग्रेस के दलबदलू मंत्री को असम का मुख्यमंत्री बनाया गया है तब से कांग्रेस के कई बड़े नेताओं का मन और भी डोल रहा है। ज्योतिरादित्य तो कब से प्रतीक्षारत है ? वे तो अपने बीस साथियों सहित कांग्रेस सरकार को गिराकर भाजपा में आए और सरकार बनवाई। इतने बड़े सहयोग के बावजूद वे अब तक मुख्यमंत्री नहीं बन पाए हैं, पर आशा से आसमान टंगा तो है।अब जाएं तो जाएं कहां? सचिन पर डोरे डाले जा रहे हैं और गाहे बगाहे छत्तीसगढ़ सरकार पर भी निशाने लगाए जा रहे हैं।

ये सारा खेल नेताओं के बीच जारी है। संघ अपनी नीतियों में कामयाब ज़रूर नज़र आ रहा है पर कांग्रेसियों को ओहदों पर बैठाना अंदर अंदर भाजपा के जुझारु कार्यकर्त्ताओं को निराश भी कर रहा है। वे संगठित हो रहे हैं और भीतरघात कर भाजपा की फजीहत भी करने में जुटे हैं। दमोह विधानसभा उपचुनाव में शिवराज सरकार को भाजपाइयों ने जो करारी चपत मारी है वह आगत की बानगी है।फिर मोदी खेमा भी शांत तो बैठने वाला नहीं है। इसके साथ ही, सबसे बड़ी बात जनता के फैसले की है जब जनता ही बगावत करे तो उसे कौन बचाएगा। चेहरा बदलने से बेड़ा पार करना सहज नहीं भाजपा का चाल, चरित्र और चेहरा उजागर हो चुका है। मोदी के अंधभक्त कार्यकर्ता और मोदी शाह के हम दो हमारे दो की भूमिका क्या रहती है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो भाजपा के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं।

जो लोग विपक्ष की सफाई के इंतजार में हैं उन्हें बंगाल, कर्नाटक, केरल और उससे पहले बिहार में हुए चुनाव में लोगों की मन:स्थिति समझनी चाहिए। दिल्लीऔर हरियाणा के हालात का अध्ययन करना होगा। किसान आंदोलन को ममता राष्ट्रीय आंदोलन बनाने तत्पर हैं जिन्हें अभी बारह दलों का समर्थन मिला है। वह एक बड़ी ताक़त बनने वाला है। सत्ता संक्रमण के शिकार लोग तब कहां किस हाल में होंगे? किसी ने क्या खूब कहा है -जहां सत्ता होगी वहां होंगे/थूकेंगे फिर फिर चाटेंगें। (इंडिया डेटलाइन)

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